राम माधव के वन वे स्ट्रीट पर सत्य भी पीछे-पीछे आ रहा है

धर्म-सियासत , , बृहस्पतिवार , 07-12-2017


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रवीश कुमार

“It was an act of vandalism against a mosque and against India’s constitution. On December 6,1992, when the kar sevaks felled the Babri masjid in Ayodhya, the also demolished the assuarance that vitally underpins the compact between the people and the state.”

इंडियन एक्सप्रेस के संपादकीय का यही मतलब हुआ कि भारत के संविधान और एक मस्जिद के ख़िलाफ़ वो विध्वंस की कार्रवाई थी। 6 दिसंबर 1992 को जब अयोध्या में कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद गिराई, उन्होंने राज्य और जनता के बीच के क़रार के लिए बेहद ज़रूरी आश्वासनों को भी ध्वस्त कर दिया।

राम माधव का लेख।

“When the movement was launched, we didn’t have too many arguments to satisfy the ‘eminent intellectuals’ of our country and abroad. We were inspired by the simple yet profound desire to see the Ram mandir come up on the very spot which was believed to be his birthplace. There stood a structure, a non- functional mosque and a functional temple,described as the Babri masjid. Ram was a sufficient enough reason for millions of ordinary Indians to join the movement. Logic came later, arguments and evidence were developed later.”

बीजेपी के महासचिव राम माधव के लेख के इस हिस्से का मतलब है कि जब यह आंदोलन शुरू हुआ तब हमें दुनिया और देश के महत्वपूर्ण बुद्धिजीवियों को संतुष्ट करने के लिए तर्क नहीं थे। हमारे लिए राम करोड़ों साधारण भारतीयों के लिए इस आंदोलन में शामिल होने के लिए अपने आप में पर्याप्त कारण थे। तर्क बाद में आए, बहस और साक्ष्य बाद में विकसित हुए।

इंडियन एक्सप्रेस के संपादकीय और उसी के बगल में छपे बीजेपी नेता राम माधव के लेख में दो दुनिया का फर्क है। बीच में एक और लेख है प्रताप भानु मेहता का। एक्सप्रेस के लेख में जिस गुंडागर्दी और संविधान के विध्वंस का ज़िक्र है वह राम माधव के लेख में पूरा ही ग़ायब है। राम माधव संविधान से किए गए वादे को तोड़ना और विध्वंस की बात नहीं करते हैं। उसे चोरी से छिपा देते हैं। बहुत चालाकी से भावना को तर्क और साक्ष्य से ऊपर रख देते हैं।

6 दिसंबर 1992 के बाद के नैरेटिव की यही लड़ाई है। मंदिर बनाने वाला तबका भावनाओं को उभारते रहता है और इस प्रक्रिया में मस्जिद को तोड़ने की साज़िश की बात को सिरे से ग़ायब कर देते हैं। वो एक अपराध था जो सिर्फ मस्जिद ध्वस्त करने तक ही सीमित नहीं रहा, उसकी प्रतिक्रिया में पीढ़ियां बर्बाद हो गईं। दंगों में लोग मारे गए। राम माधव उस अपराध की बात नहीं करते हैं। वो जिसे राम जन्म भूमि आंदोलन कहते हैं उसका हिस्सा है यह अपराध जिसकी ज़िम्मेदारी न तो अपने लेख में लेते हैं और न ही जिस पर बात करते हैं। बीबीसी हिन्दी पर इंडियन एक्सप्रेस के प्रवीण जैन ने लिखा है कि कैसे एक दिन पहले मस्जिद तोड़ने का अभ्यास किया गया और अगले दिन तोड़ दिया गया। प्रवीण जैन ने भेष बदल कर अभ्यास की तस्वीरें भी ली थीं।

राम माधव और उनकी टोली मंदिर निर्माण को लेकर फिर वैसा ही शोर मचा रही है जिसमें तर्क और तथ्य न हो, सिर्फ भावनाओं का बवंडर हो। यह बवंडर इसलिए मचाया जा रहा है ताकि फिर से नौजवानों के ख़ून में आने वाले महीनों में उबाल पैदा किया जा सके। भावनाओं का ज्वार उठ रहा है क्योंकि राजनीति के पास अब किए गए वादों का जवाब नहीं है। वह नौकरी नहीं दे सकती, अच्छी शिक्षा नहीं दे सकती। फिर से सत्ता में आने के लिए राम चाहिएं। राम के नाम पर उबाल चाहिए। इसीलिए युवाओं में फिर से मंदिर के बहाने हिंसा की सनक पैदा की जा रही है। अगर राम माधव एक विशालकाय मस्जिद के ढांचे को गिराने की साज़िश, अभ्यास और उसे लेकर झूठ बोलने के इतिहास पर बात करते तो शायद आज का नौजवान झांसे में नहीं आता। वो इतना फर्क करना जान गया है कि मंदिर बनाने के लिए यह सब करना ज़रूरी नहीं है।

6 दिसंबर के बाद की राजनीति ही इस बुनियाद पर टिकी है कि किसी तरह तर्कों और तथ्यों को हाशिये पर धकेलते रहें। बदले में इतना शोर मचाओ कि लोग 6 दिसंबर के अपराध को भूल जाएं और थक हार कर मंदिर-मंदिर करने लगे कि भाई बना लो। एक तरह से इस मुद्दे के ज़रिए जनता को ही यातना दी जा रही है ताकि बदले में यातना देने वालों को सत्ता मिल सके। इसीलिए अब कोई भी उस अपराध की बात नहीं करता जो भारत के संविधान के साथ किया गया, सब जल्दी से मंदिर निर्माण की बात करते हैं।

टीवी की बहस में यह सवाल इस अंदाज़ में पूछा जाता है कि बताओ वहां मंदिर बनना चाहिए या नहीं। यही सवाल जब तीस साल से पूछा जा रहा था तो जवाब आता था कि जो अदालत का फैसला होगा। अब फिर से यह सवाल पूछा जा रहा है। मंदिर बनेगा या नहीं बनेगा। पूछने वाले फिर से तथ्यों और तर्कों को किनारे लगा रहे हैं। वो इस बात की संभावना पैदा ही नहीं होने दे रहे हैं कि आप कह सकें कि मंदिर तो बनना चाहिए मगर तुम बताओ कि मस्जिद तोड़ने वालों को सज़ा मिलनी चाहिए कि नहीं। क्या उस साज़िश में सवाल पूछने वालों की तरफ़ के लोग नहीं थे? क्या उस घटना के बाद हुई हिंसा में देश के अन्य इलाकों में लोग नहीं मारे गए? संविधान और सुप्रीम कोर्ट से वादा ख़िलाफ़ी करने वाले राज्यपाल क्यों हैं? क्या कानून तोड़ने वालों को ताज पहनाना चाहिए?

राम माधव ने लिखा है कि हमारे लिए राम जन्मभूमि का मसला एक तरफा सड़क का है। वन वे स्ट्रीट यानी जिस पर दूसरी तरफ से गाड़ी नहीं आ सकती। आप पीछे की तरफ नहीं लौट सकते हैं। राम माधव को वन वे स्ट्रीट के बारे में कुछ नहीं पता है। वे बेशक आगे की कार में चल रहे हैं क्योंकि सत्ता में है, इसलिए उन्हें उसी वन वे स्ट्रीट पर पीछे आती कारें नहीं दिख रही हैं। उन्हें मुड़कर देखने की ज़रूरत भी नहीं मगर पीछे की कार में बैठे लोग उन्हें देख रहे हैं। पीछे की गाड़ियां भी वन वे स्ट्रीट में अपना सफर तय करती है। वो भी एक न एक दिन पहुंचेगी भले ही राम माधव के पहुंचने के बहुत दिनों बाद पहुंचे।

इस एकतरफा सड़क पर दो लोग चल रहे हैं। जिनके पास भावना के नाम पर झूठ है, संविधान के साथ धोखा है और ध्वंस है और दूसरे लोग जो बहुत पीछे हैं जिनकी कार की क्षमता कमज़ोर है, उनके पास सुप्रीम कोर्ट से किया गया वादा है, साज़िश कर मस्जिद को ढहाने और दंगा कराने की राजनीति के प्रमाण हैं। इस वन वे स्ट्रीट पर दोनों की कार आगे पीछे होती रही है।

मर्यादा राम सत्य पर चलने के कारण ही मर्यादा कहलाए और पूजे गए। राम माधव जिसे आंदोलन बता रहे हैं उसके साथ कई झूठ भी हैं। फरेब भी है। हिंसा भी है। हत्या भी है। ये सारे सवाल एक न एक दिन उस वन वे स्ट्रीट पर पहुंचेंगे जिस पर इस वक्त राम माधव आगे हैं। कम से कम जब राम को लेकर आस्था और भावना की बात हो तो उनके लेख में विध्वंस का अपराध और संविधान से वादा ख़िलाफ़ी का भी ज़िक्र हो सकता था। मर्यादा राम सत्य के प्रतीक हैं, उनके नाम पर बने मंदिर की बुनियाद में भावनाओं के नाम पर झूठ और अपराध होगा, यह मेरे राम को बर्दाश्त नहीं होगा।

गुजरात के महुआ में मुरारी बापू का आश्रम है। उस आश्रम में राम, लक्ष्मण और सीता की तस्वीर है। किसी भी तस्वीर में हथियार नहीं है। तीर धनुष कुछ नहीं। हमने बचपन से राम की तस्वीर अकेले नहीं देखी। हमेशा उस तस्वीर में तीन लोग रहे। आरएसएस और विश्व हिन्दू परिषद ने कैलेंडर से लक्ष्मण और सीता को निकाल दिया। धनुष चलाते राम को खड़ा कर दिया। मुरारी बापू से पूछा था कि आपके राम के पास हथियार क्यों नहीं हैं। उनका संक्षिप्त सा जवाब था। मेरा राम अहिंसक है। समाज का राम कैसा है, ख़ुदा जाने। यह कह मुरारी बापू आसमान की तरफ देखते हुए चुप हो गए। मुरारी बापू के राम भी करोड़ों लोगों के राम हैं। अहिंसा का धारण वही करता है जो सत्य का धारण करता है।

(ये लेख रवीश कुमार के ब्लाग कस्बा से लिया गया है।)






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