‘इकोनामिस्ट’ का आकलन: भारत में घट रही है मध्य वर्ग की हैसियत

माहेश्वरी का मत , , बुधवार , 17-01-2018


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अरुण माहेश्वरी

एनडीटीवी के प्राइम टाईम पर रवीश कुमार की यूनिवर्सिटी सिरीज (24 एपीसोड) ने सिर्फ भारत के छात्रों के भविष्य के बारे में नहीं, हमारे समूचे सामाजिक विकास के बारे में बहुत डरावने प्रकार के जलते हुए सवाल छोड़े थे। उस पर अपनी एक विस्तृत टिप्पणी में हमारा सवाल था कि “अगर हमारे आधुनिक शिक्षण संस्थानों की यह दशा है तो क्या यह मान लिया जाए कि हमारी नई पीढ़ी के लिये ज्ञान, अर्थात आत्म-विस्तार का कोई अर्थ नहीं रह गया है! इस दिशा में उसके सारे मार्ग अवरुद्ध हो चुके हैं !” 

“यह तथ्य कल्पना से परे है कि तीन कमरों में सात हज़ार छात्रों का एक विश्वविद्यालय चल रहा है जहाँ प्रत्येक शिक्षक पर लगभग तीन सौ छात्रों को पढ़ाने की ज़िम्मेदारी है। अध्यापक भी स्वीकृति-प्राप्त अध्यापक नहीं,  मामूली वेतन पर खाना-पूर्ति का काम करने वाला ‘अतिथि’ है। ... छात्र की दिलचस्पी भर्ती होकर डिग्री लेने भर में होती है।” 

तब हमने कहा था कि “विद्यार्थियों और पूरे समाज के जीवन में अनैतिकता के इस सर्व-स्वीकृत, अर्थात नैतिक विधान की इसके अलावा दूसरी कोई व्याख्या नहीं मिलती है कि विश्वविद्यालयों की आज की सूरतों को,  जिनके अभी बदलने के कोई आसार नहीं दिखाई देते हैं,  अगर हमें विचार का विषय बनाना है तो शायद हमें ही इस मसले को देखने के अपने परिप्रेक्ष्य को बदलना होगा। अन्यथा, हम सिवाय सर पीटने के,  रवीश के शब्दों में, मूक-बधिर दर्शक की तरह श्राद्ध की पूड़ियाँ खाने के अलावा और कुछ भी करने-समझने लायक नहीं रहेंगे !”

हमने डिजिटलाइजेशन, डिजिटल डिवाईड और कूढ़मगज दिमाग़ों की फ़ैक्टरी के रूप में दिखाई देने वाले पारंपरिक महाविद्यालयों की अपनी आंतरिक संरचना की तरह की कई बातें उठाई थी और निष्कर्ष के तौर पर यह भी कहा था कि “हमारे विश्वविद्यालय हमारे समाज की वास्तविक सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों की ही उपज है। हम पूड़ी खाये या रसगुल्ला खायें, आधुनिक जनतांत्रिक समय के तक़ाज़े कुछ और हैं और हमारे आज के शासकों के इरादे बिल्कुल उनके विपरीत, कुछ और। जब तक ऐसे लोगों का राज रहेगा, विश्वविद्यालयों के पारंपरिक सांस्थानिक स्वरूप में परिवर्तन की कोई संभावना पैदा नहीं हो सकती है ।”

रवीश की इस सिरीज में बात सिर्फ छात्रों की नहीं थी। उससे कहीं ज्यादा उन अध्यापकों की भी थी जो 'अतिथि' या न जाने कितने पवित्र नामों से विभूषित हो कर न्यूनतम मजूरी से भी कम वेतन पर कालेजों, विश्वविद्यालयों में अध्यापन का काम करते हैं । वे कैसे मर-मर कर जीते हैं इसके अनगिनत जीवंत चित्र उस सिरीज में देखने को मिले थे ।

हमारा सवाल है कि समग्र रूप से सामाजिक संरचना में हमारे इन कालेज-अध्यापकों का क्या स्थान है ? किसी भी सभ्य समाज में इन्हें मध्यवर्ग का हिस्सा माना जाता है, वह हिस्सा जिसका अर्थ-शास्त्र में एक आधुनिक उपभोक्ता की हैसियत से नाम लिया जाता है, जो पूरे सामाजिक-आर्थिक रूपांतरण में अनायास ही एक बड़ी भूमिका निभाता है । कहना न होगा, रवीश की सिरीज भारत में मध्य वर्ग कहलाने के हकदार एक ऐसे तबके की अकाल मृत्यु की कहानी भी कहती थी ।

'द इकोनोमिस्ट' पत्रिका के ताजा अंक (12-19 जनवरी 2018) की कवर स्टोरी भारत के बारे में है, जिसका शीर्षक है 'गुमशुदा मध्यवर्ग' ( The Missing Middle Class) । 'इकोनोमिस्ट' की यह पूरी कहानी एक प्रकार से बाजार की तलाश में सारी दुनिया की खाक छान रहे बहु-राष्ट्रीय निवेशकों को संबोधित है। चीन के बाजार के बल पर उन्होंने बहुत साल गुजार लिये हैं। अब उनकी सारी आशा भारत में मोदी जी की 'सवा सौ करोड़' की आबादी पर है। न जाने कितनी आशा भरी लोलुप नजरों से वे इसे देख रहे हैं। लेकिन हाय ! जैसे ही इनके लोग भारत में आकर सरे-जमीन स्थिति का आकलन करते हैं, उनकी सारी आशाएं आसमान से गिर कर सीधे पाताल लोक तक पहुंच जाती हैं ! उनके सामने पहला सवाल आता है कि आखिर वे यहां अपना माल भी बेचेंगे तो किसे बेचेंगे ? भारत का सच तो मोदी की चमकती हुई पोशाकों से लाखों मील दूर है।

'इकोनोमिस्ट' लिखता है कि दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियों के विपणन सलाहकार भारत में जिस मध्यवर्ग को देखना चाहते हैं, वह तो एक कोरी मरीचिका है। “जो कंपनियां साबुन, माचिस और फोन-केंद्रित उत्पादों के अलावा अपने किसी दूसरे उत्पाद के लिये बाजार तलाश रही हैं, उनके खरीदार तो भारत में नहीं के बराबर हैं। यह शिखर का सिर्फ एक प्रतिशत लोगों का संसार है। 'इकोनोमिस्ट' ने इस लेख में यह हिसाब दिया है कि भारत के तकरीबन 50 प्रतिशत का जीवन स्तर यूथोपिया, सूडान आदि की तरह के अफ्रीकी देशों की आबादी के स्तर का है। बाकी में 40 प्रतिशत लोगों की दशा दक्षिण एशिया के बांग्लादेश, नेपाल और पाकिस्तान की तरह के गरीब देशों के स्तर की है। और 9 प्रतिशत जो कुछ बेहतर स्थिति में है, उसकी भी दशा मध्य यूरोप के पोलैंड, रुमानिया, ग्रीस, स्पेन की तरह के देशों की आबादी से अच्छी नहीं है। 'इकोनोमिस्ट' में साफ शब्दों में कहा गया है कि ये मध्य यूरोप के देश भी चीन के स्तर के नहीं है । भारत के एक प्रतिशत हिस्से में से भी 80 लाख लोगों की क्रय शक्ति हांगकांग के लोगों के स्तर की है। बाकी के 40-45 लाख अति धनाढ्य हैं जिनकी आमदनी का कोई हिसाब नहीं है।

'इकोनोमिस्ट' का कहना है कि भारत में मध्य यूरोप के देशों के स्तर का भी मध्य वर्ग नहीं पनप पा रहा है, इसकी एक मात्र वजह यहां तेजी से बढ़ रही गैर-बराबरी है। 1980 से 2014 के बीच के आर्थिक विकास से होने वाली समूची अतिरिक्त आमदनी का एक तिहाई हिस्सा यहां के शिखर के एक प्रतिशत लोगों की जेब में चला गया है। इसीलिये इसमें कहा गया है कि भारत को अपने इन 'हाथियों पर अंकुश लगाना चाहिए'। थामस पिकेटी को उद्धृत करते हुए इसमें लिखा गया है कि भारत का संपत्तिवान तबका 1980 की तुलना में दस गुना ज्यादा धनी हो गया है और जो बीच का तबका है उसकी आमदनी दुगुनी भी नहीं हुई है। पिकेटी ने बताया है कि भारत में जो पहले 2 डालर प्रति दिन कमाते थे, उनकी आमदनी जरूर 3 डालर प्रतिदिन हुई है, लेकिन अन्य देशों में इस बीच 3 डालर प्रतिदिन कमाने वालों की आमदनी 5-10 डालर प्रतिदिन हो गई है। भारत के विकास के मौजूदा चरण में आम तौर पर मध्य आमदनी वाले लोगों को जो लाभ मिलना चाहिए था, वह नहीं मिल पाया है ।

'इकोनोमिस्ट' ने इस बात को भी नोट किया है कि भारत में श्रम शक्ति का बड़ा हिस्सा अनुत्पादक है, इसकी एक बड़ी वजह यहां की बदतर शिक्षा व्यवस्था है। यहां स्नातक भी छोटे-छोटे धंधों में लगे हुए हैं। 93 प्रतिशत भारतीयों का जीवन अनौपचारिक क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। इसकी तुलना में 'इकोनोमिस्ट' के अनुसार चीन ने मध्य वर्ग के रोजगारों की बड़े पैमाने पर सृष्टि की है। यही वजह है कि वह आज दुनिया का सबसे बड़ा विनिर्माण का क्षेत्र है। भारत में भ्रष्ट नौकरशाही इसके रास्ते की सबसे बड़ी बाधा है। भारत में 25 प्रतिशत औरतें काम नहीं करती है, जिनकी संख्या में पिछले एक दशक में और वृद्धि हुई है। 

'इकोनोमिस्ट' लिखता है कि भारत के लिये यह अच्छी बात है कि यहां जनतांत्रिक संस्थानों की जड़ें गहरी हैं, लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि इसके बावजूद ये शासन की गलत नीतियों को रोकने में विफल साबित हो रही हैं। 'इकोनोमिस्ट' के अनुसार 'नोटबंदी' की तरह का अचानक लिया गया बर्बर फैसला इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। इसके बारे में प्रचारित तो यह किया गया था कि यह मोटी बिल्लियों को चोट करेगा, लेकिन यथार्थ में इसने हर आम आदमी के जीवन पर असर डाला है। इसने सिर्फ चीन को लाभ पहुंचाया है। 

दुनिया की बड़ी कंपनियों को 'इकोनोमिस्ट' ने कहा है कि भारत में उन्हें बहुत सावधानी से उतरना होगा। भारत के लोगों में मध्य वर्ग की रुचियों को पैदा करने में अभी काफी वक्त लगेगा। यहां के सिर्फ तीन प्रतिशत लोगों ने जीवन में हवाई यात्रा की है। मध्य वर्ग के माने जाने वाले तीस करोड़ लोगों की भी दैनिक आमदनी 3 डालर है। वही, रवीश कुमार वाले छः हजार मासिक के अध्यापक। इसीलिये 'इकोनोमिस्ट' ने भारत के बाजार को बड़ा बताते हुए भी इसमें ज्यादा कुछ करने की गुंजाईश नहीं है, कहा है। इसमें कहा गया है कि यहां के वेतनभोगी लोगों के लिये नेटफिक्स जैसी सेवाओं का सालाना किराया उनकी एक हफ्ते की कुल आमदनी के बराबर है। एपल कंपनी के विज्ञापन मुंबई, दिल्ली, बंगलुरू में दिखाई दे सकते हैं, लेकिन 90 फीसदी वेतनभोगी भारतीयों के लिये नये आईफोन की कीमत उसके छः महीने के कुल वेतन के बराबर है। 

'इकोनोमिस्ट' के अनुसार आज के भारत में सिर्फ दो उपभोक्ता सामग्रियों की मांग है — स्कूटर और मोबाइल फोन, वे भी तभी जब वे सस्ते हों। इसीलिये चीन की कंपनियां अभी भारत के बाजार पर अपना प्रभुत्व कायम कर रही हैं। 'इकोनोमिस्ट' के अनुसार ई कामर्स के कारण थ्री टायर शहर का उपभोक्ता अब ग्लोबल फैशन के ब्रांड सरलता से पा सकता है, इसीलिये उपभोक्ता वित्तीय सेवाओं, क्रेडिट कार्ड आदि में वृद्धि की संभावना है। 

बहरहाल, इस लेख के अंत में 'इकोनोमिस्ट' भारत के राजनीतिक नेतृत्व से कह रहा है कि वह लोगों की क्रय शक्ति बढ़ा कर उपभोक्ता तैयार करने की कोशिश करे। और दुनिया की बड़ी कंपनियों के लिये उसका संदेश है कि उन्हें अभी इस भ्रम में रहने की जरूरत नहीं है कि भारत का 'मध्यवर्ग' उनके व्यवसाय में वृद्धि में सहायक बनेगा। भारत की इतनी बड़ी आबादी में छिपी हुई संभावनाओं को अपने मुनाफे का स्रोत बनाने के लिये अभी उन्हें काफी दम लगाना होगा। 

यह है हमारा आज का भारत ! आज (16 जनवरी 2018) ही प्राइम टाइम में रवीश कुमार भारत में कम हो रही नौकरियों के बारे में एक रिपोर्ट दिखा रहे थे। यह रिपोर्ट 'इकोनोमिस्ट' के लेख की प्रत्येक बात की पुष्टि कर रही थी। सच्चाई यह है कि भारत में अभी कथित मध्यवर्ग के आर्थिक और सांस्कृतिक पतन को सुनिश्चित करने का दौर चल रहा है। नौकरीपेशा भारतीय पहले के किसी भी समय से ज्यादा गरीब और मानसिक लिहाज से संकुचित है। उसे सांप्रदायिक फासीवादी राजनीति का सिर्फ एक मोहरा बनाया जा रहा है।

(अरुण माहेश्वरी वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं। और आजकल कोलकाता में रहते हैं।) 










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