विरोधी हरा नहीं सके, आडवाणी को “अपनों” ने हरा दिया

खरी-खरी , , शुक्रवार , 22-03-2019


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प्रेम कुमार

संसद में 92 फीसदी उपस्थिति के बावजूद लालकृष्ण आडवाणी बेटिकट हो गये। सच ये भी है कि लोकसभा के 5 साल के कार्यकाल में उन्होंने संसद में महज 365 शब्द कहे। ये शब्द भी 19 दिसम्बर 2014 या उससे पहले तक की गिनती है। इसका मतलब ये है कि 2019 के आम चुनाव में लालकृष्ण आडवाणी के पार्टी से बेटिकट होने की घोषणा जरूर हुई है, वास्तव इसका निर्णय 2014 के आम चुनाव के बाद ही हो गया था।

ऐसी अनगिनत घटनाओं को याद किया जा सकता है, तस्वीरें दिखायी जा सकती हैं, भाषण उद्धृत किए जा सकते हैं कि नरेंद्र मोदी किस हद तक लालकृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी को चाहते रहे हैं। मगर, सच ये है नरेंद्र मोदी कभी भूलते नहीं। बदला लेते हैं। और, ज़रूर बदला लेते हैं। चुन-चुन कर बदला लेते हैं। अपना यह स्वभाव नरेंद्र मोदी खुले तौर पर व्यक्त कर चुके हैं।

आडवाणी से मोदी ने सिर्फ पाया, उन्हें कुछ नहीं लौटाया

सच ये है कि लालकृष्ण आडवाणी से नरेंद्र मोदी ने सिर्फ लिया, उन्हें कभी कुछ दिया नहीं। नरेंद्र मोदी के राज में चर्चा थी कि लालकृष्ण आडवाणी राष्ट्रपति बनाए जा सकते हैं। कहा जा रहा था कि कभी आडवाणी ने सार्वजनिक रूप से ऐसा कह दिया था। कही गयी बात को वे जरूर पूरी करते हैं। मगर, हुआ क्या? ऐसे व्यक्ति को उनकी जगह बिठा दिया गया जो हद से अधिक विनम्र हैं। साथ चलते समय कई दफा वे प्रोटोकॉल भूलकर नरेंद्र मोदी को ही रास्ता देते नज़र आने लगते हैं।

आडवाणी के बुरे दिन शुरू हुए जब वे गये जिन्ना की मजार पर 

आडवाणी से आरएसएस उसी दिन नाराज़ हो गया था जब 2005 में लालकृष्ण आडवाणी ने जिन्ना की मजार पर पाकिस्तान जाकर फूल-माला चढ़ायी थी। तभी से नरेंद्र मोदी संघ के प्रियपात्र होते चले गये। मोदी इसलिए भी संघ के प्रिय हुए क्योंकि 2004 में हार के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने गुजरात दंगे को हार की वजह बताया था जबकि संघ ने वाजपेयी को गलत ठहराया था। 2005 में पार्टी और संघ में आडवाणी के ‘बदनाम’ होने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने मुंबई के शिवाजी स्टेडियम में बीजेपी की स्थापना के रजत जयंती समारोह में चुनावी राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा की थी। 2007 में वाजपेयी आखिरी बार किसी रैली में लखनऊ में दिखे थे। उस साल विधानसभा चुनाव में वे वोट नहीं डाल सके और उसके बाद से लगातार बिस्तर पर रहे। वाजपेयी से छुटकारा मिल चुका था, मगर आडवाणी से छुटकारा लेना बाकी था। 2009 में आडवाणी पीएम इन वेटिंग रह गये। 

‘राजधर्म’ पर अटल की नसीहत मोदी को गुजरी नागवार 

वाजपेयी ने नरेंद्र मोदी को गुजरात दंगे के बाद जो राजधर्म की नसीहत दी थी या फिर आम चुनाव में गुजरात दंगे के दौरान मोदी सरकार के चुप रहने और केंद्र की ओर से हस्तक्षेप नहीं होने को हार की वजह बतायी थी, उसके बाद से मोदी हमेशा राजनीतिक रूप से असहज रहे। यह भी सच है कि नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री पद पर बनाए रखने के लिए आडवाणी ने वाजपेयी से सीधी तकरार मोल ली थी। मगर, जब मोदी को ही आडवाणी की जगह पीएम उम्मीदवार बनाने की कोशिश हुई, तो आडवाणी विरोध में उतर आए। यह विरोध तो अप्रभावी रहा, मगर आडवाणी के लिए मोदी की भावना बिल्कुल बदल गयी।

बीते 5 साल में बिल्कुल अकेले पड़ गये आडवाणी 

इस पृष्ठभूमि में आडवाणी के बीते पांच साल को देखें तो बात समझ में आ जाती है कि 92 फीसदी उपस्थिति रखने वाला व्यक्ति संसद में महज 350 शब्द ही क्यों बोल पाया। वाजपेयी के निधन के बाद आंखों में आंसू का समंदर लिए जब आडवाणी बीजेपी का इतिहास खंगाल सकते हैं तो वे संसद में चुप कैसे रह गये? अगर वाजपेयी 14 साल तक बिस्तर पर चुप रह गये, तो आडवाणी संसद के भीतर मौजूद रहकर 5 साल खामोश रह गये। क्या किसी ने कभी किसी को इन पांच वर्षों में संसद के भीतर आडवाणी से आकर राय-शुमारी करते देखा? बीजेपी सांसदों में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वे नरेंद्र मोदी की मुस्कुराती आंखों को झेल पाते। 

पत्रकारों के अलग-अलग अनुभव हैं कि मोदी माफ नहीं करते

वरिष्ठ पत्रकार करन थापर ने उस इंटरव्यू को याद करते हुए जिसमें गुजरात दंगे के बारे में पूछे जाने के बाद नरेंद्र मोदी ने इंटरव्यू छोड़ दिया था, बताया है कि इंटरव्यू छोड़ने के बाद भी उन्होंने उनकी खातिरदारी में कभी कोई कमी नहीं छोड़ी। और, बाद में कभी मिलने तक का समय नहीं दिया। किसी और इंटरव्यू की बातें तो बहुत दूर हैं। करन थापर ने प्रशान्त किशोर और अन्य के हवाले से अपनी किताब में विस्तार से बताया है कि उन्हें आभास करा दिया गया था कि नरेंद्र मोदी उन्हें क्षमा करने वाले नहीं हैं।

वरिष्ठ पत्रकार कुमार राजेश ने भी मुझे अपने उस अनुभव को बताया है जब गुजरात दंगे पर पूछे गये सवाल के बाद उन्होंने इंटरव्यू रोक दिया था और चाय-कॉफी पूछने लगे। उसके बाद पूरा समय आवभगत में दिया, मगर इंटरव्यू नहीं दिया। उसके बाद से कभी मुलाकात का वक्त नरेंद्र मोदी ने उन्हें भी नहीं दिया। जाहिर है मोदी ने कुमार राजेश को भी माफ नहीं किया होगा।

बीजेपी कार्यकर्ता भी खो चुके हैं आडवाणी को बुलाने की हिम्मत

आडवाणी बीजेपी के स्टार प्रचारक रहकर कभी स्टार नहीं रहे। मार्गदर्शक बनकर खुद मार्ग ढूंढते रहे। कभी किसी रैली तक में उन्हें बुलाने की हिम्मत देश भर में बीजेपी नेताओँ को नहीं हुई। आडवाणी का राजनीतिक भाषण सुने हुए बीजेपी के कार्यकर्ता तक तरस गये। आडवाणी से उनके घर मिलने जाने वालों में रह गये सुषमा स्वराज, जिन्होंने भी जाना कम कर दिया या फिर अरुण शौरी, यशवन्त सिन्हा, शत्रुघ्न सिन्हा जैसे नेता। अरविन्द केजरीवाल, ममता बनर्जी जैसी नेता उनसे मिलने वालों में शुमार हो गये। आप समझ सकते हैं कि आडवाणी का मतलब बीजेपी में क्या हो चुका है। क्या इसके लिए आडवाणी जिम्मेदार है? 

बूथ मैनेज करने-चोंगा पकड़ने वालों ने छीन ली आडवाणी से टिकट

आडवाणी से लोकसभा का टिकट छीन लिया गया है। गांधीनगर की जनता से उसका सेवक छीन लिया गया है। मतदाताओं से उनकी पसंद छीन ली गयी है। आडवाणी के बदले उनकी सीट पर एक ऐसा व्यक्ति चुनाव लड़ेगा जो कभी आडवाणी के बूथ मैनेज किया करता था। आडवाणी को टिकट नहीं देने का फैसला उस व्यक्ति ने किया है जो आडवाणी की रथ पर माइक का चोंगा ढोया करता था। दिक्कत ये है कि आडवाणी आज न हंस सकते हैं, न रो सकते हैं। उनकी हंसी भी हास्यास्पद होगी और उनका रोना भी किसी को नहीं रुलाएगा। उनकी यह स्थिति अमित शाह-नरेंद्र मोदी की जोड़ी ने की है।

(प्रेम कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल उन्हें विभिन्न चैनलों के पैनल में देखा जा सकता है।)








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