दिल्ली पर केंद्र का "निरर्थक विवाद"

विश्लेषण , , बृहस्पतिवार , 12-07-2018


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विष्णु राजगढ़िया

सुप्रीम कोर्ट के दिल्ली संबंधी फैसले पर विवाद कायम है। चार जुलाई के इस फैसले ने दिल्ली सरकार को छीनी गई संवैधानिक शक्तियां वापस दिलाई। लेकिन एलजी ने सर्विसेस मामले पर अपना नियंत्रण जारी रखा है।

लोकसभा के पूर्व महासचिव श्री पीडीपी आचरे ने आज इंडियन एक्सप्रेस में आलेख लिखकर इसे  'निरर्थक विवाद' कहा है। श्री आचरे को संविधान विशेषज्ञ माना जाता है। उनके अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि सर्विसेस दिल्ली सरकार के अंतर्गत ही आता है, एलजी के पास नहीं।

आलेख के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के पांच सदस्यीय संवैधानिक बेंच ने दिल्ली की निर्वाचित सरकार तथा एलजी के बीच अधिकारक्षेत्र का मामला पूर्णतया सुलझा दिया है। अतः, इस फैसले को सेमी-फाइनल कहकर इससे छोटी बेंच के किसी 'अंतिम फैसले' का इंतजार करना गलत होगा। यह संवैधानिक बेंच के फैसले को उलट देने के समान है।

श्री आचरे के अनुसार संविधान की धारा 141 में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश देश की सभी अदालतों पर बाध्यकारी होगा। धारा 144 के अनुसार देश के सिविल और न्यायिक सभी प्राधिकार सुप्रीम कोर्ट के अनुरूप काम करेंगे। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश सभी प्राधिकार पर लागू होते हैं और बाध्यकारी हैं।

इसलिए दिल्ली सरकार के अधिकारक्षेत्र के संबंध में संवैधानिक बेंच का आदेश केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार, दोनों पर लागू होता है। संविधान के अनुसार हरेक प्राधिकार पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला तत्काल लागू करने का दायित्व है, न कि इसमें बाधा उत्पन्न करे।

आलेख के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली संबंधी मामले का पहला बिंदु था- चुनी हुई सरकार बनाम एलजी की शक्तियां और अधिकारक्षेत्र। दूसरा बिंदु था- निर्वाचित सरकार की राय से एलजी का सहमत या असहमत होना।

आलेख के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि पुलिस, जमीन और विधि व्यवस्था को छोड़कर संविधान की राज्यसूची तथा समवर्ती सूची के सभी मामले दिल्ली राज्य सरकार के अधीन होंगे। इन मामलों में राज्य सरकार को एलजी की मंजूरी लेने की आवश्यकता नहीं है। साथ ही, तीन आरक्षित विषयों पर निर्णय लेने का पूर्ण अधिकार एलजी के पास है।

श्री आचरे ने इसमें दो बिंदुओं को रेखांकित किया है। 

पहला- अगर सर्विसेस को एलजी के पास छोड़ना होता, तो सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले की पुष्टि की होती। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा कुछ नहीं किया है।

दूसरा- दिल्ली कैबिनेट को मिली कार्यकारी शक्तियों के तहत सरकार में कार्यरत अधिकारियों की ट्रांसफर पोस्टिंग की शक्ति भी शामिल है। अगर कोई पदाधिकारी सही काम नहीं कर रहा हो, तो सरकार के पास उसके स्थानांतरण की शक्ति होना आवश्यक है। इसी तरह, सरकार के पास किसी कार्य विशेष के लिए किसी पदाधिकारी के पदस्थापन का अधिकार होता है। ऐसी चीजें हर सरकार सामान्य तौर पर करती है। 

जब दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा था कि सर्विसेस का मामला राज्य सरकार के अधीन नहीं, तब एलजी ने एक कार्यकारी आदेश के जरिए अधिकारियों के पदस्थापन और स्थानांतरण की शक्ति छीन ली थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि पुलिस, जमीन और विधि व्यवस्था, इन तीन विषयों के सिवाय अन्य सभी मामलों से संबंधित सभी शक्तियां चुनी हुई सरकार के पास हैं। इसलिए इसका स्वाभाविक नतीजा यह है कि अधिकारियों के तबादले और पदस्थापन का अधिकार भी चुनी हुई सरकार को वापस मिल गया है।

श्री आचरे के अनुसार, दिल्ली सरकार को सर्विसेस का अधिकार वापस लौटने से पहले केंद्र और LG के आदेशों को निरस्त करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की किसी छोटी बेंच के आदेश की जरूरत नहीं है। सच तो यह है कि सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संवैधानिक बेंच के उस फैसले के साथ ही वैसी तमाम अधिसूचना या आदेश स्वतः निरस्त हो चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि केंद्र सरकार को ऐसे आदेश जारी करने का कोई अधिकार नहीं है। अतः उन अधिसूचनाओं को अवैध और अमान्य समझा जाना चाहिए।

आलेख के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट का आदेश तत्काल लागू होता है। इसे मानने के लिए सभी प्राधिकार संवैधानिक तौर पर बाध्य हैं। अतः, सर्विसेस का मामला एलजी के पास रहेगा या चुनी हुई सरकार के पास, इसे लेकर विवाद निरर्थक है। सर्विसेस का मामला चुनी हुई सरकार को वापस किया जा चुका है। संविधान की धारा 141 तथा 144 के तहत सभी प्राधिकार को सुप्रीम कोर्ट का आदेश मानना बाध्यकारी है। इस पर कोई भी विवाद खड़ा करना गंभीर संवैधानिक समस्याओं को जन्म देगा।

जाहिर है कि श्री आचरे का यह आलेख सुप्रीम कोर्ट के फैसले को समझने में सहायक है। ऐसे स्पष्ट पाठ के बावजूद अगर केंद्र सरकार ने सर्विसेस पर दावा कायम रखा, तो सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया का इंतजार ही विकल्प है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार होने के साथ आरटीआई कार्यकर्ता हैं और आजकल रांची में रहते हैं।)










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