अरविंद सुब्रमण्यन के इस्तीफे के पीछे छुपे हैं कई गहरे राज

मुद्दा , , शुक्रवार , 22-06-2018


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जनचौक ब्यूरो

लीजिए जनाब अरविंद सुब्रमण्यन भी चले गए। सुब्रमण्यन मोदी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार थे। इसके पहले नीति आयोग के अध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया गए थे और उससे पहले आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने सरकार का साथ छोड़ा था। ये तीनों अंतरराष्ट्रीय स्तर के अर्थशास्त्री थे। जिनकी अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में एक पहचान है। एक ऐसी अर्थव्यवस्था जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़त का दावा कर रही है लेकिन उसके साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर का कोई ख्यातिप्राप्त अर्थशास्त्री काम नहीं करना चाहता है। ये अपने आप में विडंबनापूर्ण है।

चार साल, तीन साल काम करने के बाद अचानक इनका छोड़ कर जाना बहुत कुछ संकेत दे रहा है। ये बता रहा है कि मोदी सरकार दावे जो भी करे लेकिन उसकी अर्थव्यवस्था की सेहत ठीक नहीं है। अगर सब कुछ ठीक चल रहा होता तो इस तरह से लोग छोड़कर नहीं जाते। एक ऐसे समय में जबकि सरकार ने टैलेंट को नौकरशाही में लाने के लिए ज्वाइंट सेक्रेटरी स्तर पर सीधे भर्तियों का रास्ता खोल दिया है। तब इस तरह के अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रतिभाशाली लोगों का छोड़कर जाना सरकार के पूरे मंसूबे और उसकी नियति पर ही सवाल खड़े कर देता है। अब सवाल ये बनता है कि अगर सरकार टैलेंट को रोक ही नहीं पा रही है तो फिर उनकी भर्ती का रोना क्यों?

नोटबंदी ने तो पहले ही अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी थी। उसके बाद जीएसटी ने उसे जमीन पर बैठा दिया। नतीजा ये रहा कि रियल स्टेट से लेकर कृषि और मैनुफैक्चरिंग से लेकर एक्सपोर्ट तक संकट में आ गए। हर साल 2 करोड़ लोगों को रोजगार देने का वादा करने वाले मोदी ने एक साथ लाखों लोगों को उनके हाथ से काम छीनकर उन्हें घर बैठा दिया। हजारों-हजार लोगों की शहरों से गांवों की वापसी की अनगिनत कहानियां हैं।

बताया जा रहा है कि हालात को देखते हुए अरविंद सुब्रमण्यन जीएसटी का अधिकतम स्लैब 18 फीसदी रखना चाहते थे। लेकिन  सरकार ने उनकी नहीं सुनी और उसे 28 फीसदी कर दिया। और कुछ इसी तरह के महत्वपूर्ण सुझाव उन्होंने दिए थे जिसको सरकार ने मानने से इंकार कर दिया। ऐसे दौर में जबकि अर्थव्यवस्था सुधरती नहीं दिख रही थी और ऊपर से उनकी सलाहों को दरकिनार कर दिया जा रहा था तब भला उसकी नाकामी का ठीकरा अपने सिर पर वो क्यों लेते? इसी तरह से एक-एक कर तीनों शख्सियतों ने किनारा कर लिया।

अब सरकार के पास उर्जित पटेल जैसे लोग बचे हैं। जिनकी किसी अर्थशास्त्री की प्रतिभा से ज्यादा उनकी पहचान अंबानी के परिवार से जुड़ा होना है। और जिन्हें रिजर्व बैंक को तहस-नहस करने के लिए जाना जाएगा। उनकी स्थिति ये है कि नोटबंदी के बाद बैंक में जमा हुए पैसे की वो अभी तक गिनती नहीं करा सके हैं। और नोट ऐसी छापे हैं जिनको आटो वाले भी लेने से इंकार कर देते हैं। क्योंकि पहली निगाह में वो नकली दिखते हैं। वो चाहे 50 की हो या फिर 2000 रुपये की नोट।

लेकिन इससे इतर एक और कहानी भी चल रही है। इस समय बगैर विभाग के मंत्री के तौर पर काम कर रहे अरुण जेटली ने अरविंद सुब्रमण्यन की जमकर तारीफ की है। अपने फेसबुक पोस्ट में तमाम नीतियों और फैसलों का श्रेय उन्हें दिया है। ये सही भी हो सकता है। लेकिन किसी समय सरकार की तिकड़ी में शुमार इस असली चाणक्य की कुर्सी ही अब खतरे में बतायी जा रही है। बताया जाता है कि बहुत पहले से ही मोदी-शाह जोड़ी इसकी फिराक में थी। ये बात सही है कि शुरू में गुजरात से दिल्ली आकर यहां स्थापित होने में मोदी ने जेटली की पूरी सहायता ली। और एक समय तो माना जा रहा था कि पूरी सरकार ही जेटली चला रहे हैं। लेकिन बाद में धीरे-धीरे जेटली के पंख कतरे जाने लगे और उनसे एक-एक कर महत्वपूर्ण विभाग छीना गया।

बताया जा रहा था कि मोदी-शाह बहुत पहले से ही पीयूष गोयल को वित्तमंत्रालय देने का मन बना चुके थे। लेकिन उसके लिए कोई रास्ता नहीं दिख रहा था। इस बीच जेटली के स्वास्थ्य का उन्हें अच्छा बहाना मिल गया। और उन्हें अपनी चाहत को लागू करने का इससे बेहतर मौका और नहीं मिल सकता था। लिहाजा रेल जैसे एक बड़े मंत्रालय को देखने के बावजूद गोयल को नार्थब्लाक में भेज दिया गया। 

शायद जेटली वित्तमंत्रालय में वापस लौटना चाहते हैं लेकिन उन्हें हरी झंडी नहीं मिल पा रही है। अनायास नहीं आजकल उनका जोर अपने को खबरों में बनाए रखने का है। हर दूसरे दिन कोई न कोई ब्लाग या फिर उनकी फेसबुक पोस्ट नुमाया हो जाती है। जिस पर देश में अपने-अपने तरीके से प्रतिक्रिया होती है। और अब तो विपक्ष ने भी इसको सूंघ लिया है। और उसने देश का वित्तमंत्री कौन है ये सवाल पूछना शुरू कर दिया है।




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