नॉर्थ-ईस्ट डायरी: अंदरूनी विरोध के बावजूद अगप ने फिर थामा भाजपा का दामन

मुद्दा , , शनिवार , 16-03-2019


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दिनकर कुमार

दो महीने पहले नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध करते हुए असम गण परिषद (अगप) ने असम में भाजपा के गठबंधन सरकार से अपना रिश्ता तोड़ लिया था। उसका विरोध महज दो महीने तक ही चल सका। मंगलवार को अगप ने भाजपा के साथ गठबंधन में वापसी की घोषणा करते हुए लोकसभा चुनाव मिलकर लड़ने की बात कहकर सबको चौंका दिया। वैसे सिद्धान्तहीनता के मौजूदा दौर में राजनीति अवसरवाद का ही दूसरा नाम है।

नागरिकता संशोधन विधेयक को भाजपा ने भले ही लोकसभा में पारित करवा लिया, लेकिन राज्य सभा में बहुमत नहीं होने की वजह से उसने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया। इस विधेयक के विरोध में समूचा पूर्वोत्तर सुलग उठा और भाजपा के कई सहयोगी दलों ने उससे नाता खत्म करने की घोषणा कर दी। आंचलिकतावाद की राजनीति करने वाली अगप ने भी इस मुद्दे पर गठबंधन सरकार से नाता तोड़कर जनभावना का सम्मान करने की बात कही। भाजपा ने भले ही विधेयक को ठंडे बस्ते में डाल दिया, लेकिन उसके नेता बार-बार कह रहे हैं कि हर हाल में इस विधेयक को पारित किया जाएगा। अगप नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल कुमार महंत ने इस गठबंधन पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा है कि भाजपा के साथ गठबंधन का फैसला अगप के कुछ नेताओं ने निजी तौर पर लिया है और कार्यकारिणी की सभा में इसकी कोई अनुमति नहीं ली गई है। असम के जन संगठनों के नेताओं ने साफ तौर पर कहा है कि अगप ने भाजपा का समर्थन कर संकेत दे दिया है कि वह नागरिकता संशोधन विधेयक का भी समर्थन करती है।

अगप के नेताओं ने भाजपा का दामन थामकर असल में असम की आंचलिकतावादी राजनीति को कलंकित कर दिया है। अब भाजपा की वर्चस्ववादी राजनीति के जबड़े में फंसकर अगप अपने पैरों के नीचे की बची-खुची जमीन भी खो बैठेगी। असमिया समाज के हितों की बात सोचने वाले स्थानीय लोग अगप की ऐसी अवसरवादिता से क्षुब्ध हो उठे हैं। वैसे दक्षिणपंथियों का एक तबका ऐसा भी है जो आंचलिकतावाद को भाजपा के हिन्दुत्व में विलीन होने का समर्थन करता है। इस तबके की तरफ से तर्क दिया जा रहा है कि कांग्रेस को रोकने के लिए यह गठबंधन बेहद समयोपयोगी कदम है। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा और अगप ने जो गठबंधन किया था, उसका लाभ दोनों को मिला। इसी तर्क के आधार पर अब लोकसभा चुनाव मिलकर लड़ने की बात कही जा रही है।

असम का जागरूक तबका खुल कर कह रहा है कि अगप के मुट्ठी भर नेता भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के साथ आधी रात को गुप्त मंत्रणा कर राज्य की आंचलिकतावादी राजनीति के भविष्य का फैसला करने की औकात नहीं रखते। उनका कहना है कि अगप का अर्थ आंचलिकतावाद नहीं है। अगर अगप पथभ्रष्ट हो गई है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि आंचलिकतावाद ही अप्रासंगिक हो गई है या विकल्प ही खत्म हो गया है। अगप के अंदर ही इस बात को लेकर बहस तेज भी हो गई है कि दो-तीन नेताओं ने मंत्री पद के लालच में पार्टी के जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं के साथ विश्वासघात किया है। इन नेताओं पर आरोप लगाया जा रहा है कि उन्होने पार्टी के कार्यकर्ताओं को भरोसे में लिए बिना उस भाजपा के साथ मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया है जिस भाजपा ने असम की जनता के साथ नागरिकता संशोधन विधेयक के जरिये धोखा किया है। 

अगप की इस तरह की अवसरवादिता के चलते राज्य की विभिन्न जनजातियों के ऐसे जागरूक लोग एकजुट हो सकते हैं जो केंद्र की असम के प्रति भेदभावपूर्ण नीति के खिलाफ भाजपा को चुनौती दे सकते हैं। जो छोटी-छोटी जनजातियों की पहचान को सुनिश्चित करने के लिए आत्मनियंत्रण के अधिकार के लिए अपना संघर्ष तीव्र कर सकते हैं। 

बंगलादेशी घुसपैठियों के खिलाफ छह सालों तक चलाये गए विदेशी बहिष्कार आंदोलन के बाद अगप को प्रफुल्ल कुमार महंत के नेतृत्व में दो बार सरकार बनाने का मौका मिला था, लेकिन वह न तो घुसपैठियों से असम को मुक्त कर पाई न ही उसने राज्य को विकास के पथ पर आगे बढ़ाने के लिए कुछ किया। असम आंदोलन की अगुआई करते हुए अखिल असम छात्र संघ ने असम समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते में प्रावधान था कि जाति,धर्म से परे सभी विदेशियों को शिनाख्त करने के बाद निकाला जाएगा। भाजपा नागरिकता संशोधन विधेयक के जरिये हिन्दू बांग्लादेशियों को नागरिकता देना चाहती है। यह विधेयक सीधे तौर पर असम समझौते की मूल भावना को चुनौती देता है। 

अगप के कार्यकर्ताओं ने अब सड़क पर उतरकर क्षोभ व्यक्त करना शुरू कर दिया है। शुक्रवार को जोरहाट में अगप कार्यकर्ताओं ने भाजपा के साथ गठजोड़ करने वाले अपने नेता केशब महंत, फनीभूषण चौधरी और अतुल बोरा के पुतले जलाए और पार्टी कार्यालय में लगे उनके पोस्टर को फाड़ दिया। 

अगप केंद्रीय समिति के सदस्य नीरेन शर्मा का कहना है कि इन तीन नेताओं के एकपक्षीय फैसले से पार्टी की आंचलिकतावादी छवि को नुकसान पहुंचा है। उन्होंने कहा कि जिस समय असम के मतदाताओं का भाजपा से मोहभंग हो चुका है, उस समय आंचलिकतावाद की राजनीति करने वाली अगप की तरफ लोग काफी उम्मीद से देख रहे हैं। लेकिन इन तीन सत्तालोलुप नेताओं ने भाजपा की गोद में बैठकर पार्टी को बड़ी क्षति पहुंचाई है।

(दिनकर कुमार तकरीबन 15 सालों तक सेंटिनल के संपादक रहे हैं। आप आजकल गुवाहाटी में रहते हैं।) 

  








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