सपा-बसपा पर मुसलमानों के शक का कारण?

विश्लेषण , , बृहस्पतिवार , 14-03-2019


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प्रदीप सिंह

दिल्ली के सिंहासन का फैसला उत्तर प्रदेश के रण में होता है। सत्ता की चाबी उसी को मिलती है जो यूपी के चुनावी समर में विजयी होता है। 2019 का चुनावी समर महज सत्ता पाने या गंवाने तक सीमित नहीं रहेगा। भविष्य में दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं और आम नागरिकों के संवैधानिक अधिकार सुरक्षित रहेंगे कि नहीं इस चुनाव में तय होगा। इस क्रम में जहां विपक्ष 2014 की पहली लड़ाई में ही पस्त हो गया है वहीं अब लोकसभा चुनाव जीतने के लिए सचेत रणनीति अपनाने की बजाए अहम की लड़ाई में लगा है।

राष्ट्रीय राजनीति में उत्तर प्रदेश की अहमियत बहुत ज्यादा है। इसका एक कारण यूपी में सर्वाधिक 80 लोकसभा सीटों का होना है। तो दूसरी तरफ देश के अधिकांश प्रधानमंत्री इसी राज्य के निवासी रहे या यहीं से निर्वाचित होते रहे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इसके अपवाद नहीं हैं। 2014 में वह दो लोकसभा क्षेत्रों वाराणसी और बडोदरा से निर्वाचित हुए। लेकिन उन्होंने अपने गृहराज्य के बडोदरा क्षेत्र के बजाए वाराणसी लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व स्वीकार किया। यह उत्तर प्रदेश के राजनीतिक महत्व को दर्शाने के लिए पर्याप्त है। 

देश की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा और लोकदल का गठबंधन है। लोकदल पिछले दरवाजे से गठबंधन में शामिल हुआ है। कांग्रेस अभी गठबंधन के दरवाजे पर दस्तक दे रही है लेकिन दरवाजा खुलने का नाम नहीं ले रहा है। सपा-बसपा गठबंधन के समर्थकों, सहयोगियों और शुभचिंतकों की राय में यह गठजोड़ चुनाव में भाजपा का सूपड़ा साफ कर देगा। ऐसा कहा जा रहा है कि इन दोनों दलों का ही आधार वोट चुनाव जीतने में सक्षम है। भारी मशक्कत से दल और दिल मिलने के बाद से ही सपा-बसपा ने अपने को अजेय मान लिया है। क्या गठबंधन इतना अजेय है कि बगैर कांग्रेस के यह प्रदेश की सियासत में भाजपा को परास्त कर अपनी जीत को सुनिश्चित कर सकेगा ? 

जाति, क्षेत्र और क्षत्रपों के दबदबे वाले प्रदेश की राजनीतिक सचाई इसके उलट है। 2014 लोकसभा चुनाव के आकड़ों पर गौर करें तो बीजेपी-अपना दल को 43.2 प्रतिशत वोट मिला था। जबकि सपा ने 22.18 और बसपा ने 19.62 प्रतिशत वोट प्राप्त किया था। यदि सपा और बसपा के वोट प्रतिशत को जोड़ दिया जाये तो यह 41.8 प्रतिशत ही होता है, जोकि एनडीए के वोट प्रतिशत से कम है। पिछले आम चुनाव में रालोद-कांग्रेस साथ मिलकर चुनाव लड़े थे,  रालोद का  वोट प्रतिशत 0.85 था। इस बार वह गठबंधन के साथ चुनाव लड़ रहा है, इसलिए यदि उसके  वोट प्रतिशत को भी सपा-बसपा के वोट प्रतिशत के साथ जोड़ दिया जाये, तो भी यह 42.65 प्रतिशत ही होता है, जो कि एनडीए के वोट प्रतिशत से कम है। 

जिस जातीय आंकड़े को दम पर सपा-बसपा गठबंधन के नेता और उसके समर्थक फूले नहीं समा रहे हैं वह तमाम जोड़-तोड़ और समझौते के बावजूद एनडीए से कम पड़ रहा है। अभी सपा का मुलायम सिंह यादव, शिवपाल यादव, राजा भैया, अमर सिंह से कितना संभावित नुकसान होगा यह अलग है। इसके साथ सपा अपने को पिछड़ों की एक छत्र पार्टी कहती है लेकिन यह बात पुरानी हो गयी है। अब पिछड़ों में पटेल समुदाय में अनुप्रिया पटेल तो कुशवाहा समुदाय में केशव प्रसाद मौर्य -स्वामी प्रसाद मौर्य तो राजभर समाज के ओम प्रकाश राजभर भाजपा-एनडीए के साथ हैं। इस तरह पिछड़ा वर्ग में भी भाजपा सेंध लगा चुकी है।   

बसपा सुप्रीमो मायावती अपने को दलितों का एकछत्र नेता मानती रही हैं। लेकिन जिस तरह पिछले दस वर्षों में दलितों की अन्य जातियां दबे स्वर में पार्टी में एक विशेष जाति का वर्चस्व बताते हुए बसपा से किनारा कर लिया, उसके नुकसान का आकलन नहीं हो रहा है। चंद्रशेखर आजाद (रावण) की रणनीति चुनाव तक क्या होगी, चुनाव परिणाम पर इसका भी असर पड़ सकता है।  

इस समीकरण में सपा-बसपा गठबंधन मुसलमानों को अल्ला मियां की गाय समझ रहा है। गठबंधन को विश्वास है कि आखिर मुसलमान जाएगा कहां? गठबंधन के नेताओं का मानना है कि प्रदेश में गठबंधन ही सबसे मजबूत है इसलिए मुसलमान भाजपा को हराने के लिए मजबूरी में उसे ही वोट करेगा। लेकिन यही समझ गठबंधन को झटका भी दे सकती है। क्योंकि यह चुनाव मात्र भाजपा को हराने डर का नहीं बल्कि इस मुल्क के हर आम और खास मौके पर विभिन्न समुदायों की हैसियत क्या होगी, इसमें इसका भी निर्णय होने जा रहा है। ऐसे में अब मुसलमानों को राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे दल की तलाश है जो उसके जान-माल की हिफाजत करे और उसके लिए संघर्ष करे। वह दल चुनावी राजनीति में भाजपा को परास्त करे तो अच्छा, नहीं तो विपक्ष के रूप में बिना किसी दबाव के संघर्ष करता दिखे। 

2014 में संघ-भाजपा की सरकार बनने के बाद पांच साल तक मॉब लिंचिंग, लव जेहाद, आतंकवाद और फर्जी पुलिस एनकाउंटर में मुस्लिम युवा मौत के घाट उतरते रहे। इस पूरे परिदृश्य में सपा-बसपा गायब रही। पार्टी के शीर्ष नेता जिस तरह से पांच वर्ष तक मौन धारण किए रहे वह अप्रत्याशित है। आश्चर्यजनक रूप से सपा-बसपा संघर्ष के मानक पर फेल रहे हैं। आखिर सपा-बसपा की चुप्पी के क्या कारण हैं? यह सवाल हर आम और खास मुसलमान के जेहन में कौंध रहा है। अब जब लोकसभा चुनाव में संयुक्त विपक्ष के सामने भाजपा को शिकस्त देने का मौका है तो सपा-बसपा कांग्रेस को गठबंधन में शामिल करने से मना कर रहे हैं। आखिर क्या कारण है कि सपा-बसपा कांग्रेस को गठबंधन में शामिल नहीं करना चाहते हैं ? 

मुसलमानों को यह डर सता रहा है कि अपने को धर्मनिरपेक्ष बताने वाले सपा-बसपा उनका वोट लेकर अपने पापों को छिपाने के लिए कहीं भाजपा से अंदरखाने समझौता न कर लें। क्या यह डर अप्रत्याशित है या इसका कोई ठोस कारण भी है। प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं इलाहाबाद शहर पश्चिमी से कांग्रेस प्रत्याशी रहे सैयद मोहम्मद शहाब कहते हैं-

“मुसलमानों का रुझान कांग्रेस की तरफ दिख रहा है। क्योंकि सड़क से लेकर संसद तक कांग्रेस ही मुसलमानों के लिए लड़ती दिख रही है। राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस ही भाजपा से हर फ्रंट पर लड़ रही है। मुसलमान राष्ट्रीय स्तर पर उसी दल के साथ है जो भाजपा से लड़ रहा है। बिहार में वह राजद तो बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के साथ है। सपा-बसपा के नेता तो बीच-बीच में भाजपा सरकार को बचाते हुए दिखे। राफेल डील पर अखिलेश यादव तो संसद में मुलायम सिंह यादव नरेंद्र मोदी की शान में कसीदे पढ़ रहे थे।”

प्रियंका गांधी के आने से भाजपा के साथ ही गठबंधन भी सकते में है।अब कांग्रेस की स्थिति में सुधार की उम्मीद है। प्रियंका की अपील और रणनीति से जहां ब्राह्मणों के खिसकने से भाजपा के नुकसान होने की संभावना बनती है वहीं पर अल्पसंख्यक वोटों को खिसकने का भी खतरा बना हुआ है। जिससे सीधे सपा-बसपा प्रभावित होगी। 

प्रदेश में कई सीटों पर मुसलमान निर्णायक भूमिका में हैं। दलितों को लिए आरक्षित सीटों पर अल्पसंख्यकों की भूमिका अति महत्वपूर्ण हो जाती है। यह एक आम धारणा है कि मुसलमान मतदाता ऐसे उम्मीदवार को वोट देता है, जो उसकी नजर में भाजपा के उम्मीदवार को हराते हुए दिखता है। लेकिन पिछले कई चुनावों में बड़ी संख्या में मुस्लिम उम्मीदवार देने के बावजूद बसपा इस समुदाय का अपेक्षित वोट पाने में असफल रही है। क्योंकि एक धारणा बन गयी है कि चुनाव बाद बसपा भाजपा से गठबंधन कर सकती है। अब इस शक के दायरे में सपा भी है क्योंकि मुलायम सिंह यादव ने जिस तरह संसद में नरेंद्र मोदी को फिर से प्रधानमंत्री के रूप में देखने की चाहत दिखाई उससे अब अल्पसंख्यकों का बहुत ज्यादा भरोसा उन पर नहीं है।

मुसलमानों के सवालों पर पांच साल तक मुलायम सिंह और मायावती की चुप्पी को प्रदेश और देश का मुसलमान देखता समझता रहा है। जब तक विकल्पहीनता थी अल्पसंख्यक सपा-बसपा को वोट देते रहे। अब प्रियंका गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस एक बार फिर से दलितों,पिछड़ों और अल्पसंख्यकों का विश्वास जीतने की कोशिश में लगी है। प्रियंका यदि अपनी रणनीति में सफल होती हैं तो इस चुनाव में कांग्रेस की तरफ ब्राह्मणों औऱ मुसलमानों का आना कोई आश्चर्य नहीं होगा। सपा-बसपा गठबंधन में यदि कांग्रेस शामिल होती है तो चुनावी अंकगणित में महागठबंधन अजेय हो सकता है। यदि ऐसा नहीं होता है तो गठबंधन के मंसूबे पर पानी फिरने की आशंका बढ़ जाएगी।   

  


 

 










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