एक कंगाल कंपनी की झोली भर रही है मोदी की 59 मिनट की लोन योजना

मुद्दा , , सोमवार , 19-11-2018


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विवेक राय

मैडम, अब तो मोदी जी ने 59 मिनट में लोन देने का वादा कर दिया और आप ये पेपर और वो पेपर मांग रही हैं, ऐसे तो बात वहीं की वहीं है। गर्दन ऊपर उठा कर मुंह में उछलते गुटके को संभालते हुए लाल-लाल होंठों की मुस्कान के साथ उन्होंने अगला अन्तरा बोला, मोदी जी जो चाहे कर लें पर आप लोगों के सरकारी काम का तरीका नहीं बदलता। दिल्ली में बैंक आफ इंडिया की पंचशील ब्रांच में अधेड़ उम्र के लोन आवेदक बृजलाल मौर्या ने बैंककर्मी महिला को अपने तंज से लगभग आग के शोले में रूपांतरित कर डाला।

जवाब में बैंककर्मी श्रुति (बदला हुआ नाम) ने झल्लाते हुए कहा, सर मोदी जी को क्या करना है, बस मुंह उठा के बोल देना है कुछ भी। जब चाहें नोटबंदी कर दें जब चाहें नोट बांट दें। करना तो हमको है और गालियां भी हम बैंक वालों को खानी हैं। लोन बंट रहा है तो क्या आप पेपर नहीं देंगे अब? आप तो ऐसे मांग रहे हो जैसे मैंने अपने पर्स में धरे हैं एक करोड़ और जो आये उसे निकाल कर देती फिरूं। मोदी ने 7 दिन पहले घोषणा की है और आप तीन चक्कर लगा चुके हैं पर पेपर नहीं ला पा रहे। सरकारी काम करने का तरीका अच्छा नहीं है सर तो मोदी जी से ही बोल दो इस तरीके को बदल दें, वैसे ही जैसे राफेल में सब बदल डाला। इतना भर कहना था और बैंक मौर्या जी के खिसियाये ठहाकों से गूंज उठा।

बृजलाल मौर्या ने इस संवाददाता को बताया, क्योंकि मोदी जी के स्वच्छ भारत अभियान को वो बहुत सपोर्ट करते हैं इसलिए प्लास्टिक बोतल क्रश करने वाली मशीन लगाना चाहते हैं और उसी के लिए लोन लेने आये हैं। अब जब मोदी जी ने 59 मिनट में लोन की सुविधा दी है तो ये बैंक वाले सा...बदमाशी करेंगे ही जैसे नोटबंदी में की थी। 

32 वर्षीय श्रुति से इस विवाद के बारे में पूछने पर उन्होंने कहा, देखो सर मैं ज्यादा वक़्त तो आपको नहीं दे सकती हूं पर मोटा-मोटी इतना जान लो कि 59 मिनट में कोई लोन नहीं मिल रहा। लोन आपको तब तक नहीं मिला मानना चाहिए जब तक कम से कम डिसबर्स ना हो जाए। 59 मिनट में तो सिर्फ आपका पंजीकरण ही हो रहा है, अब इसमें ऐसा कहीं नहीं है कि आपको कोलैटरल नहीं देना या जो सम्बंधित पेपर हैं वे नहीं देने या और किसी तरह की रियायत है।

पास खड़े एक युवक रचित को भी इसी लोन की दरकार थी। रचित ने बताया कि यस बैंक मालचा मार्ग ब्रांच में वो लोन लेने गए थे पर उनसे वहां कोलेटरल मांगा गया जिससे वो संतुष्ट नहीं और इसी को क्रॉस चेक करने के लिए आज यहां आये हैं। हालांकि रचित ने ये भी कहा कि उनको यस बैंक वाले कर्मी की कई बातें सही जान पड़ती हैं और इस संवाददाता को भी उस बैंक में जा कर रिपोर्ट पूरी करने की सलाह दी।

इस क्रम में यस बैंक के एक वरिष्ठ कर्मी से बैंक समय के बाद मिलना तय हुआ। अपना नाम नहीं छापने की शर्त पर उन्होंने बताया कि 59 मिनट में लोन देने का दावा इतना बड़ा घपला है जिसे आप सोच भी नहीं सकते। फिर उन्होंने एचडब्ल्यू न्यूज़ का हवाला देते हुए सारा लोचा विस्तार से बताया।

मान लो विकास नाम का एक व्यक्ति लोन लेने के लिए  psbloans59minutes.com पर आवेदन भरता है। लोन के नाम पर उसे 1 लाख 48 हज़ार रुपये दिये जा सकते हैं ऐसा एक अधिकृत पेपर पर लिखा है जिसे “इन प्रिन्सिपल एमाउंट” कहा गया और उससे 1180 रुपये आवेदन करने के लिए चार्ज किये जाते हैं। ये 1180 रुपये किसने और क्यों लिए इसी में सारा घपला छिपा है।

सबसे पहली बात ये कि बैंक स्वतः लोन देने पर प्रोसेसिंग फीस लेता है, पर सिर्फ आवेदन करने के लिए कोई फीस नहीं लेता। तो बिना लोन स्वीकृत हुये ही प्रोसेसिंग का ये पैसा किसने और क्यों लिया? ‘59 मिनट में लोन लो’ जैसी घोषणा प्रधानमंत्री ने की और लोन देंगे सरकारी बैंक तो बीच में ये पैसे “कैपिटल वर्ल्ड प्लेटफार्म प्राइवेट लिमिटेड” नामक कम्पनी क्यों ले रही है? ये कम्पनी गुजरात के नवरंगपुर, अहमदाबाद में पंजीकृत है।

“कैपिटल वर्ल्ड प्लेटफार्म प्राइवेट लिमिटेड” वर्ष 2015 में अस्तित्व में आई और 30 मार्च को गुजरात के ही जिनांद शाह नामक व्यक्ति जब इसके निदेशक बने तब इसकी कोई आय नहीं थी| एक अन्य गुजराती विकास शाह अप्रैल 2016 में निदेशक सूची में शामिल हुए पर अभी भी आय शून्य है, जबकि 2017 में कुल 15680 रुपये की आय हुई। अगस्त 2018 में इस कंपनी के बोर्ड आफ डायरेक्टर्स में अखिल हांडा शामिल होते हैं जो कि 2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार में प्रशांत किशोर के साथ मोदी के काफी करीबी रहे थे| और अब यहां से कम्पनी की शक्ल ताबड़तोड़ बदलने लगती है।

थोड़ी देर के लिए कंपनी की कहानी को यहीं छोड़ कर 59 मिनट लोन पर आते हैं। 20 जनवरी 2018 को सरकार 59 मिनट सर्विसेज को चलाने के लिए एक टेंडर करती है जिसमें विश्वसनीय और बेहतर ट्रैक रिकार्ड होने के साथ 50 करोड़ के टर्नओवर वाली कम्पनी ही टेंडर डाल सकती थी। साथ ही डाटा मैनेजमेंट और सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट वाली कम्पनी प्रोफाइल होना भी अनिवार्य था। तो फिर टीसीएस, इन्फोसिस जैसी कम्पनी जो पहले से भारत सरकार में इस तरह के प्रोजेक्ट्स कर रही हैं और उनका अनुभव भी बहुत है, उनको छोड़ इस नयी और बच्चा कम्पनी को कैसे ये ठेका मिला? जब कम्पनी की वार्षिक आय ही 15 हज़ार है तो कैसे उसे ये प्रोजेक्ट मिल गया?

कम्पनी की प्रोफाइल खोलने पर कहीं भी उसके सॉफ्टवेयर डेवलपर होने का ज़िक्र नहीं है। इसका अर्थ है कि मोदी के 59 मिनट प्रोजेक्ट के लिए ही इस कम्पनी को बनाया गया है जिसे अर्थशास्त्र में क्रोनी पूंजीवाद कहते हैं। लोन लेने के लिए कम्पनी को लोन आवेदकों की सारी डिटेल्स दी जाएंगी, जैसे जीएसटी नंबर, लॉग इन आईडी पासवर्ड, इनकम टैक्स रिटर्न का लॉग इन और पासवर्ड, बैंक डिटेल्स इत्यादि। ऐसी संवेदनशील जानकारियां किसी कंपनी के पास होने के सूरतेहाल सोचा जा सकता है कि लोग कितने असुरक्षित जोन में होंगे?

अब इस उपक्रम में सिडबी को भी शामिल कर लिया गया है। सिडबी इस कंपनी में 60% का हिस्सेदार है। तो सवाल ये उठता है कि फिर सिडबी खुद क्यों नहीं ये प्रोजेक्ट कर रहा? लोन का आवेदन करने मात्र पर लिया जा रहा पैसा कैपिटल वर्ल्ड के पास जा रहा है और लोन हो जाने पर .3% का प्रोसेसिंग चार्ज बैंक भी लेगा। अब अगला सवाल ये है कि यदि लोन नहीं हुआ तो क्या कैपिटल वर्ल्ड को मिले आवेदन वाले पैसे वापस होंगे? जवाब है, नहीं। दरअसल, कैपिटल वर्ल्ड की किसी गड़बड़ी पर कोई जवाबदेही तय नहीं है।

15000 की आय वाली कम्पनी 1080 रूपए प्रति आवेदक के हिसाब से लेकर कितना पैसा छापने वाली है वो भी तब जब अब तक लगभग 1 करोड़ आवेदन आ चुके हैं, अनुमान लगा लीजिये। लोन मिले न मिले पर ये कम्पनी 31 दिसम्बर तक भारत में इस कदर लूट मचाने वाली है जितना अंग्रेज 200 साल के राज में भी नहीं लूट सके थे।

59 मिनट लोन का असल सच ये है कि आपकी इनकम और जीएसटी रिटर्न को ऑनलाइन चेक कर कैपिटल वर्ल्ड प्लेटफॉर्म नामक एक कम्पनी सिर्फ इतना बता देगी कि आपको कितना लोन मिल सकता है। इसे ही ‘इन प्रिंसिपल अमाउंट’ कहते हैं। कम्पनी वेरीफिकेशन के लिए ग्राहक से 1180 रुपए भी वसूलेगी। यह रकम पहले भी वसूली जाती थी पर अलग-अलग बैंक ब्रांच की विभिन्न एजेंन्सियां ये काम करती थीं जो अब सिर्फ कैपिटल वर्ल्ड प्लेटफॉर्म कम्पनी के पास चला गया है। इससे जहां एक तरफ रोज़गार को धक्का लगेगा वहीं निजता के अधिकार की भी धज्जियां उड़ाई जाएंगी।

जब इस स्कीम में नया कुछ है ही नहीं सिवाय इसके कि सब आवेदकों के पैसे पर एकाधिकार एक कम्पनी का हो जायेगा तो फिर क्या कारण है जो यह स्कीम मोदी जी के श्रीमुख से घोषित करायी गयी? इसी सवाल को सामने रख कर यदि देखा जाए और जांच कराई जाए तो इस 59 मिनट लोन के घपले की परतें रफाल की तरह धीरे-धीरे खुलने लगेंगी। चौकीदार की चौकीदारी पर अंध-भरोसा न कर समझना चाहिए कि मोदी सरकार में सवारी अपने सामान की जिम्मेदार खुद है। इसलिए न भेड़ बनें और न भेड़िये पर भरोसा करें।

(ये लेख विवेक राय के फेसबुक से साभार लिया गया है।)


 










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