बुनियादी मुद्दों से भटकता किसान विमर्श

मुद्दा , , सोमवार , 23-07-2018


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डॉ. राजू पांडेय

प्रधानमंत्री का किसानों की आय वर्ष 2022 तक दोगुनी करने का वादा किसानों की आय पर जैसा भी असर डाले किंतु किसान विमर्श को भटकाने में यह अवश्य सफल रहा है। आज स्थिति यह है कि देश के अर्थशास्त्री, कृषि विशेषज्ञ, किसान आंदोलन से जुड़े बुद्धिजीवी, राजनीतिक दल और सरकारी अमला इस बात पर दिन रात चर्चा कर रहे हैं कि किसानों की आय दुगनी हो सकती है या नहीं और इसके लिए हमें क्या प्रयास करने होंगे। यह बहस प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस के थिंक टैंक समेत कई सेलिब्रिटी अर्थशास्त्रियों के लिए विशेष रूप से सुविधाजनक है क्योंकि इस तरह वे अपनी उन किसान विरोधी नीतियों पर चर्चा से बच सकते हैं जिन्होंने कृषि को एक घाटे का सौदा बना दिया है। बहुत समय नहीं हुआ है जब किसानों पर ऐसी बहसों का प्रारंभ इस वेद-वाक्य नुमा कथन से होता था कि भारत एक कृषि प्रधान देश है। नव उदारवाद के इस दौर में जब जीडीपी में कृषि क्षेत्र की घटती हिस्सेदारी को विकसित अर्थव्यवस्था का लक्षण माना जाता है तब इस कथन का स्थान एक परिवर्तित कथन ने ले लिया है जिसमें कृषि की दुर्दशा का नकारने जैसा स्वीकार है। अब कहा जाता है- कृषि क्षेत्र की उपेक्षा कर भारत आर्थिक महाशक्ति नहीं बन सकता या कृषि की अनदेखी हम पर कहीं भारी न पड़ जाए। 

स्वाभाविक रूप से हम मानते रहे हैं कि कृषि और कृषक अपरिहार्य रूप से अन्योन्याश्रित हैं। कृषक शब्द का उच्चारण होते ही प्रायः मन में उन करोड़ों सीमांत और लघु कृषकों तथा कृषि मजदूरों की छवि कौंधती है जो अपने कठोर परिश्रम से अन्न उपजाते हैं। लेकिन सरकारों और वैश्वीकृत उदार अर्थव्यवस्था के पोषक अर्थशास्त्रियों की दृष्टि में कृषि क्रांति ऐसी उच्चस्तरीय कृषि तकनीकी से लाई जा सकती है जो मानवीय श्रम पर आश्रित नहीं है। बल्कि मानवीय श्रम पर आधारित पारंपरिक या अर्द्ध पारंपरिक कृषि तो उच्च लागत और कम तथा गुणवत्ताविहीन उत्पादन के लिए जिम्मेदार है और इससे हमें निजात पा लेनी चाहिए। किसानों की आत्महत्याओं या उपज को सड़कों पर फेंकने की घटनाओं के प्रति हमारे तंत्र की संवेदनहीनता उस दर्शन की उपज है जिसके केंद्र में मनुष्य नहीं है बल्कि उत्पादन और मुनाफा हैं। आज की सरकारों ने कृषि को किसान से अलग कर लिया है।

इनका कृषि विषयक दृष्टिकोण उत्पादन केंद्रित हो गया है और चूंकि सरकार की दृष्टि में विपुल उत्पादन अर्जित करने हेतु उत्पादक किसान की भूमिका गौण हो गई है इसलिए उसकी दुर्दशा से वह विचलित नहीं होती। उन्नत बीजों और कृषि तकनीकों ने विपुल उत्पादन को संभव बनाया है। किसान की गरीबी, बदहाली, बीमारी का असर अब उत्पादन पर नहीं पड़ता और चूंकि हमारा लक्ष्य मुनाफा और उत्पादन है इसलिए हम किसान की चिंता कर अपनी प्राथमिकताओं से भटकना नहीं चाहते। यही कारण है कि हमें लगता है कि कृषि में जरूरत से ज़्यादा मानव संसाधन लगा हुआ है या कृषि उतने लोगों को रोजगार देने में सक्षम नहीं है जितने लोग उस पर आश्रित हैं।

क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि एक ही क्षेत्र में एक ही फसल लगा कर वर्षों से वही किसान उन्हीं समस्याओं का सामना कर रहे हैं- कभी वे अपनी फसल को सड़कों पर फेंक देते हैं तो कभी आग लगा देते हैं, तो कभी कर्ज न चुका पाने के कारण खुदकुशी कर लेते हैं- और हम इन समस्याओं का दशकों तक समाधान नहीं ढूंढ पाते। यह घटनाएं इतनी निरंतरता से हो रही हैं कि यदि प्रभावित क्षेत्रों के विगत 10 वर्ष के समाचार पत्र उठाकर देखे जाएं तो लगभग उन्हीं महीनों की उन्हीं तारीखों में वही समाचार छपे दिखते हैं- किसानों का फसलों को नष्ट करना, कर्ज से परेशान हो आत्महत्या करना, नेताओं के दौरे और पीड़ितों से मुलाकात, हिंसक-अहिंसक आंदोलन, मुआवजे की घोषणा आदि।

इतने वर्षों में फसल चक्र परिवर्तन, अतिरिक्त उत्पादन के देश के अन्य भागों में परिवहन या इसे अन्य प्रकार से प्रोसेस कर व्यावसायिक महत्व के उत्पादों का निर्माण जैसे कितने ही उपाय अपनाए जा सकते थे। किंतु ऐसा होता नहीं है। इस स्थिति को बनाए रखा जाता है और इसका राजनीतिक लाभ उठाने की चेष्टा भी की जाती है - यह संवेदनहीनता की सीमाओं को लांघ कर नृशंसता की परिधि में प्रवेश करता राजनीतिक व्यवहार है। यही कहानी दुर्भिक्ष और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की है। देश के कुछ खास इलाके वर्षों से अल्प वर्षा, अवर्षा और बाढ़ का सामना कर रहे हैं। किंतु सरकार हर वर्ष इतने अनगढ़ ढंग से प्रभावितों की समस्याओं को हल करने की कोशिश करती है जैसे यह सब पहली बार हो रहा है।

सरकार कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए तो गंभीर है लेकिन कृषि के विकास की इस प्रक्रिया में करोड़ों छोटे मझोले किसानों और कृषि मजदूरों की आर्थिक स्थिति सुधारने जैसे कदम महत्वहीन हैं और इनका उल्लेख केवल इस कारण किया जाता है कि जब कृषि का कॉरपोरेटीकरण हो और इन करोड़ों लोगों को अपनी आजीविका के लिए कृषि के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में विस्थापित किया जाए तो व्यापक जन असन्तोष न फैले।

जब प्रधानमंत्री ने कहा है तो नीति आयोग भी किसानों की आय दुगनी करने के लिए कमर कस चुका है। नीति आयोग ने अप्रैल 2017 में साल 2017-18 से 2019-20 तक की अवधि के लिए जारी त्रिवर्षीय एक्शन प्लान में कृषि सुधारों की जो विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत की है उसमें किसानों की आय दोगुनी करने के विषय में अलग से एक खंड ही बनाया गया है। 

नीति आयोग की कार्य योजना का आधार कृषि का कॉरपोरेटीकरण है और इसमें कृषि में निजी क्षेत्र की भूमिका बढ़ाने की खुलकर वकालत की गई है। कृषि और कृषि से जुड़े विशेषज्ञों का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि रासायनिक खेती किसानों को खाद-बीज-उर्वरक और कृषि उपकरण बनाने वाली कंपनियों पर इस तरह निर्भर बना देती हैं कि वह आर्थिक बदहाली के मकड़जाल से बाहर नहीं निकल पाता। पूरे विश्व में जैविक खेती को इस समस्या के समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है किंतु नीति आयोग बीजों के उत्पादन और वितरण में निजी क्षेत्र की भूमिका को बढ़ाने का पक्षधर है और इसके लिए यह सुझाव देता है कि मूल्य नियंत्रण जैसे अवरोधों को दूर किया जाए। कार्य योजना में जैविक खेती की चर्चा नहीं है न ही इस बात का जिक्र है कि निजी कंपनियों द्वारा उत्पादित बीज, किसान के खाद- कीटनाशक तथा सिंचाई के खर्च को बेतहाशा बढ़ा देते हैं।

आयोग की दृष्टि में जेनेटिकली मॉडिफाइड(जीएम) बीज न केवल उत्पादन बढ़ाते हैं बल्कि इनके उपयोग से खाद और कीटनाशकों पर होने वाले खर्च में भारी कमी आती है। किन्तु कृषि संबंधी विषयों की संसद की स्थायी समिति की 2012 की कल्टीवेशन ऑफ जेनेटिक मॉडिफाइड फूड क्रॉप-प्रॉस्पेक्ट्स एंड इफेक्ट्स शीर्षक रिपोर्ट के अनुसार जीएम बीजों के उपयोग से किसानों की सामाजिक आर्थिक स्थिति में कोई सकारात्मक परिवर्तन नहीं आया है बल्कि वे बदहाल ही हुए हैं।

नीति आयोग कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग का पक्षधर है जिसमें प्राइवेट कंपनियां किसानों के साथ अनुबंध कर उन्हें खेती के लिए संसाधन और तकनीकी मुहैया कराती हैं और किसान अपनी फसल को अनुबंध में दर्ज मूल्य पर उक्त कंपनी को बेचने हेतु बाध्य होते हैं। कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग के विषय में खेती के जानकारों के एक बड़े वर्ग की आशंका यह है कि इससे किसान खेतिहर मजदूर बन जायेंगे और भारत जैसे देश में जहां साक्षरता और उससे भी बढ़कर विधिक साक्षरता का स्तर बहुत नीचा है, किसान कंपनी द्वारा कॉन्ट्रैक्ट में रखी गई मनमानी शर्तों को समझ न पाएंगे और उनका जम कर शोषण होगा।

नीति आयोग ने कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग के नियमों को सरल बनाने का सुझाव दिया है। आयोग ने यह भी परामर्श दिया है कि निजी कंपनियां सीधे किसान से उसके उत्पाद की खरीद करें और किसान को सीधे उपभोक्ताओं को अपनी उपज बेचने की सहूलियत हो। सिंगल ट्रेडर लाइसेंस जारी किए जाएं। सब्जियां और फल मंडी कानून के दायरे से बाहर हों और टैक्स एक ही पाइंट पर लगाए जाएं।

नीति आयोग का यह भी मानना है कि एमएसपी किसानों के लिए फायदेमंद नहीं है और किसान लालच में उन्हीं फसलों (गेहूँ, चावल, गन्ना) की खेती करते हैं जिनका एमएसपी अपेक्षाकृत अधिक तेजी से बढ़ा है। वे दलहन और तिलहन की खेती में अरुचि दिखाते हैं। गेहूं, चावल और गन्ने की खेती पानी की उपलब्धता और जमीन के उपजाऊपन में कमी के लिए उत्तरदायी है। नीति आयोग प्राइस डेफिशियेंसी पेमेंट की वकालत करता है जिसमें भंडारण हेतु निर्धारित लक्ष्य के बराबर अनाज ही एमएसपी पर खरीदा जाएगा और किसान के शेष अनाज का बाजार मूल्य एमएसपी से कम होने पर किसान को 10 प्रतिशत सब्सिडी दी जाएगी। 

नीति आयोग की किसानों की आय बढ़ाने की इस कार्य योजना को देखकर यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि स्वामीनाथन आयोग की अधिकांश सिफारिशों को ठंडे बस्ते में डालने की तैयारी कर ली गई है। स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों (सन 2006) के कुछ मुख्य बिंदु निम्नानुसार थे- भूमि सुधार,भू संसाधनों की व्यवस्था, उर्वर भूमि का केवल कृषि हेतु संरक्षण, भूमिहीन कृषि मजदूरों को प्रति परिवार एक एकड़ भूमि का आवंटन, जल का समान वितरण, फ़सल की एमएसपी 50 में प्रतिशत की वृद्धि, किसानों हेतु उच्च गुणवत्ता के सस्ते बीज उपलब्ध कराना, महिला कृषकों हेतु क्रेडिट कार्ड की सुविधा, कृषि जोखिम फंड का निर्माण, प्रत्येक फसल हेतु फसल बीमा,ऋण पर ब्याज दर में कमी, प्राकृतिक आपदा की स्थिति में ब्याज माफ़ी, कृषक ज्ञान चौपाल का गठन, लघु,सीमांत तथा भूमिहीन कृषि मजदूरों हेतु निःशुल्क चिकित्सा, जीवन बीमा व पेंशन के रूप में सामाजिक सुरक्षा का प्रावधान आदि।

यूपीए की सरकार स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिए आवश्यक इच्छा शक्ति दिखाने में असफल रही और वर्तमान सरकार यह नैरेटिव बना रही है कि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों का दुरुपयोग किसानों को भड़काकर देश को अस्थिर करने हेतु किया जा रहा है और कृषि का निजीकरण ही किसानों की आर्थिक स्थिति सुधार सकता है। स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें हों या किसानों की स्थिति से सम्बंधित कोई भी चर्चा-विमर्श-आंदोलन - गैर राजनीतिक शुरुआत के बाद बड़ी हड़बड़ी में इसे राजनीतिक दलों द्वारा हाइजैक कर लिया जाता है और आगे इसका इस्तेमाल सत्ता को बनाए रखने या हासिल करने के लिए किया जाता है। सरकार द्वारा प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट कमेटी ऑन इकॉनॉमिक अफेयर्स की बैठक में  2 मई 2018 को  ग्रीन रेवोल्यूशन- कृषोन्नति स्कीम को मंजूरी दी गई। यह एक अम्ब्रेला स्कीम है जिसके अधीन 11 योजनाओं को लाया जाएगा। किसानों की आय दोगुनी करने के ध्येय से लागू की जा रही इस स्कीम पर 2017-18, 2018-19 और 2019-20 में कुल 33279 करोड़ रुपए खर्च होंगे। सरकार की तमाम योजनाओं के बावजूद वार्षिक कृषि विकास दर 2016-17 के 6.3 प्रतिशत से घटकर 2017-18 में 3.4 प्रतिशत रह गई है। 

सरकार एमएसपी डेढ़ गुना करने की अपनी घोषणा को ऐतिहासिक बता रही है। सरकार का कहना है कि वह स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों का चरणबद्ध क्रियान्वयन प्रारम्भ कर चुकी है। योगेंद्र यादव ने सरकार की घोषणा पर टिप्पणी की थी कि जब यह एमएसपी किसान की जेब तक पहुंचना ही नहीं है तो फिर डेढ़ गुने या दस गुने जैसे ऐलानों का अर्थ ही क्या है? वैसे भी योगेंद्र यादव और उन जैसे कृषि संबंधी मामलों के जानकार यह कहते रहे हैं कि एमएसपी की गणना में सम्पूर्ण लागत के स्थान पर आंशिक लागत को आधार बना कर किसानों के साथ धोखा किया गया है।

इन विशेषज्ञों के अनुसार फसल बीमा जैसी प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी योजनाएं - जिनकी सफलता का गुणगान अकसर सत्तारूढ़ दल द्वारा किया जाता रहा है- असफल रही हैं। उच्च प्रीमियम लेने और दावों का भुगतान न करने के कारण इन बीमा योजनाओं ने बीमा कंपनियों को अवश्य लाभ पहुंचाया है। किसानों के ऋण पर संसद के मानसून सत्र में 20 जुलाई 2018 को लाल सिंह वडोडिया के एक अतारांकित प्रश्न के उत्तर में कृषि और कृषक कल्याण राज्य मंत्री पुरुषोत्तम रुपाला ने बताया कि प्रति कृषि ऋण धारक औसत कृषि ऋण 2012-13 के 86343 रुपए से बढ़कर 2017-18 में 102578 रुपए हो गया। किन्तु उन्होंने यह भी कहा कि इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि बढ़ता हुआ ऋण किसानों की परेशानी की वजह बन रहा है। इससे सरकार के दृष्टिकोण का अंदाजा लगाया जा सकता है।

किसानों की आय दोगुनी करने तक ही यदि कृषि के विमर्श को सीमित कर दिया जाए तब भी आय बढ़ाने का मामला उतना सरल नहीं है जितना प्रथम दृष्टया लगता है। पूर्व कृषि सचिव सिराज हुसैन ने बीबीसी के लिए एक लेख में यह मुद्दा उठाया है कि प्रत्येक प्रदेश के किसान की वास्तविक आय अलग अलग है, आय के कम या अधिक होने के कारण भी अलग अलग हैं और इस कारण से आय बढ़ाने की कार्यनीति भी पृथक पृथक बनाकर ही सफलता अर्जित की जा सकती है। बिहार के कृषक की मासिक आय 3558 रुपए और बंगाल के कृषक की मासिक आय 3980 रुपए जबकि पंजाब के किसान की मासिक आय 18059 रुपए है। हर प्रदेश के किसानों की समस्याएं भी अलग अलग है।

हर वर्ग के किसानों की समस्याओं में भिन्नता है। सीमांत कृषकों की आय बढ़ाना कठिन है, उनके लिए आय के अन्य स्रोत खोजने होंगे। कृषि मजदूरों के लिए मनरेगा जैसी योजनाओं का कुशल संचालन जरूरी है और यह तभी हो सकता है जब सरकार राजनीतिक पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर इस योजना के महत्व को स्वीकारे। पशुपालन किसानों की आय बढ़ाने का जरिया है किंतु गोहत्या रोकने के लिए सरकारी प्रयास पशु व्यापार पर बुरा असर डालने वाले रहे हैं, रही सही कसर गोरक्षा के नाम पर मानव वध को अपनी आदत बन रहे हिंसक अपराधियों ने पूरी कर दी है।

 स्वामीनाथन आयोग ने यह रेखांकित किया था कि जनजातीय किसानों की स्थिति भयावह है और वर्षों से वनों पर आश्रित इन आदिवासियों के साथ ऐसा व्यवहार किया जा रहा है जैसे वे घुसपैठिये और वनों पर जबरन अतिक्रमण करने वाले अपराधी हैं। बड़े उद्योगों और विकास परियोजनाओं के लिए इनकी जमीन इनसे छीन ली गई है और अब ये विस्थापन का दंश भोग रहे हैं। सरकार कभी खुलकर कभी चोर दरवाजे से कभी स्वयं तो कभी राज्य सरकारों के माध्यम से भूमि अधिग्रहण कानून को कमजोर करने का प्रयास करती दिखती है जिससे आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन पर उद्योगपतियों का कब्जा हो सके। इनकी आय बढ़ाना सरकार की नीति और नीयत की परीक्षा होगी।

एक प्रश्न यह भी है कि यदि भारतीय कृषक की औसत मासिक आय 6426 रुपए प्रति कृषि परिवार (एनएसएसओ, जुलाई 2012- जून 2013 कृषि वर्ष की आय)  को आधार बनाया जाए और इसे दोगुना भी कर दिया जाए तो क्या यह कृषक के सम्मानपूर्वक जीवन यापन करने हेतु पर्याप्त होगी? यह तथ्य हमें विचलित कर सकता है कि आजादी के बाद के 70 वर्षों में जहां शासकीय कर्मचारियों की आय में 150 गुना वृद्धि हुई है वहीं किसानों की आय केवल 21 गुना बढ़ सकी। किन्तु 20 जुलाई 2018 को कृषि और कृषक कल्याण राज्य मंत्री ने सदन को बताया कि यदि किसान की औसत मासिक आय 6426 रुपए प्रति कृषि परिवार है तो उसका मासिक खर्च केवल 6223 रुपए है। इस प्रकार उन्होंने आय को पर्याप्त सिद्ध करने का प्रयास आंकड़ों के माध्यम से किया।

सरकार को अपने भंडारों में भरपूर अनाज चाहिए किंतु किसानों के पसीने की गंध से उसे परेशानी है। जिस दूसरी हरित क्रांति की वकालत प्रधानमंत्री करते रहे हैं यदि वह कृषि को निजी हाथों में सौंपने और उसके कॉरपोरेटीकरण के जरिए आने वाली है तो हो सकता है कि आने वाले समय में कृषि उत्पादन के कुछ नए रिकॉर्ड बन जाएं, यह भी संभव है कि खेती के व्यवसाय से कुछ भारतीय दुनिया के चुनिंदा अमीरों की श्रेणी में आ जाएं किंतु देश के करोड़ों किसानों और खेतिहर मजदूरों की बदहाली दूर होगी ऐसा नहीं लगता। हां, रेवड़ियां बांट कर आसानी से लुभाये जा सकने वाले और जाति- धर्म- भाषा- प्रांत- क्षेत्र आदि के आधार पर सरलता से बरगलाए जा सकने वाले वोट बैंक के रूप में उनका महत्व अवश्य बना रहेगा।

(डॉ. राजू पांडेय विभिन्न विषयों पर गहरी समझ रखने और उन पर लेखन के लिए जाने जाते हैं। आप आजकल छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में रहते हैं।) 








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