दिल्ली में आखिर कहां खड़ी है कांग्रेस?

ख़बरों के बीच , नई दिल्ली, शनिवार , 16-06-2018


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जनचौक ब्यूरो

देश की राजधानी दिल्ली में आजकल लोकतंत्र की हत्या का सबसे नंगा प्रयोग चल रहा है। जिसके तहत एक चुनी हुई सरकार को न केवल काम करने से रोक दिया गया है बल्कि इसके चलते पूरा सूबा ही लोकतांत्रिक इतिहास के एक अभूतपूर्व नाट्य मंच में तब्दील हो गया है। पिछले चार महीनों से नौकरशाह हड़ताल पर हैं। उससे भी ज्यादा विडंबनापूर्ण ये है कि सरकार का मुखिया कैबिनेट के साथियों के साथ एलजी के दरवाजे पर धरने पर बैठा है। लेकिन एलजी साहब हैं कि उनकी लाटसाहबी उन पर भारी पड़ रही है। नतीजतन न तो उनकी जनता के चुने गए इन नुमाइंदों से मिलने की इच्छा है और न ही वो ऐसा मुनासिब समझ रहे हैं। ये सब कुछ हो रहा है केंद्र सरकार की नांक के नीचे। अगर और ज्यादा स्पष्ट तरीके से कहें तो उसके बिल्कुल इशारे पर।

केंद्र सरकार का ये रवैया नया नहीं है। उत्तराखंड से लेकर गोवा और मेघालय से लेकर कर्नाटक तक उसके इस विद्रूप चेहरे को पूरा देश देख चुका है। इन सब हरकतों के जरिये उसने इस बात को साबित कर दिया है कि उसे जनता के जनादेश और उसकी इच्छाओं की कोई परवाह नहीं है। बिहार में महागठबंधन को तोड़कर नीतीश के साथ अपनी सरकार के गठन के जरिये मोदी पहले ही इस बात  को साबित कर चुके हैं। इसलिए ये बात बिल्कुल स्पष्ट है कि केजरीवाल सरकार की हर परेशानी के पीछे मोदी हैं। और ये सब कुछ उनकी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। 

ये बात धीरे-धीरे स्पष्ट होती जा रही है कि केंद्र सरकार को देश के संविधान, लोकतंत्र और उसकी संस्थाओं से कुछ लेना-देना नहीं है। और कदम दर कदम उसे खोखला करने पर उतारू है। इस कड़ी में न केवल लोकतंत्र का अपहरण किया जा रहा है। बल्कि उसे सत्ता के पैरों के नीचे रौंद कर उसकी जगह बतायी जा रही है। और इस प्रक्रिया में उसे इतिहास की वस्तु बनाकर संग्रहालय में स्थापित कर देने की कोशिश की जा रही है। इस लिहाज से उसके लिए दिल्ली प्रयोग का एक आदर्श केंद्र बन गया है। इन स्थितियों में विपक्ष की क्या भूमिका बनती है?

और साफ तौर पर कहें तो पूरे देश में विपक्ष की अगुवाई करने वाली कांग्रेस और उसके नेताओं की क्या भूमिका होनी चाहिए। इसको लेकर तमाम तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं। क्या उन्हें केजरीवाल के खिलाफ खड़ा होकर बीजेपी की इन साजिशों को बल देना चाहिए? क्या इसके जरिये वो खुद अपने पैर पर कुल्हाड़ी नहीं मार रहे हैं? जिस लोकतंत्र को आरएसएस के चंगुल से निकालने की बात हो रही है अगर उसको खत्म करने वाली ताकत को किसी न किसी तरीके से आप सहयोग कर रहे हैं तो फिर आप किस लोकतंत्र को बचाने की बात कह रहे हैं?

देश भर का विपक्ष केजरीवाल के साथ खड़ा है। और उनकी इस लड़ाई में हर तरीके से सहयोग कर रहा है सिवाय कांग्रेस के। आखिर कांग्रेस किसके पक्ष में है? क्या वो जनता के पक्ष में नहीं है? या नहीं चाहती कि सूबे में जनता की कोई चुनी हुई सरकार चले? या फिर लोकतंत्र के प्रति उसकी प्रतिबद्धता खत्म हो गयी है? यहां सवाल किसी केजरीवाल और उसकी सरकार का नहीं है। चीजों का मूल्यांकन उसकी मेरिट के आधार पर होना चाहिए। और अगर सचमुच में कांग्रेस जनता और उसके जनादेश का सम्मान करती है तब पांच सालों के लिए केजरीवाल को मिले जनादेश का न केवल उसे सम्मान करना चाहिए बल्कि उसके रास्ते में रोड़ा अटकाने वाली हर ताकत का विरोध करना चाहिए। 

और वैसे भी ये कोई सामान्य परिस्थिति नहीं है। एक असामान्य स्थिति है जिसमें केंद्र की एक सरकार है जो पूरे सिस्टम को अपने कब्जे में लेकर दूसरों के वजूद को ही खत्म कर देना चाहती है। तब उसमें किसी सामान्य तरीके से व्यवहार करने की बजाय विपक्ष को भी असामान्य तरीके से सोचना और व्यवहार करना चाहिए। ऐसी स्थिति में दिल्ली में कोई भी पार्टी या व्यक्ति अगर संविधान को बचाने की कोशिश करेगा तो उसे स्वाभाविक तौर पर केजरीवाल के पक्ष में खड़ा होना होगा। 

दिल्ली में अपने इस रुख से कांग्रेस नहीं समझ पा रही है कि राष्ट्रीय स्तर पर परसेप्शन के मोर्चे पर उसका कितना नुकसान हो रहा है। जिस दल को आगामी चुनाव में तमाम क्षेत्रीय पार्टियों को लेकर बीजेपी के खिलाफ चुनावी मोर्चे की अगुवाई करनी है। वही एक सूबे में एक क्षेत्रीय दल को खत्म करने की साजिश में लगा हुआ है। बल्कि अगर ये कहा जाए कि इस पूरी कवायद में बीजेपी की बी-टीम की तरह काम कर रहा है। तो कोई बड़ी बात नहीं होगी। ऐसे में क्या भविष्य के उसके क्षेत्रीय सहयोगी दलों में ये संदेश नहीं जा रहा है कि मजबूत होने पर कांग्रेस सबसे पहले उनको अपना शिकार बनाएगी? 

कोई ऐसा गठबंधन जिसे बीजेपी-आरएसएस जैसे संगठन और मोदी-शाह सरीखे नेताओं के खिलाफ खड़ा होना है अगर उसके भीतर अविश्वास की खाईं इतनी चौड़ी होगी तो फिर वो भला कितना कदम आगे बढ़ सकेगा? सचमुच में 2019 के लिए अगर कोई स्थाई और मजबूत गठबंधन बनाना है तो वो न केवल पारदर्शी और ईमानदार होना चाहिए बल्कि इस तरह के तुच्छ निहित स्वार्थों से भी उसे मुक्त होना होगा। वरना बीजेपी-आरएसएस के खिलाफ किसी ठोस जमीन की बजाय खोखले नारों पर खड़ा इस तरह का कोई भी गठबंधन किसी छोटे दबाव में भरभराकर गिर जाएगा।




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