कांग्रेस एक सीमा से ज्यादा न सांप्रदायिक हो सकती है और न संघ एक सीमा से ज्यादा उदार

विमर्श , , शुक्रवार , 21-09-2018


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अशोक कुमार पांडेय

कांग्रेस और बीजेपी में अन्तर बताते अक्सर उत्साही मित्र बह जाते हैं। सरलीकरण का शिकार होकर भाजपा-गाय = कांग्रेस जैसी थियरी देने लगते हैं।

पहला तो यह गाय क्या चीज़ है? गाय की पवित्रता का सिद्धांत कांग्रेस और भाजपा से आगे आधुनिक काल में हिन्दू धर्म के साथ गहरे जुड़ा है और इसी प्रक्रिया में इस्लाम के समक्ष एक प्रत्यक्ष अन्तर की तरह स्थापित हुआ है। आप देखिए तो मध्यकाल में गो हत्या रोकना और खुलेआम उसकी इजाज़त देना इस्लामी शासकों के "सेकुलरिज़्म" का प्रतीक बनता गया और गो हत्या को दंडनीय बनाना हिन्दू शासकों की "योग्यता" का प्रतीक।

कश्मीर की बात करूं तो डोगरा शासकों ने गोहत्या पर मृत्युदंड तक की तजवीज़ की जो मुसलमानों में गुस्से और विद्रोह के कारणों में से एक बना। यही समय था जब मदनमोहन मालवीय एक तरफ़ इलाहाबाद में मोतीलाल नेहरू को बीफ ईटर और विधर्मी बता रहे थे तो दूसरी तरफ़ गो रक्षा का आंदोलन लेकर जम्मू पहुंच गए जहां आधुनिक इतिहास का पहला साम्प्रदायिक दंगा हुआ।

तो गाय का अंतर कोई छोटा अंतर नहीं है। यह संघ, हिन्दू महासभा जैसे संगठनों के प्रचंड मुस्लिम विरोध का प्रतीक है, उग्र साम्प्रदायिकता के दंगाई स्वरूप का प्रतीक है।

कांग्रेस कोई क्रांतिकारी दल कभी नहीं रहा है। यह अपने मूल स्वरूप में एक अम्ब्रेला पार्टी रही है, सबको साथ लेकर चलने वाली पार्टी जिसके भीतर हिन्दू रुझान के लोगों का बहुमत स्वाभाविक रूप से रहा। इसके प्रगतिशील और यथास्थितिवादी तबकों के बीच एक द्वंद्व तो रहा लेकिन आज़ादी की लड़ाई की वह विरासत है जिसमें इसने सबको साथ लेकर चलना सीखा। आख़िर मालवीय हिन्दू महासभा में चले गए थे और भी कई लोग।

कांग्रेस के अंदर एक सीमा से अधिक साम्प्रदायिक होना न तब सम्भव था न अब। यही नहीं, आज़ादी के बाद नेहरू के हाथ में नेतृत्व आने पर कम से कम सेकुलरिज्म पर पार्टी काफी आगे तक गई। सेकुलर संस्थाएं और संविधान बना। अम्बेडकर के योगदान को कोई कम करके नहीं आंक सकता लेकिन अगर नेहरू न होते साथ तो उसे लागू करवा पाना असंभव था, उदाहरण हिन्दू कोड बिल है। मैं निजी तौर पर इस संविधान का श्रेय नेहरू को भी उतना ही देता हूं।

आज जो कांग्रेस है वह इसी लीगेसी से आई है। इसलिए उसके भीतर के ढेरों लोग भाजपा में आसानी से चले जाते हैं लेकिन कांग्रेस में रहते उनके सुर अलग होते हैं और नेतृत्व के तौर पर कांग्रेस साम्प्रदायिकता के साथ खड़ी नहीं हो सकती, छोटे मोटे विचलनों (शाहबानो का उदाहरण है ही) के बावजूद। इसलिए कांग्रेस के पास दंगाइयों की वैसी टीम कभी नहीं रही, संजय गांधी के समय भी नहीं। इसलिए 1984 के दंगों के बारे में समझना होगा कि सिख घृणा कांग्रेस की विचारधारा में विन्यस्त नहीं है, कभी नहीं रही। 

वह एक भयानक दौर था जो आकर चला गया, उसमें भी संघी लोगों की जो भागीदारी रही वह कोई छिपी बात नहीं है और उसके बाद कांग्रेस ने इस सिख घृणा को वोट के लिए बढ़ावा नहीं दिया बल्कि माफ़ी मांगी। फेसबुक की सीमा है कि विश्लेषण एक सीमा से अधिक नहीं हो सकता। कांग्रेस की पैन इंडियन बनावट को भी ग़ौर से समझने की ज़रूरत है जो उसे एक सेकुलर स्ट्रक्चर देती है। इसके विपरीत संघ का पूरा स्ट्रक्चर और उसकी विचारधारा मुस्लिम-ईसाई-कम्युनिस्ट विरोध पर टिकी है। वह विरोध और घृणा हटा दीजिये तो हिंदुत्व का महल चरमरा कर गिर जाएगा।

यों ही नहीं है कि कांग्रेस के दौर में जिस दलित उत्पीड़न एक्ट को छुआ नहीं गया वह आज मुद्दा बना हुआ है, संस्थाएं नष्ट की जा रही हैं, लिंचिंग हो रही है, लेखकों पर हमले हो रहे हैं और जब तब संविधान बदलने की बातें हो रही हैं।

तो बस इतना कि कांग्रेस का इतिहास उसे एक सीमा से अधिक साम्प्रदायिक नहीं होने दे सकता, संघ का इतिहास उसे एक सीमा से अधिक लिबरल नहीं होने दे सकता।

(अशोक कुमार पांडेय कवि और लेखक हैं। कश्मीर पर हाल में प्रकाशित उनकी पुस्तक “कश्मीरनामा” काफी चर्चित रही। आप इस समय दिल्ली में रहते हैं।)








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