इतिहास के कूड़ेदान में सुरक्षित है संबित पात्राओं की जगह

ख़बरों के बीच , , रविवार , 11-11-2018


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महेंद्र मिश्र

ये दौर भारतीय राजनीति, समाज और मीडिया के लिए काला दौर है। इतिहास में इसे अंधकार युग के तौर पर याद किया जाएगा। इस दौर की खास बात ये है कि इसने अपने पतन की कोई सीमा ही नहीं तय की है। लिहाजा हर घटना अपने पहले से पतित वाकये का रिकार्ड तोड़ती दिख रही होती है। मामला तब और गंभीर हो जाता है जब ये काम सबसे महान, गौरवशाली और एको अहम द्वितीयो नास्ति होने का दावा करने वाली सभ्यता और संस्कृति के वारिस कर रहे होते हैं। अगर हिंदू सभ्यता और संस्कृति के स्वर्ण काल की ये तस्वीर है तो इसके काले भविष्य का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।

इन वारिसों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। खुद को दुनिया की सबसे बड़ी कहने वाली और देश की सत्तारूढ़ पार्टी बीजेपी के प्रवक्ता संबित पात्रा उन्हीं में से एक हैं। देश के एक राष्ट्रीय और कथित नंबर-1 चैनल पर उन्होंने जो बयान दिया है वो सभ्य समाज में आपसी बातचीत की बात तो दूर किसी गली में गाली-गलौच करने वाले लोगों को भी शर्मिंदा करने वाला है। लेकिन एक राष्ट्रीय चैनल के राष्ट्रीय प्रसारण की राष्ट्रीय बहस में जनाब उसे बेहिचक और डंके की चोट पर बोलते हैं। 

मामला कुछ यूं हुआ। पैनल डिस्कशन में बहस की गरमागरमी के बीच अचानक संबित पात्रा ने पैनल के दूसरे सदस्य एमआईएम के मुस्लिम नेता को चिन्हित करते हुए कहा कि ऐ सुनो अल्लाह के भक्त हो या भगवान विष्णु के भक्त हो, पहले ये बताओ। फिर एमआईएम प्रवक्ता के ये कहने पर कि भक्त तो हम अल्लाह के हैं। संबित पात्रा ने कहा कि अल्लाह के भक्त हो तो चिल्लाओ मत बैठ जाओ। किसी मस्जिद का नाम रख दूंगा भगवान विष्णु के नाम पर फिर चिल्लाते फिरोगे।  ये भाषा न तो किसी संवैधानिक दर्जे में फिट बैठती है। न सामान्य संस्कृति और व्यवहार की भाषा हो सकती है।

सभ्य समाज से तो इसका दूर-दूर तक रिश्ता नहीं है। किसी ग्रामीण पंचायती सभा में भी इसको बोलने से पहले कोई 100 बार सोचेगा। लेकिन एक राष्ट्रीय पार्टी का अधिकृत प्रवक्ता डंके  की चोट पर इसको बोलता है। और कहीं से कोई एतराज नहीं होता है। यहां तक कि प्रोग्राम का संचालन कर रहा एंकर भी इस पर उसे नहीं टोकता है। न ही इसके लिए पात्रा को माफी मांगने के लिए कहता है। बहस में भाग लेने वाले दूसरे मेहमानों ने भी इस पर अपना कोई एतराज जताना जरूरी नहीं समझा। और इस तरह से संबित पात्रा का वो बयान बगैर किसी विरोध और प्रतिकार के सामान्य बातचीत का हिस्सा मान लिया गया।

यहां सोचने की जरूरत संबित पात्रा को नहीं है। जरूरत है समाज और उसमें रहने वाले लोगों को। आखिर हम कैसा समाज बना रहे हैं? उसकी राजनीति को हमने कहां पहुंचा दिया है? और इस व्यवस्था का क्या हासिल है? आज व्यापक स्तर पर संबित पात्रा के उस बयान को मौन सहमति नहीं होती तो ये बात दावे के साथ कही जा सकती है कि उन्हें इसे बोलने की हिम्मत नहीं पड़ती। यानी एक मायने में समाज ने खुद को उसी स्तर पर लाकर खड़ा कर लिया है। और अगर देश का नेतृत्व और उसके अगुवा लोगों की भाषा का ये स्तर होगा तो समाज के निचले पायदान पर होने वाली गिरावट का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। 

घोर पतन के रास्ते पर तेजी से अग्रसर समाज की ये तस्वीर बेहद डरावनी है। नेता समाज का अगुवा होता है। उसकी कही बातों पर लोग अमल करते हैं। उसका रास्ता समाज का रास्ता बनता है। लेकिन क्या आज के संबित पात्राओं पर ये बात लागू होती है? देश के एक नेता नेहरू भी थे स्वतंत्रता हासिल करने के मौके पर संसद में दी गयी ट्रि्स्ट विथ डेस्टिनी की जिनकी स्पीच आज भी याद की जाती है।

उनकी बनायी संस्थाओं पर ही आज देश का लोकतंत्र खड़ा है। लेकिन उसके 70 सालों बाद चीजों को आगे बढ़ाने की जगह देश में उल्टी गंगा बहायी जा रही है। लोकतांत्रिक संस्थाओं को छिन्न-भिन्न किया जा रहा है और समाज में घृणा और नफरत के कारोबार का बाजार गर्म है। और इन सबको सत्ता का खुलेआम संरक्षण हासिल है। ऐसे में किसी सोचने-समझने वाले शख्स का भी चिंतित होना स्वाभाविक है।

ऐसा नहीं है कि पूर्व में दूसरे नेता खराब नहीं थे। इंदिरा गांधी के दौर में संजय गांधी के नेतृत्व में विद्याचरण शुक्ल से लेकर ओम मेहता तक इसी जमात का प्रतिनिधित्व करते थे। केके तिवारी और कल्पनाथ राय को राजीव गांधी का कुत्ता कहा जाता था। इन सबके बावजूद इन नेताओं की भाषा संबित पात्रा जैसी नहीं थी। और उससे भी ज्यादा खास बात ये है कि पार्टी ने कभी ऐसे लोगों को उतना तवज्जो नहीं दिया। उन्हें अपना आधिकारिक प्रवक्ता नहीं बनाया। और सत्ता में रहते भी हाशिये पर ही बने रहे। और उससे भी खास बात ये है कि उन्हें उस दौर के समाज और राजनीति में ऐसी स्वीकृति नहीं मिली थी। और उन सबसे ऊपर हर सभ्य और सांस्कृतिक मंच पर ये हमेशा निंदा के पात्र बने रहे।

लेकिन आज स्थितियां बिल्कुल पलट गयी हैं। समाज में घृणा और नफरत का फैला विष हर किसी को अपने प्रभाव में ले लिया है। लिहाजा सही और गलत के बीच की दूरियां मिटती जा रही हैं। सत्ता और राजनीति के द्वारा मिल रहे खुले संरक्षण ने उसे और पुख्ता कर दिया है। माना जाना चाहिए कि ये समाज की अस्वस्थता का दौर है। ज्वर का तापमान जब उतरेगा और एक स्थिति के बाद चीजें जब सामान्य होंगी तो इन्हें भी पीछे हटना पड़ेगा और फिर अपनी गलती का अहसास होगा। लेकिन ये नहीं जानते के अपने इन घृणा और नफरत भरे बयानों से समाज का कितना नुकसान कर दे रहे हैं।  

 








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