अटल बिहारी वाजपेयी और हमारा स्मृतिलोप

फुटपाथ , विचार-विश्लेषण, शनिवार , 18-08-2018


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अजय सिंह

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कट्टर स्वयंसेवक व भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी (1924-2018) अपनी ज़िंदगी के आख़िरी वर्षों में स्मृतिलोप से पीड़ित हो गये थे। उनकी याददाश्त चली गयी थी। जब दिल्ली में 16 अगस्त, 2018 को उनकी मृत्यु हुई, उसके बाद शोक संदेशों, श्रद्धांजलियों और मृत्यु-लेखों का तांता लग गया। इनसे पता चला कि स्मृतिलोप की बीमारी काफ़ी दूर तक फैली हुई है। इनमें से क़रीब-क़रीब सभी, कुछ महत्वपूर्ण अपवाद छोड़कर, हाहाकार व जयजयकार से भरे थे और वाजपेयी के क्रियाकलाप के बारे में गहरे स्मृतिलोप का शिकार थे।

यह स्मृतिलोप या याद न आना या भूल जाना अनायास नहीं, सोचा-समझा लग रहा था। इस भीड़ में वे लोग भी शामिल थे, जिन्हें आमतौर पर उदारपंथी, लोकतंत्रवादी व वाम-प्रगतिशील धारा से जुड़ा हुआ कहा जाता है, और जिनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे भीड़तंत्र का हिस्सा नहीं बनेंगे और धारा के विरुद्ध चलने का साहस करेंगे। वाजपेयी-जैसे घोर दक्षिणपंथी राजनीतिक नेता ने इस वैचारिक हिस्से की भी तारीफ़ और आंसू विलाप हासिल कर लिया, जिसे वाजपेयी की क़ामयाबी ही कहा जायेगा!   

यहां तक कि सीपीआई और सीपीआई (एम) –जैसी कम्युनिस्ट पार्टियां भी इस वाजपेयी बाढ़ में बह गयीं। इनकी ओर से ज़ारी संदेशों/टिप्पणियों में अटल बिहारी वाजपेयी की तथाकथित महानता का बखान तो है, लेकिन बाबरी मस्जिद विध्वंस और गुजरात जनसंहार-2002 के संदर्भ में वाजपेयी की भूमिका पर एक शब्द नहीं है। इसे क्यों और कैसे भुला दिया गया? यह बात क्यों नहीं बतायी गयी? सीपीआई के नेता अतुल कुमार अनजान ने तो वाजपेयी को ‘सेकुलर नेता’ बता दिया, और सीपीआई (एम) के महासचिव सीताराम येचुरी वाजपेयी के `अच्छे स्वभाव और मिलनसारिता’ के गुण गाते रहे। कुछ वाम-प्रगतिशील बुद्धिजीवी भी इसी सुर में हाय-आह करते पाये गये।

सिर्फ एक कम्युनिस्ट पार्टी –भाकपा-माले (लिबरेशन)—ने अपनी सुचिंतित व सुविचारित टिप्पणी में वाजपेयी का वस्तुपरक, आलोचनात्मक मूल्यांकन किया। उसने बताया कि देश की राजनीति को दक्षिणपंथी-फ़ासिस्ट दिशा देने, बाबरी मस्जिद विध्वंस और गुजरात जनसंहार-2002 के पीछे वाजपेयी के अत्यंत महत्वपूर्ण—और नेतृत्वकारी—भूमिका थी। वाजपेयी ने 5 दिसंबर 1992 को अयोध्या में कारसेवकों के बीच भाषण दिया था, जिसमें उन्होंने बाबरी मस्जिद को समतल मैदान बना देने का आह्वान किया था। गुजरात जनसंहार-2002 को न उन्होंने रोका, न कोई हस्तक्षेप किया, न तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को हटाया या बर्ख़ास्त किया। पार्टी का कहना है कि नरेंद्र मोदी के उदय और उत्थान के पीछे वाजपेयी का बड़ा भारी रोल रहा है। उनके काम और प्रोत्साहन की बदौलत ही मोदी देश के प्रधानमंत्री बने। वाजपेयी से लेकर मोदी तक के दौर के बीच जो निरंतरता और फ़र्क है, उसे समझने की ज़रूरत को पार्टी ने रेखांकित किया है।

अटल बिहारी वाजपेयी की मृत्यु के बाद उन पर पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक शंकरशन ठाकुर का लेख, सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी की टिप्पणी, पत्रकार-लेखक भाषा सिंह का लेख, स्वतंत्र पत्रकार महेंद्र मिश्र का लेख, पत्रकार व टेलीविज़न प्रस्तुतकर्ता विनोद दुआ की टिप्पणी और कुछ अन्य फुटकर (लेकिन बहुत कम) लेख वाजपेयी के असली रूप व चरित्र को समझने में हमारी मदद करते हैं। ये बताते हैं कि हाहाकार और जयजयकार से अलग रहकर, धारा के विरुद्ध जाकर और आलोचनात्मक विवेक का इस्तेमाल करके ही ढंग की पत्रकारिता और लेखन किया जा सकता है। अफ़सोस, ऐसे लेखन, ऐसी पत्रकारिता की मात्रा बहुत कम है! 

शंकरशन ठाकुर का मृत्यु लेख तो अद्भुत है। यह रचनात्मक पत्रकारिता का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह अंगरेज़ी दैनिक `द टेलीग्राफ़’ (कोलकाता) के 17 अगस्त 2018 अंक में छपा है। इसका शीर्षक है (हिंदी अनुवाद में) : `अटल बिहारी वाजपेयी : कई चेहरों वाला आदमी’। वाजपेयी के इर्दगिर्द बने-बनाये गये प्रभामंडल को यह लेख तार-तार कर देता है।

यह समझना और याद रखना बहुत ज़रूरी है कि अटल बिहारी वाजपेयी राजनेता नहीं, दक्षिणपंथी राजनीतिक नेता थे। वह स्वप्नदर्शी नहीं, व्यवहार कुशल व व्यवहारवादी (Pragmatic) थे। वह न दूरदर्शी थे, न नये भारत का सपना उनके पास था। वह भारत को फ़ासिस्ट हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते थे, और इसी दिशा में वह पूरी ताक़त से लगे रहे। वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सपने—भारत को फ़ासिस्ट हिंदू राष्ट्र बनाने के सपने—को साकार करने की दिशा में काम करने वाले अग्रणी और ख़ासे लोकप्रिय नेता थे।

(लेखक वरिष्ठ कवि और राजनीतिक विश्लेषक हैं। आप लखनऊ में रहते हैं।)








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