पढ़िये उस योद्धा की कहानी जिसने लड़ाई को उसके मुकाम तक पहुंचाया

शख्सियत , , रविवार , 15-04-2018


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जनचौक ब्यूरो

जम्मू। जब पूरे देश और दुनिया को हिलाकर रख देने वाली कठुआ में हुई जघन्य सामूहिक गैंगरेप और नृशंस हत्या की कोई खबर भी नहीं थी, उससे बहुत पहले एक 29 साल के नौजवान वकील ने इस 8 साल की बच्ची के लिए न्याय दिलाने के लिए संघर्ष का बीड़ा उठाया और इन तीन महीनों में इस पर देश का ध्यान खींचने में कामयाब रहे। जिस गांव और समुदाय से जुड़ी यह घटना है, तालिब हुसैन खुद उसी गांव और बकरवाल (घुमंतू मवेशी पालक) समुदाय से आते हैं। उन्होंने इसी गाँव से कक्षा 4 तक की अपनी पढ़ाई की है। सबसे पहले स्थानीय पुलिस ने उन्हें इस सवाल पर आन्दोलन करने के लिए गिरफ्तार कर लिया था।

अपनी एलएलबी की पढ़ाई पूरी करने पर हुसैन बताते हैं कि वे वकील की ट्रेनिंग के लिए दिल्ली आ गए “ लेकिन जल्द ही मेरे गाँव से बुरी खबर आने लगी। हमारे समुदाय (बकरवाल) को प्रताड़ित किया जा रहा था। पुलिस और जंगलात विभाग ने उन्हें निशाना बनाना शुरू कर दिया, उन्हें अपने जानवरों के साथ जंगल में चारा चरने से रोका जाने लगा। बड़े बूढों को रोक कर पिटाई की जा रही थी और आरोप लगाया जा रहा था कि वे गौ तस्करी कर रहे हैं, यह सुनकर मैं सब छोड़कर दिल्ली से वापस आ गया।”, और कठुआ में आकर मैंने “ आल ट्राइबल को-आर्डिनेशन कमेटी” का गठन किया। जिसके जरिये जम्मू-कश्मीर में फारेस्ट राइट एक्ट को लागू करने का हुसैन ने केंद्रीय मुद्दा बनाया।

हुसैन बताते हैं कि पहला विरोध-प्रदर्शन 17 जनवरी को हीरानगर में 8 साल की बच्ची के साथ गैंगरेप और फिर हत्या की घटना के खिलाफ किया गया। उन्होंने बताया कि “हमें शुरू से ही संदेह था कि स्थानीय पुलिस इस पूरी घटना को दबाने छुपाने का प्रयास कर रही है।”

हुसैन आगे बताते हैं कि 21 जनवरी को प्रदर्शन के बाद पुलिस गिरफ्तार कर उन्हें कठुआ के हीरानगर पुलिस स्टेशन ले गई। उन्होंने बताया कि “ दो दिन तक मुझे हीरानगर पुलिस स्टेशन में हिरासत में रखा गया। एक पुलिस अधिकारी ने मुझे कहा कि यह विरोध करना बंद कर दो। उसने धमकी दिया कि अगर मैंने यह इलाका नहीं छोड़ा तो वो मुझे पुलिस जन सुरक्षा एक्ट के तहत अंदर कर देगा।”

हालांकि एसएसपी कठुआ सुलेमान चौधरी इस बात से इंकार करते हैं कि हुसैन को दो दिन हिरासत में रखा गया। एसएसपी के अनुसार “ हुसैन को सिर्फ 4 घंटे की हिरासत में रखा गया था। वह भीड़ को इकट्ठा कर विरोध मार्च कर रहा था, पर जल्द ही उन्होंने पत्थरबाजी शुरू कर दी।”  आगे उन्होंने कहा कि “मुझे इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि किसी पुलिस महकमे ने हुसैन को पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत अंदर करने की बात कही है”। 

हुसैन द्वारा जम्मू में 30 जनवरी को आयोजित रैली ने बड़ी संख्या में इस घटना की तरफ लोगों का ध्यान खींचा। बकरवाल समुदाय के अधिकारों को लेकर हुसैन के इस आन्दोलन के पीछे उसकी खुद की कहानी है। हुसैन बताते हैं “ मुझे मालूम है किसी बकरवाल का जीवन कितना मुश्किल भरा होता है। मेरा परिवार nomad (घुमन्तू) है। वे हमेशा एक जगह से दूसरी जगह आते-जाते हैं। हमारा कोई स्थाई आशियाना नहीं होता। मेरा जन्म कुड (उधमपुर) में हुआ, जब मेरा परिवार अपने पशुओं के साथ कश्मीर घाटी की ओर प्रस्थान कर रहा था। वे आगे बताते हैं कि “उनके माता पिता 2014 की बाढ़ में मारे गए, जब उनका टेंट बाढ़ में बह गया। कक्षा 4 के बाद मेरे परिवार ने मुझे कठुआ के स्कूल में दाखिला दिलवा दिया। मैं दूसरे लोगों के घर रहकर पढ़ा। स्नातक की पढ़ाई के बाद मैंने जम्मू विश्वविद्यालय में कानून की पढ़ाई के लिए दाखिला लिया। जम्मू के एक प्रोफेसर ने मेरी पढ़ाई के पैसे दिए।”

हुसैन मानते हैं कि उनके इस एक्टिविज्म के कारण पहले भी काफी मुश्किलें आईं। “ 2013 में जम्मू विश्वविद्यालय में गोजरी और पहारी रिसर्च सेंटर की स्थापना की मांग पर आन्दोलन हुआ। पुलिस ने मेरे ऊपर हत्या के प्रयास का केस कर दिया और मुझे विश्वविद्यालय से दो साल के लिए निलम्बित कर दिया गया। अंत में 2017 में जाकर मेरी एलएलबी पूरी हुई। 2013 में ही जब पुलिस एक्शन में नगरोटा में एक ड्राईवर की मौत हो गई तब भी मैंने इसका विरोध किया और पुलिस के ऊपर कार्रवाई करने की मांग की थी। इस बार भी, मेरे ऊपर एफआईआऱ हुई और मुझे 8 दिन पुलिस हिरासत में रखा गया।” शुक्रवार की रात दाभर चौक उधमपुर में आयोजित एक टीवी डिबेट के दौरान जब उनके साथ धक्का मुक्की और मारपीट हुई, तो उस समय हुसैन पीड़िता के परिवार से मिलने गए थे।

(ये खबर इंडियन एक्सप्रेस में छपी थी और इसका अनुवाद रविंद्र पटवाल ने किया है।)




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