लाल श्याम शाह-एक आदिवासी की कहानी: व्यक्ति और उसके समय की दिलचस्प गाथा

उर्मिलेश की कलम से , , बुधवार , 20-03-2019


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उर्मिलेश

किसी किताब की समीक्षा लिखनी है तो उसे पढ़ने के बाद जल्दी ही लिख देना चाहिए। देर होने पर लिखना मुश्किल होता जाता है। इस किताब को पिछले साल पढ़ गया था पर उस वक्त चाहते हुए भी कुछ लिख नहीं सका। लेकिन हिन्दी पाठकों को इस किताब के बारे में बताना जरुरी था! आज सुबह-सुबह यह मौका मिला। 

किताब है- 'लाल श्याम शाह: एक आदिवासी की कहानी!' सन् 2018 में छपी (यश पब्लिशर्स एण्ड डिस्टीब्यूटर्स, दिल्ली) इस किताब के लेखक हैं: सुदीप ठाकुर। पेशे से पत्रकार सुदीप मूल रूप से छत्तीसगढ़ के हैं लेकिन बीते कई सालों से वह दिल्ली में पत्रकार हैं। 

इस किताब की प्रस्तावना प्रसिद्ध लेखक और स्तम्भकार रामचन्द्र गुहा ने लिखी है। अपनी प्रस्तावना में उन्होंने बिल्कुल सही लिखा है: 'जीवनी लेखन हमारे देश में एक अविकसित विधा है। हम भारतीय जीवित लोगों का गुणगान करना तो जानते हैं लेकिन किसी दिवंगत शख्सियत के बारे में गहराई और अधिकारपूर्वक लिखना नहीं जानते। भारत में काफी समय से ऐसी सुघड़ जीवनियों के अभाव पर अफसोस होने के बाद मुझे लाल श्याम शाह पर सुदीप ठाकुर की जीवनी पढ़कर अच्छा लगा। यह किताब कुशलतापूर्वक व्यक्ति को उसके समय के साथ जोड़ती है।' 

इस किताब के बारे में गुहा की यह अंतिम पंक्ति बहुत महत्वपूर्ण है। सुदीप ने मध्य भारत के बड़े आदिवासी नेता और आजादी के बाद विधायक और फिर सांसद चुने गये लाल श्याम शाह की जीवन-कहानी कहते हुए उनके समय और उसके इतिहास को बहुत क़रीने से खंगाला है! किताब में लाल श्याम शाह की जिंदगी की दास्तान और मध्य भारत के उस इलाके में हो रहे समाजिक, आर्थिक और राजनीतिक घटनाक्रमों की कहानी साथ साथ चलती है! सिर्फ मध्य भारत ही नहीं, आजादी के बाद देश में उभरती नयी-नयी समस्याओं और जटिलताओं की भी इसमें ढेर सारी सूचनाएं हैं! जीवनी को पढ़ते हुए आजादी के बाद के अनेक घटनाक्रमों, अलग-अलग ढंग की आबादियों के स्थान-परिवर्तन, विस्थापन, राजनीतिक-प्रशासनिक योजनाकारों की गलतियों और भविष्य को प्रभावित करने वाले उनके अनेक सही-ग़लत फैसलों के बारे में मुझे भी कई चौंकाने वाली जानकारी मिली।

पुस्तक का पहला अध्याय 'विभाजन की त्रासदी और दंडकारण्य' इस तरह के अनेक तथ्यों को उद्घाटित करता है। विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से आए शरणार्थियों/विस्थापितों को पश्चिम बंगाल ही नहीं, दिल्ली के बाद दंडकारण्य में भी बसाया गया! आज के छत्तीसगढ़, ओडिशा और मध्य प्रदेश के किन सुदूर और सघन वन क्षेत्रों में इन्हें मुश्किलों और चुनौतियों के बीच बसाया गया, सुदीप इसकी कहानी पूरे ब्योरे के साथ बताते हैं! राजनांदगांव के मोहला-पानाबरस स्थित पूर्व जमींदारी रियासत में आदिवासी राजकुमार के रूप में पैदा हुए लाल श्याम शाह किशोरावस्था और युवावस्था में इन तमाम घटनाक्रमों के गवाह रहे! संपन्न परिवार में पैदा होने के बावजूद वह आम लोगों, ख़ासकर आदिवासी समाज के बीच एक सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता के तौर पर उभरे! सन् 1951-56 के दौरान वह दो बार निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर विधायक चुने गए। सन् 1962 में वह चांदा (अब चंद्रपुर) से लोकसभा के सदस्य चुने गए। वह भी निर्दलीय। इससे उनकी लोकप्रियता का अंदाजा लगाया जा सकता है। 

विभाजन के बाद दंडकारण्य में जिस तरह बांग्ला विस्थापितों/शरणार्थियों को बड़े पैमाने पर बसाया जा रहा था, उसका लाल श्याम शाह ने खुलकर विरोध किया। गोंडवाना क्षेत्र की समस्यायों और उभरती चुनौतियों के बारे में वह हुक्मरानों को लगातार अवगत कराते रहे। जब उन्हें लगता कि शासन की ओर से ठोस और जरुरी फैसले नहीं हो रहे हैं तो वह आंदोलन और प्रतिरोध का रास्ता भी अख्तियार करते रहे! सन् 1964 में आदिवासियों की उपेक्षा और बाहर से लाकर बसाये लोगों के चलते स्थानीय आबादी पर बढ़ते दबाव के मुद्दे पर उन्होंने लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दिया। 

सुदीप ने बड़े जतन और शोध करके लाल श्याम शाह के निजी और राजनीतिक जीवन के अहम घटनाक्रमों को इस किताब में दर्ज किया है। 

इस किताब से भी यह भी पता चलता है कि हम भारतीय अपने निकट अतीत के घटनाक्रमों को भी किस लापरवाही से नजरंदाज करते हैं या भुलाते रहते हैं! शाह के जीवन से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण तथ्यों को एकत्र करने में उन्हें भारी मशक्कत करनी पड़ी। दूसरे अध्याय में लेखक ने मोहला-पानाबरस रियासत का इतिहास दर्ज किया, जो बहुत खूबसूरत ढंग से लिखा गया है। औपनिवेशिक हुकूमत के दौरान इस इलाके में सबसे पहले डिप्टी कमिश्नर बनकर आए स्टेनली डब्ल्यू काक्सन ने कैसे गोंड आदिवासी समाज के बीच ब्रिटिश राज-काज का चतुराई से विस्तार किया, लेखक ने इसका बहुत रोचक और तथ्यात्मक वर्णन किया है। स्टेनली ने सिर्फ यहां प्रशासन ही नहीं चलाया, उसने इस इलाके पर किताब भी लिखी। संभवतः वह इस क्षेत्र के बारे में पहली किताब रही होगी। आजाद भारत में हम आज पसंद करें या न करें, सच ये है कि अंग्रेज अफसरों की लिखी ऐसी किताबें और इंपीरियल गजेटियर ही उस दौर के भारतीय इतिहास के कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं। 

आजाद भारत में संविधान लागू होने के बाद बदलते हुए दंडकारण्य की कहानी बाद के अध्यायों में सिलसिलेवार दर्ज की गई है। मेरे जैसे पाठक को इस किताब से ही पता चलता है कि पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से लेकर राजीव गांधी के जमाने तक लाल श्याम शाह सियासत में लगातार सक्रिय रहे! उनका निधन मार्च, सन् 1988 में हुआ। पर इतना बड़ा आदिवासी नेता एक आदिवासी बहुल इलाके की सियासत में अहम भूमिका क्यों नहीं हासिल कर सका? कोई भी राजनीतिक दल उन्हें आकर्षित नहीं कर सका या या कोई भी दल उन जैसे बेलाग और निर्भीक आदिवासी नेता को स्वीकार करने में हिचकिचाता रहा? अपने सूबे की राजनीति में उनकी भूमिका झारखंड के जयपाल सिंह मुंडा या शिबू सौरेन की तरह बहुआयामी और व्यापक आदिवासी जनजागरण के सूत्रधार की क्यों नहीं दिखाई देती? किताब के आखिरी अध्यायों को पढ़ते हुए ऐसे कुछ सवाल मेरे दिमाग में उठते रहे?

यह किताब हिन्दी पाठकों के लिए एक सुंदर उपहार है!

(उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार हैं और राज्यसभा टीवी के संस्थापक कार्यकारी संपादक रहे हैं।)








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