मर रहे हैं लोग हंस रही है व्यवस्था !

ज़रा सोचिए... , , बुधवार , 10-01-2018


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अमरेश मिश्र

कल ही की खबर है...

उत्तराखंड के छोटे व्यवसायी प्रकाश पाण्डे की मृत्यु हो गयी। जीएसटी और नोटबंदी की वजह से प्रकाश का ट्रांसपोर्ट का बिज़नेस ठप पड़ गया था। अपने बच्चों के स्कूल की फीस भी नहीं दे पा रहे थे प्रकाश। इस भयंकर पीड़ा के चलते, पिछली शनिवार को, प्रकाश ने, जीएसटी और नोटबंदी के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराने के लिए, देहरादून भाजपा ऑफ़िस के सामने, सरे-आम ज़हर खा लिया था।

दूसरी खबर कल ही की...

पंजाब में शुरू हुई कर्ज माफी स्कीम की लिस्ट में अपना नाम न पाकर शहीद ऊधम सिंह के पोते किसान गुरदेव सिंह ने आत्महत्या कर ली...यह सोचिये कि एक शहीद, स्वतन्त्रता सेनानी का पोता, सारे सशक्तीकरण के बावजूद, अपने को कितना असहाय महसूस कर रहा होगा इस व्यवस्था के सामने!

आज जलियांवाला बाग का वो कातिल अंग्रेज अधिकारी, जिसको लन्दन में उसी के घर में घुसकर ऊधम सिंह ने मारा था, अपनी कब्र में खुशी से लोट रहा होगा-कि उसको भारत में मोदी जैसा अंग्रेज परस्त नेता मिला, जिसने ऊधम सिंह के पोते को ही मार डाला!

तीसरी खबर कल ही की...

आन्ध्र प्रदेश के विशाखापट्नम जिले में 11 साल के बच्चे ने आधार कार्ड न मिलने से मायूस हो कर आत्महत्या कर ली। आधार कार्ड न मिलने पर कोई आत्महत्या करता है? सामान्य दौर में इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। पर हम सामान्य दौर में नहीं जी रहे हैं। सोचिये आम जन-मानस कितनी व्यथा से गुज़र रहा है-कोरपोरेट-विदेशी ताक़तों के इशारों पर काम कर रहा मोदी सरकार का प्रचार तन्त्र दिन-रात इस झूठ को प्रचारित कर रहा है कि आधार कार्ड के बिना अब किसी का कोई अस्तित्व ही नहीं रहेगा। कितनी पीड़ा, कितनी मानसिक यंत्रणा से गुज़रा होगा वह बच्चा आत्महत्या करने से पहले!

जीडीपी का खेला!

आर्थिक मंदी के चलते पिछली तिमाहियों में ही सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि में 3.5 प्रतिशत अंक की गिरावट आई है...जहाँ वह जनवरी-मार्च 2016 के मुकाबले 9.2 प्रतिशत से गिरकर अप्रैल-जून 2017 में 5.7 प्रतिशत हो गई।

इसके चलते भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) ने वर्ष 2017-18 के लिए जीडीपी वृद्धि पूर्वानुमान में कटौती कर इसे 7.3 प्रतिशत से 6.8 प्रतिशत कर दिया है। इसी रुझान के चलते अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने भी जीडीपी ग्रोथ 6.7 प्रतिशत अनुमानित की है।

बेरोज़गारी का रेला!

अर्थव्यवस्था में रोजगार का अभाव और कारोबारी अवरोध की स्थिति चिंताजनक स्तर तक पहुँच गई है। बीएसई-500 में शामिल संगठित क्षेत्र की 107 कम्पनियों ( सूचना प्रोद्योगिकी और वित्तीय सेवाओं को छोड़कर) के आँकड़े बताते हैं कि मार्च 2015 से मार्च 2017 के बीच उनके द्वारा कर्मचारियों की नियुक्ति में 2 प्रतिशत की कमी आई है।

विमुद्रीकरण ने विशेष रूप से असंगठित क्षेत्रों के उत्पादन और रोजगार पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। आर्थिक वृद्धि दर में गिरावट की यह प्रवृत्ति वर्ष 2016-17 में निरंतर बनी हुई, और उत्पादन कटौती एवं डीकास्टिंग के चलते वर्ष 2017-2018 में भी इसमें कमी होने का आकलन किया गया है।

कृषि एवं उद्योग क्षेत्र में संकट की स्थिति बनी हुई है, जिससे रोजगार सृजन न्यूनतम स्तर तक पहुंच गया है। कृषि के बिगड़ते हालातों के कारण ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ टूट गई है।

विनिर्माण (Manufacturing) फेल!

इस रूप में देखें तो जीडीपी ग्रोथ मुख्य रूप से सेवा क्षेत्र पर ही निर्भर है। जबकि देश में रोजगार वृद्धि मुख्य रूप से विनिर्माण (Manufacturing) गतिविधियों और असंगठित सेवा क्षेत्र पर निर्भर है।

विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि विनिर्माण (Manufacturing) क्षेत्र और असंगठित क्षेत्र के नोटबंदी से बुरी तरह प्रभावित होने के कारण जीडीपी और रोजगार में विनिर्माण (Manufacturing) क्षेत्र की जिम्मेदारी 25 वर्ष पूर्व रही हिस्सेदारी से भी कम हो गई है।

पूंजी निवेश और निर्यात!

विश्व अर्थव्यवस्था में औद्योगिक उत्पादन और विनिर्मित (Manufactured) वस्तुओं के निर्यात में भारत की हिस्सेदारी में निरंतर गिरावट आई है।

जीडीपी के एक अनुपात के रूप में निवेश (सकल नियत पूंजी निर्माण) वर्ष 2014-15 के 30.4 प्रतिशत से गिरकर वर्ष 2016-17 में 27.1 प्रतिशत रह गया है। जीडीपी के एक अनुपात के रूप में विनिर्मित (Manufactured) वस्तुओं का निर्यात वर्ष 2014-15 के मुकाबले 15.2 प्रतिशत से गिरते हुए 12.2 प्रतिशत हो गया है।

इसके साथ ही व्यापारिक वस्तुओं के निर्यात का अमेरिकी डॉलर मूल्य भी विगत तीन वर्षों में निरंतर गिरता जा रहा है। निवेश अवरुद्ध होने से अर्थव्यवस्था में जड़ता की स्थिति आ गई है।

गतिहीनता!

बैंको में गैर निष्पादन संपत्ति (एनपीए) में वृद्धि की समस्या, बैड लोन की समस्या, उच्च ब्याज दरें, निवेशकों का घटता भरोसा, बढ़ती महंगाई, पेट्रोल के दामों में वृद्धि, बुनियादी ढाँचागत सुविधाओं में कमी और जीएसटी की उच्च दरों ने अर्थव्यवथा में गतिहीनता की स्थिति पैदा कर दी है।

 

  • गुब्बारा फूट रहा है!

 

सबका साथ-सबका विकास की बात करने वाली मोदी सरकार आर्थिक विकास के दावे उपभोक्ताओं के घटते भरोसे, विनिर्माण (Manufacturing) क्षेत्र में घटती व्यावसायिक प्रेरणा, रोजगार को लेकर बढ़ती चिंता और अर्थव्यवस्था में फिसलन की स्थिति के सामने गुब्बारे में भरी हवा के समान लगते हैं। तीव्र, उच्चतर एवं अधिक समावेशी विकास के उद्देश्य के साथ विकास की उम्मीदें धूमिल होती दिखाई दे रही हैं।

ये तमाम आंकड़े मेक इन इण्डिया, इज़ ऑफ़ डूइंग बिजनेस, स्टेंड अप इंडिया, ग्लोबल इन्वेस्टर मीट सहित विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा की गई विदेशी यात्राओं सहित मोदी सरकार के विकास दावों की पोल खोलती है। आगामी समय भारतीय अर्थव्यवस्था और आम जनता के लिए काफी मुश्किलों भरा रहने वाला है।

(अमरेश मिश्र इतिहासकार होने के साथ सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्ता हैं और आजकल लखनऊ में रहते हैं।)






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