जातीय घृणा और नफरत को सत्ता के मिले संरक्षण का नतीजा है इलाहाबाद की घटना

ज़रा सोचिए... , इलाहाबाद, मंगलवार , 13-02-2018


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रमाशंकर सिंह

दिलीप सरोज एक सामान्य छात्र था, जैसे दूसरे अन्य छात्र होते हैं। वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय के एक संगठक कालेज इलाहाबाद डिग्री कालेज में कानून का विद्यार्थी था। इलाहाबाद शहर के लक्ष्मी चौराहा और कारपेंटरी चौराहा के बीच में स्थित एक सामान्य से भोजनालय के बाहर उसे पीट-पीटकर मार दिया गया। इस घटना के दो प्रकार के वीडियो सामने आ रहे हैं। कालका होटल के नाम के भोजनालय के सीसीटीवी फुटेज और होटल के बाहर से किसी स्मार्ट फोन से बनाए गए वीडियो के फुटेज।

इस घटना में दिलीप सरोज और उसके साथियों से दूसरे लोगों की कहा सुनी हुई और फिर आपस में प्लास्टिक की कुर्सियों से मारपीट की गयी। दिलीप सरोज को पहले भोजनालय के अंदर मारकर गिरा दिया गया और फिर उसे घसीटकर सीढ़ियों पर लाकर पटक दिया गया। एक बार फिर उसे डंडे और ईंट से बेरहमी से मारा गया।

भोजनालय के अंदर की घटना गुस्से से उपजी हो सकती है लेकिन सीढ़ियों पर जो घटा, वह सोच-समझकर किया गया आपराधिक कृत्य है। दिलीप सरोज को मारने वाले जैसे सुनिश्चित कर लेना चाहते थे कि वह जिंदा न बचे। उसने अस्पताल में दम तोड़ दिया।

इस घटना को कैसे देखें?

इस घटना के विश्लेषण के अलग-अलग पहलू हैं। विपक्षी पार्टियों ने राज्य सरकार को घेरते हुए कहा है कि यह प्रदेश में गिरती कानून व्यवस्था की सूचक है। दो पूर्व मुख्यमंत्रियों ने इस घटना पर क्षोभ जताया है। अखिलेश यादव ने अपने ट्विटर एकाउंट पर ndtv की रिपोर्ट को साझा करते हुए लिखा है कि बेहद दु:खद ! 26 वर्षीय दिलीप सरोज का इलाहाबाद में सरेआम क़त्ल! लाचार क़ानून व्यवस्था, बद से बदतर होती स्थिति भाजपा राज में(https://twitter.com/yadavakhilesh/status/962701681329831937). मायावती ने दोषियों को सख्त सजा देने की अपील करते हुए कहा कि पीड़ित परिवार को जरूरी मदद की जाय।

सोशल मीडिया पर इस घटना की जटिल तस्वीर सामने आयी है। दलित समूहों, कार्यकर्ताओं और छात्रों ने इस पर काफी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। दिल्ली विश्वविद्यालय के शोध छात्र और राजनीतिक एक्टिविस्ट लक्ष्मण यादव कहते हैं कि विवाद का कारण रेस्टोरेंट में पैर का छू जाना बताया जा रहा है। हत्या करने वाले लोगों के और मृतक के चेहरे व उम्र को देखिए। हम कौन सी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं? कैसे इतनी हिंसा भरती जा रही है? सत्ता व समाज में कैसे यह माहौल बनता जा रहा है कि बिना किसी लागलपेट के वह किसी मामूली सी बात पर हत्या कर देता है। यह नफ़रत कौन भर रहा है और कैसे इतनी हिम्मत हो जा रही है। यह समाज व युवाओं के लिए बहुत खतरनाक समय है। सब अपने भीतर शैतान को पाल रहे हैं, सत्ता समाज उसे खुराक दे रहे हैं।

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में शोध कर रहे और कवि विहाग वैभव फेसबुक पर काफी सक्रिय हैं। उन्होंने लिखा है कि एक दलित लड़का सिर्फ इसलिए मारा गया कि रेस्टोरेंट में उसका पैर विजय शंकर सिंह के पैर से टकरा गया।  नहीं, यह वर्ग की टकराहट थी, यह जाति की टकराहट थी, यह वह टकराहट थी जिसमें नियमों से लड़ने पर उन्हें हार महसूस हो रही है, यह एक जातीय खिसियाहट और द्वेष से उपजी हिंसा थी। उसने एक उठते हुए समाज की सोना होती पीढ़ी की हत्या की है। आप सोच सकते हैं कि इस हत्यारे को बीच बाज़ार में हत्या करने की हिम्मत कहाँ से मिली। यह हिम्मत मिली उसे सरकार की शह से। यह हमारी वर्तमान राजनीति का उत्पाद है। हमारी सरकार ने इसे बाकायदा पोषित किया। जिन्हें लगता है कि दलितों के साथ व्यवहार रखकर, उनके साथ खा-खिलाकर उन्होंने कोई उपकार कर दिया और सब कुछ बस ठीक ही होने वाला है, वे आएँ; आँखों में पानी बचा हो तो संवाद करें मुझसे।

वास्तव में हिंसा हो या राजनीति, जाति के सवाल को नेपथ्य में नहीं रखा जा सकता है। हर जिले में जो सम्पन्न और दबंग जाति है, वह अपने से कमजोर जाति पर हिंसा करती और उनकी पीठ पर चढ़कर राजनीति बनाती है। सन 2000 के आस पास से उत्तर प्रदेश में यह राजनीतिक दबंगई चरम की ओर बढ़ी जब ठेकेदारी और राजनीति, कार्यकर्ता और ठेकेदार, अपराधी और पार्टी पदाधिकारी का भेद मिटने लगा। इस सबमें जाति अधिकांश चीजें निर्धारित कर देती है। इलाहाबाद में जो घटना हुई है, उसमें जाति के दंभ के साथ बड़ी गाड़ी और किसी पार्टी विशेष से जुड़ाव का दंभ भी है। नहीं तो ऐसा न होता कि दिलीप सरोज को मारकर बेहोश करने के बाद उसे एक बार फिर मारा जाता।

छात्रों का एक समूह इसे झड़प के कारण हो गयी आकस्मिक हत्या मान रहा है। वह कहता है कि उन लोगों ने दिलीप सरोज से उसका आधारकार्ड लेकर न तो नाम पूछा और न ही जाति। यह इगो की टकराहट का मामला है। इलाहबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के डा. सूर्यनारायण कहते हैं कि ठीक है कि उनकी ऐसी कोई मंशा न थी लेकिन उन्हें यह तो पता था कि वे कौन हैं और हत्या करके वे बच सकते हैं। उन्हें अपने रसूख, बल, पैसे के बारे में बिल्कुल पता था कि वे इसके द्वारा क्या-क्या कर सकते हैं। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि आज की युवा पीढ़ी के एक हिस्से के पास एटीएम और रिवाल्वर दोनों साथ में है। यह कैसा समाज रच डाला है हमने? यह क्षोभ और शर्मिंदगी इलाहाबाद शहर के नागरिकों के लिए खतरे की घंटी है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान में परास्नातक धीरज यादव कहते हैं कि हिंसा की बढ़ती घटनाओं के पीछे युवा वर्ग की हताशा और जल्दी ही सब कुछ पा लेने की उनकी बेचैनी है। वे किसी को भी बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं। वे आगे बढ़ने के लिए कुछ भी कर सकते हैं।

घटना के बाद इलाहाबाद में हिंसा।

लोगों ने दिलीप सरोज को क्यों नहीं बचाया?

यह सवाल सबसे पहले मैं अपने आप से पूछता हूँ। मेरे पास पहले से ही तैयार बहाना है कि मैं तो दिल्ली में था। अगर घटना स्थल पर होता तो ‘कुछ’ करता। जिस तरह से हत्या का यह वीडियो घटनाओं को दिखाता है, वह बेहद चिंता जनक है। दिलीप सरोज सीढ़ियों पर बेहोश पड़ा है, उसके हत्यारे उसे डंडे से पीट रहे हैं और फिर पेट पर ईंट से मारते हैं। यह दिखाता है कि हमारे बीच एक हिंसक होता युवा समाज अस्तित्व में आ चुका है। सबसे भयावह बात तो यह है कि हिंसा इतनी साधारण हो गयी है कि वह लोगों को परेशान नहीं करती है। भारतीय समाज में हिंसा किसी कर्मकांड की तरह स्वीकार कर ली गयी है। किसी को कोई दिक्कत नहीं महसूस होती है। इस वीडियो में ही लोग बड़े आराम से जा रहे हैं, कुछ तो बहुत आराम से इसे देख भी रहे थे।

मैंने अपने एक शोधछात्र मित्र से पूछा कि यदि आप वहां होते तो क्या करते? तो उन्होंने बिना लागलपेट के कहा कि वे भाग आते। इसमें दो प्रकार के खतरे हैं। पहला आपको खुद उस हिंसा का सामना करना पड़ता और दूसरा बाद में पुलिस बेवजह परेशान करती। वास्तव में ऐसा देखा गया है कि लोग पुलिस और अस्पताल के पचड़े में नहीं पड़ना चाहते हैं, इसलिए भाग लेते हैं या आँख बंद कर लेते हैं। महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के शोधछात्र शिवम सिंह कहते हैं कि समाज की पकड़ व्यक्ति पर कमजोर होती जा रही है। सोशल मीडिया, पूंजी और लोगों के जीवन को समाज से काटकर अकेला कर दे रहा है। लोग अकेले में खुश हैं और उन्हें उनके सामने घट रही हिंसा परेशान नहीं कर रही है।

इलाहाबाद के नागरिक समाज के लोग इस हत्या से काफी क्षुब्ध हैं। एक तो इसने उस आत्ममुग्धता को फाड़कर फेंक दिया है जिसमें हमेशा इस शहर का गुणगान किया जाता है और नाक के ठीक नीचे पनप रही समस्याओं को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है दूसरा हत्याओं का एक ढर्रा सा बन गया है। पिछले तीन साल में ऐसी कई हत्याएं हुई हैं जहाँ मृतक का घटना से कोई सम्बन्ध नहीं था लेकिन उसे अपने प्राण गंवाने पड़े। इलाहाबाद की सांस्कृतिक और बौद्धिक शान समझे जाने वाले सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के परिवार के एक व्यक्ति को अपराधियों ने बम से मार डाला। इसी प्रकार शहर के एजी आफिस इलाके में एक पुलिस आफिसर के बेटे को उस समय अपराधियों ने गोली मार दी थी, जब वे खाना खाने के लिए गए थे।

पिछले बीस वर्षों में भारत के दूसरे और तीसरे दर्जे के शहरों में अपार भौतिक समृद्धि आयी है। इसी के साथ इन शहरों में महंगे होटल, अस्पताल और कोचिंग संस्थान खुले हैं। यह सब निजी हाथों में हैं और उन हाथों में काफी पैसा है। यह टैक्स से बाहर का पैसा नए किस्म के अपराध और अपराधियों को पालता-पोसता है। कोचिंग संचालकों को अपराधी धमकी देते हैं और बदले में संचालक उन्हें नकद धन देते हैं। बाकी अस्पतालों का हाल किसी से छुपा नहीं है। समृद्धि के इन छोटे द्वीपों में अपराधी अपना हिस्सा मांगते हैं और अगर वे सफल हो गए तो उन्हें पीछे मुड़कर देखना नहीं होता है। हर छोटा-मोटा अपराधी यहीं से अपनी शुरुआत करता है। पटरी से उतर गयी शिक्षा और अव्यवहारिक प्रवेश परीक्षाएं इन कोचिंगों को ऐसा ही वे होटल मालिकों और निजी अस्पतालों के साथ करते हैं। इलाहाबाद में यह अब आम जीवन दृश्य होता जा रहा है।

यह इलाहाबाद शहर के लिए अच्छी बात नहीं है.

(रमाशंकर सिंह इलाहाबाद स्थित गोविंद बल्लभ पंत संस्थान में रिसर्च एसोसिएट हैं।)

 










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