डीयूएसयू चुनाव में एबीवीपी प्रत्याशियों की "ईवीएम जीत"

विमर्श , , शुक्रवार , 14-09-2018


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गिरीश मालवीय

दिल्ली यूनिवर्सिटी में छात्रसंघ के चुनाव ईवीएम से कराए जाते हैं, वैसे कल सुबह मतगणना कर परिणाम घोषित किये जाने थे लेकिन मतगणना में ईवीएम मशीनें उसी समय खराब होने लगती हैं जिस राउंड से बीजेपी समर्थित एबीवीपी के उम्मीदवार पिछड़ने लगते हैं, भारी हंगामा मच जाता है। यूनिवर्सिटी प्रशासन मतगणना रोक देता है, रात में परिणाम आते हैं और बीजेपी की छात्र इकाई एबीवीपी 4 में से 3 सीट जीत जाती है,

आप पार्टी के गोपाल राय कहते हैं कि 'डूसू चुनाव में सचिव के पद पर आठ उम्मीदवारों के अलावा ईवीएम में नौवां बटन नोटा का था। बुधवार को मतदान के दौरान ईवीएम में दसवें बटन पर भी 40 वोट पड़ गए'।

यह चमत्कार कैसे हुआ, किसी को कुछ पता नहीं है? एक यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ के चुनाव ईवीएम द्वारा ठीक से होते नहीं हैं और पूरे देश के आम चुनाव ईवीएम से निष्पक्षता से किये जाने का दावा किया जाता है।

कल रात में एक चमत्कार और होता है डूसू चुनाव में ईवीएम मशीनों पर जैसे ही सवाल खड़े होने लगते हैं अचानक चुनाव आयोग को होश आता है और वह कह देता है कि उसने डीयू को कोई ईवीएम मशीन जारी नहीं की है, चुनाव आयोग के अधिकारी मनोज कुमार रातों रात बयान देते हैं हमारे ऑफिस से दिल्ली यूनिवर्सिटी को ईवीएम जारी नहीं किया गया है। राज्य चुनाव आयोग ने भी पुष्टि की है कि हमने ऐसी कोई मशीन जारी नहीं की है। ऐसा लगता है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी ने निजी रूप से मशीन मंगवाई है।'

अगर यह बात सच भी है तो और खतरनाक बात है क्योंकि यदि यह मशीनें अलग से मंगायी गयी हैं तो इसकी जांच होनी चाहिए कि चुनाव आयोग के अलावा ऐसा कौन सा संस्थान है जो देश मे ईवीएम उपलब्ध करा रहा है, और वह किस कम्पनी की ईवीएम इस्तेमाल कर रहा है। कहीं वह दिल्ली विधानसभा में दिखाई गयी ईवीएम तो इस्तेमाल नहीं कर रहा है?

लेकिन इस देश मे ईवीएम को कठघरे में खड़ा कर देना गुनाह है। ईवीएम को फुलप्रूफ बताते हुए चुनाव आयुक्त ओपी रावत देश भर में घूमते हैं बड़े मीडिया घराने उन्हें सिर आंखों पर बैठाते हैं। ईवीएम के पक्ष में खूब खबरें छपती हैं। दिखाई जाती हैं, लेकिन ये मीडिया संस्थान इस खबर को बताना जरूरी नहीं समझते कि देश के सर्वोच्च न्यायालय ने ईवीएम में गड़बड़ी से संबंधित एक जनहित याचिका को सुनना स्वीकार किया है जिसमें याचिकाकर्ता ने बेहद महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं।

जैसे अब तक जितने ईवीएम का निर्माण हुआ है, उनकी संख्या चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में बताई गई संख्या से कहीं ज्यादा है। याचिकाकर्ता का कहना है कि चुनाव आयोग से यह पूछा जाना चाहिए कि इतनी बड़ी संख्या में ईवीएम कहां चली गयीं ? और क्या ईएवीएम अफ़्रीकी देशों में भी अनधिकृत रूप से भेजी गई हैं?

दूसरा सवाल यह है कि ईवीएम के रखरखाव में चुनाव आयोग निजी कंपनियों के इंजीनियरों का इस्तेमाल क्यों करता है, और उस पर रोक क्यों नही लगाई जानी चाहिए? क्यों नहीं सिर्फ सरकारी अधिकारियों को ही इसके रखरखाव की इजाजत दी जानी चाहिए?

याचिकाकर्ता ने ईवीएम तक पहुंच के लिए अधिकृत इंजीनियरों की सूची प्रकाशित करने और इसे चुनाव लड़ने वाले राजनीतिक दलों को उपलब्ध कराने का निर्देश देने का अनुरोध किया है, याचिका में इस सूची को आयोग की वेबसाइट पर भी डालने के निर्देश देने का अनुरोध भी किया गया है।

अगले हफ्ते इस मामले पर सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई है।

वैसे पता तो यह भी चला है कि चुनाव आयोग के एक्सपर्ट भी अब इस बात को मान गए हैं कि ईवीएम मशीन में इस्तेमाल की जाने वाली चिप विदेशों से आयातित होती है। चिप की भारत में मैन्यूफैक्चरिंग नहीं होती है। इसको मुख्य तौर पर जापान और अमेरिका से मजबूत साख वाली कंपनियों से इंपोर्ट किया जाता है।

वैसे ईवीएम की इतनी सारी खूबियां देखकर स्वतः ही यह विश्वास हो जाता है कि भाजपा को देश की सत्ता अगले 50 सालों के लिए मिलने वाली है।

(गिरीश मालवीय स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और आजकल इंदौर में रहते हैं।)










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