जेल में बंद डॉ. कफ़ील का ख़त- “सच बाहर ज़रूर आएगा और न्याय होकर रहेगा”

विशेष , , सोमवार , 23-04-2018


dr-kafeel-wrote-a-letter-from-prison


( 10 अगस्त 2017 को बीआरडी मेडिकल कालेज, गोरखपुर में हुए ऑक्सीजन कांड में बीआरडी मेडिकल कालेज के बाल रोग विभाग के प्रवक्ता एवं एनएचएम के नोडल प्रभारी रहे डॉ. कफ़ील अहमद खान को दो सितम्बर 2017 को गिरफ्तार किया गया था। वह सात महीने से अधिक समय से जेल में बंद हैं। डॉ. कफ़ील के खिलाफ पुलिस ने 409, 308, 120 बी आईपीसी के तहत आरोप पत्र दाखिल किया है। उनकी ज़मानत गोरखपुर के विशेष न्यायाधीश (प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट)- 3 की अदालत से खारिज हो चुकी है। अब उनकी ज़मानत याचिका हाईकोर्ट में है। डॉ. कफील की पत्नी डॉ. शबिस्ता खान का कहना है कि उनके पति दिल के मरीज हैं लेकिन उनका ठीक से इलाज नहीं कराया जा रहा है। उन्होंने आशंका व्यक्त की है कि उनके पति को एक षड्यंत्र के तहत चिकित्सा सुविधा न देकर जान से मार डालने की साजिश की जा रही है। डॉ. कफ़ील की पत्नी डॉ.  शबिस्ता खान और भाई अदील अहमद खान ने 21 अप्रैल को नई दिल्ली में मीडिया के सामने अपनी बात रखी। डॉ. शबिस्ता ने डॉ. कफ़ील द्वारा 17 अप्रैल को जेल से लिखा एक पत्र भी जारी किया जिसमे डॉ. कफ़ील ने 10 अगस्त की रात के घटनाक्रम और अपने द्वारा बच्चों की जान बचाने के लिए किये गए प्रयास की चर्चा की है। साथ ही जेल में दी जा रही यातना का भी जिक्र किया है। अंग्रेजी में लिखे इस पत्र का हम हिंदी अनुवाद प्रस्तुत कर रहे हैं। पत्र का हिंदी में अनुवाद उमा राग और गीतेश सिंह ने किया है। संपादक)

डॉ. कफ़ील का जेल से लिखा गए पत्र का स्क्रीन शॉट।

बिना बेल 8 महीने से जेल, क्या मैं वाकई कुसूरवार हूं?

सलाखों के पीछे इन 8 महीनों की नाकाबिले बर्दाश्त यातना, बेइज्ज़ती के बावजूद आज भी वो एक-एक दृश्य मेरी आँखों के सामने उतना ही ताज़ा है जैसे यह सब कुछ ठीक यहाँ अभी मेरी आँखों के सामने घटित हो रहा हो। कभी कभी मैं ख़ुद से यह सवाल करता हूँ कि क्या वाकई मैं कुसूरवार हूँ? और मेरे दिल की गहराइयों से जो जवाब फूटता है वह होता है- नहीं! बिल्कुल नहीं !

 

मेरे भाग्य में लिखी उस 10 अगस्त की रात को जैसे ही मुझे वह व्हाट्स एप सन्देश मिला तो मैंने वही किया जो एक डॉक्टर को, एक पिता को, एक ज़िम्मेदार नागरिक को करना चाहिए था। मैंने हर उस ज़िन्दगी को बचाने की कोशिश की जो अचानक लिक्विड ऑक्सीजन  की सप्लाई रुक जाने के कारण ख़तरे में अया गयी थी। मैंने अपना हर वो संभव प्रयास किया जो मैं उन मासूम बच्चों की जिंदगियों को बचाने के लिए कर सकता था।

मैंने पागलों की तरह सबको फ़ोन किया, गिड़गिड़ाया, बात की, यहाँ-वहाँ भागा, गाड़ी चलाई, आदेश दिया, चीखा-चिल्लाया, सांत्वना दी, खर्च किया, उधार लिया, रोया, मैंने वो सब कुछ किया जो इंसानी रूप से किया जाना संभव था।

 

मैंने अपने संस्थान के विभागाध्यक्ष को फ़ोन किया। सहकर्मियों, बीआरडी मेडिकल कालेज के प्राचार्य, एक्टिंग प्राचार्य, गोरखपुर के डीएम, गोरखपुर के स्वास्थ्य विभाग के एडिशनल डायरेक्टर, गोरखपुर के सीएमएस/एसआईसी, बीआरडी मेडिकल कालेज के सीएमएस/एसआईसी को फ़ोन किया और अचानक लिक्विड ऑक्सीजन सप्लाई रुक जाने के कारण पैदा हुई गंभीर स्थिति के बारे में सबको अवगत करवाया और यह भी बताया की किस तरह से ऑक्सीजन की सप्लाई रुकने से नन्हें बच्चों की जिंदगियां खतरे में हैं (मेरे पास की गयी उन सभी फ़ोन कॉल के रिकॉर्ड मौजूद हैं)।

फाइल फोटो: साभार

 

सैकड़ों मासूम बच्चों की जिंदगी बचाने के लिए मैंने जिसमें मोदी गैस, बाला जी, इम्पीरियल गैस, मयूर गैस एजेंसी से जम्बो ऑक्सीजन सिलिंडर्स मांगे। आस-पास के सभी अस्पतालों के फ़ोन नम्बर इकठ्ठे किये और उनसे जम्बो ऑक्सीजन सिलिंडर्स की गुज़ारिश की।

मैंने उन्हें नकद में कुछ भुगतान किया और उन्हें विश्वास दिलाया की बाकी की राशि डिलीवरी के समय दे दी जाएगी। हमने प्रतिदिन के हिसाब से 250 सिलेंडरों की व्यवस्था की जब तक कि लिक्विड ऑक्सीजन की आपूर्ति नहीं हो गयी। एक जंबो सिलिंडर की कीमत 216 रुपये थी।

हॉस्पिटल में एक क्यूबिकल से दूसरे क्यूबिकल, वार्ड 100 से वार्ड 12, इमरजेंसी वार्ड, जहाँ ऑक्सीजन सप्लाई होनी थी उस पॉइंट से लेकर वहीं तक जहाँ उसकी डिलीवरी होनी थी मैं दौड़-भाग करता रहा ताकि बिना किसी दिक्कत के ऑक्सीजन की सप्लाई बनी रह सके।


अपनी गाड़ी से मैं आस-पास के अस्पतालों से सिलिंडर्स लेने गया। लेकिन जब मुझे एहसास हुआ कि यह प्रयास भी अपर्याप्त है तब मैं एसएसबी (सशस्त्र सीमा बल) गया और उसके डीआईजी से मिला और सिलेंडरों कि कमी की वजह से उत्पन्न हुई आपद स्थिति के बारे में बताया। उन्होंने तुरंत स्थिति को समझा और सहयोग किया। उन्होंने जल्द ही सैनिकों के एक समूह और एक बड़े ट्रक की व्यवस्था की जिससे बीआरडी मेडिकल कालेज में खाली पड़े सिलिंडरों को गैस एजेंसी तक जल्द से जल्द लाया जा सके और फिर उन्हें भरवाकर वापस बीआरडी पहुंचाया जा सके। उन्होंने 48 घंटों तक यह काम किया।

उनके इस हौसले से हमें हौसला मिला। मैं एसएसबी को सलाम करता हूँ और उनकी इस मदद के लिए उनका आभारी हूँ। जय हिन्द।


मैंने अपने सभी जूनियर और सीनियर डाक्टरों से बात की, अपने स्टाफ को परेशान न होने के निर्देश दिए और कहा कि हिम्मत न हारें, और परेशान बेबस माता-पिताओं पर क्रोध न करें। कोई छुट्टी या ब्रेक न ले। हमें बच्चों की जिंदगियां बचाने के लिए एक टीम की तरह काम करना होगा।

मैंने उन बेहाल माता-पिताओं को ढांढस बंधाया जो अपने बच्चों को गँवा चुके थे। उन माता-पिताओं को समझाया जो अपने बच्चों को खो देने के कारण क्रोधित थे। वहाँ स्थिति बहुत तनावपूर्ण थी। मैंने उन्हें बताया कि लिक्विड ऑक्सीजन खत्म हो गया है पर हम जम्बो सिलिंडरों की व्यवस्था करने की कोशिश कर रहे हैं।

मैं कई लोगों पर चीखा-चिल्लाया ताकि लोग अन्य सब बातों से ध्यान हटाकर बच्चों की जिंदगियों को बचाने में ध्यान केन्द्रित करें। मैं ही नहीं बल्कि मेरी टीम के कई लोग उस स्थिति में यह देखकर रो दिए कि किस तरह से प्रशासन की लापरवाही से गैस सप्लायर्स को पैसे न मिलने के कारण आज यह आपद स्थिति पैदा हो गयी जिसकी वजह से इतनी सारी मासूम जिंदगियां दांव पर लग गयी हैं। हम लोगों ने अपनी इन कोशिशों को तब तक जारी रखा जब तक 13/8/17 को सुबह 1:30 बजे लिक्विड ऑक्सीजन टैंक अस्पताल में पहुँच नहीं गया।


मेरी ज़िंदगी में उथल-पुथल उस वक्त शुरू हुई जब 13/8/17 की सुबह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी महाराज अस्पताल पहुंचें। और उन्होंने कहा – “ तो तुम हो डॉक्टर कफ़ील जिसने सिलिंडर्स की व्यवस्था की। मैंने कहा –“ हाँ सर।” वो नाराज़ हो गए और कहने लगे “ तुम्हें लगता है कि सिलिंडरों की व्यवस्था कर देने से तुम हीरो बन गए, मैं देखता हूँ इसे।”

योगी जी नाराज़ थे क्योंकि यह ख़बर किसी तरह मीडिया तक पहुँच गयी थी, लेकिन मैं अपने अल्लाह की कसम खाकर कहता हूँ कि मैंने उस रात तक इस सम्बन्ध में किसी मीडियाकर्मी से कोई बात नहीं की थी। मीडियाकर्मी पहले से ही उस रात वहाँ मौजूद थे।


इसके बाद पुलिस ने हमारे घरों पर आना शुरू कर दिया, हम पर चीखना-चिल्लाना, धमकी देना, मेरे परिवार को डराना। कुछ लोगों ने हमें यह चेतावनी भी दी कि मुझे एनकाउंटर में मार दिया जायेगा। मेरा परिवार, मेरी मां, मेरी बीवी-बच्चे सब किस कदर डरे हुए थे इसे बयान करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं।

अपने परिवार को इस दुःख और अपमान से उबारने के लिए मैंने सरेंडर कर दिया, यह सोचकर कि जब मैंने कुछ ग़लत नहीं किया है तो मुझे न्याय ज़रूर मिलेगा।

पर कई दिन, हफ्ते और महीने बीत चुके हैं। अगस्त 2017 से अप्रैल 2018 आ गया, दिवाली आई, दशहरा आया, क्रिसमस आया, नया साल आया, होली आई, हर तारीख़ पर मुझे लगता था कि शायद मुझे बेल मिल जाएगी। और तब मुझे एहसास हुआ कि न्याय प्रक्रिया भी दबाव में काम कर रही है (वो ख़ुद भी यही महसूस करते हैं)।

150 से भी ज़्यादा कैदियों के साथ एक तंग बैरक में फ़र्श पर सोते हुए जहाँ रात में लाखों मच्छर और दिन में हज़ारों मख्खियाँ भिनभिनाती हैं, जीने के लिए खाने को हलक के नीचे उतारना पड़ता है, खुले में लगभग नग्नावस्था में नहाना पड़ता है, जहाँ टूटे हुए दरवाजों वाले शौचालयों में गंदगी पड़ी रहती है, अपने परिवार से मिलने के लिए जहाँ बस रविवार, मंगलवार, वृहस्पतिवार का इंतज़ार रहता है.

डॉ. कफ़ील की पत्नी दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान। फोटो साभार

ज़िन्दगी नरक बन गयी है। सिर्फ़ मेरे लिए ही नहीं बल्कि मेरे पूरे परिवार के लिए। उन्हें न्याय की तलाश में यहाँ-वहाँ भागना पड़ रहा है, पुलिस स्टेशन से कोर्ट तक, गोरखपुर से इलाहाबाद तक पर सब व्यर्थ साबित हो रहा है।


मैं अपनी बेटी के पहले जन्मदिन में भी शामिल नहीं हो सका  जो अब 1 साल 7 महीने की हो गयी है। बच्चों का डॉक्टर होने के नाते भी यह बहुत दुःख देने वाली बात है कि मैं उसे बढ़ते हुए नहीं देख पा रहा। बच्चों का डॉक्टर होने के नाते मैं अक्सर अभिभावकों से बढ़ते हुए बच्चों की उम्र के कई महत्वपूर्ण पड़ावों के प्रति उन्हें सचेत किया करता था और अब मैं ख़ुद ही नहीं जानता कि मेरी बेटी ने कब चलना, बोलना, शुरू किया? तो अब मुझे फिर से वही सवाल सता रहा है कि क्या मैं वाकई में गुनाहगार हूँ? नहीं ! नहीं ! नहीं !


मैं 10 अगस्त 2017 को छुट्टी पर था जिसकी अनुमति मुझे मेरे विभागाध्यक्ष ने दी थी। छुट्टी पर होने के बावजूद मैं अस्पताल में अपना कर्तव्य निभाने पहुंचा। क्या ये मेरा गुनाह है? मुझे हेड ऑफ डिपार्टमेंट, मेडिकल कालेज का वाइस चांसलर, 100 नंबर वार्ड का प्रभारी बताया गया जबकि मैं 8/8/16 को ही स्थायी सदस्य के रूप में बीआरडी से जुड़ा था, और विभाग में सबसे जूनियर डॉक्टर था। मैं एनआरएचएम के नोडल अधिकारी और बाल रोग विभाग में लेक्चरर के रूप में कार्यरत था, जहाँ मेरा काम सिर्फ छात्रों को पढ़ना और बच्चों का इलाज करना था।

मैं किसी भी रूप में लिक्विड ऑक्सीजन/जम्बो सिलिंडर के ख़रीद/ फ़रोख्त/ ऑर्डर देने/ सप्लाई/ देखरेख/ भुगतान आदि से जुड़ा हुआ नहीं रहा हूँ। अगर पुष्पा सेल्स ने अचानक लिक्विड ऑक्सीजन की सप्लाई रोक दी तो उसके लिए मैं ज़िम्मेदार कैसे हो गया? एक ऐसा व्यक्ति जो चिकित्सा से नहीं जुड़ा हो, वो भी बता सकता है कि एक डॉक्टर का काम इलाज करना है न कि ऑक्सीजन खरीदना।

पुष्पा सेल्स द्वारा अपनी 68 लाख की बकाया राशि के लिए लगातार 14 बार रिमाइंडर भेजे जाने के बावजूद भी अगर कोई इस सन्दर्भ में लापरवाही बरती गई और कोई कार्रवाई नहीं की गयी तो इसके लिए गोरखपुर के डीएम, डीजी मेडिकल एजुकेशन, और स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा विभाग के प्रिंसिपल सेक्रेटरी दोषी हैं। यह पूरी तरह से एक उच्च स्तरीय प्रशासकीय फेल्योर है कि जिन्होंने स्थिति की गंभीरता को नहीं समझा।

डॉ. कफ़ील का जेल से लिखा गए पत्र का स्क्रीन शॉट।

 

हमें जेल में डालकर उन्होंने हमें बलि के बकरे की तरह इस्तेमाल किया ताकि सच हमेशा-हमेशा के लिए गोरखपुर जेल की सलाखों के पीछे दफ्न रहे।


जब मनीष (ऑक्सीजन सप्लायर पुष्पा सेल्स के निदेशक मनीष भंडारी) को बेल मिली तो हमें उम्मीद की एक किरण नज़र आई कि शायद हमें भी न्याय मिलेगा और हम बाहर आ पायेंगें और अपने परिवार के साथ रह पायेंगें और फिर अपना काम करेंगें। पर नहीं हम अभी भी इंतजार कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट कहता है कि बेल अधिकार होता है और जेल अपवाद। यह न्याय प्रक्रिया के हनन का क्लासिकल उदाहरण है।

मैं आशा करता हूँ कि वो समय ज़रूर आएगा जब मैं आज़ाद हो जाऊंगा और अपने परिवार और अपनी बेटी के साथ आज़ादी की ज़िन्दगी जी पाउँगा। सच बाहर ज़रूर आएगा और न्याय होकर रहेगा।

एक बेबस और दुखी पिता/ पति/ भाई/ बेटा/ और दोस्त

डॉ. कफ़ील ख़ान, 18/4/18

(समकालीन जनमत डॉट इन से साभार)




Tagdrkafeel brd gorakhpur oxygen कफ़ील

Leave your comment