चुनावी फंडिंग का गोरखधंधा

पड़ताल , , बुधवार , 08-08-2018


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चंद्र प्रकाश झा

राजनीतिक दलों को अपना खर्च पार्टी के बाहर से ही जुटाना पड़ता है। यह खर्च, चुनावों में बेतहाशा बढ़ जाता है। अगला आम चुनाव मई 2019 के पहले निर्धारित है।  जाहिर है सभी पार्टियां अपने चुनावी खर्च जुटाने में लग गईं हैं। पार्टियों को चुनावी खर्च के  लिए धन उपलब्ध कराने की राष्ट्र-राज्य से सांविधिक व्यवस्था करने की  अर्से से की जा रही मांग पर   कुछ भी ठोस उपाय नहीं किये गए हैं। ऐसे में, पार्टियां पूंजीपति वर्ग से घोषित-अघोषित चन्दा लेती हैं।  बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने हाल में पटना में  कहा कि  वह  11 करोड़ सदस्यों के साथ भारत ही नहीं दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी  है।  पर उन्होंने यह सत्य नहीं बताया कि बीजेपी भारत की सबसे अमीर पार्टी भी है और उसे यह अमीरी राजसत्ता में रहने से मिली है।

पिछले आम चुनाव के बाद केंद्रीय सत्ता में आने पर नई दिल्ली में पार्टी का भव्य मुख्यालय तैयार हो चुका है। दिल्ली के बाहर  कुछ अन्य जगहों पर  पार्टी के या तो नए कार्यालय बने हैं या फिर उनके लिए भूमि खरीदी जा चुकी है। आरोप है कि नोटबंदी से पहले उसकी भनक पाकर बीजेपी के पास जमा नगदी का इस्तेमाल भूखंड आदि खरीदने में कर लिया गया था। बताया जाता है कि कुछ गुजराती अखबारों में नोटबंदी लागू होने के संकेत की खबरें छपी थीं।

हाल  में   प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी और केंद्रीय वित्त मंत्री  पीयूष गोयल ने 30 बड़े पूँजीपतियों के साथ कुछेक  घंटे  बैठक की।   श्री गोयल, भाजपा कोषाध्यक्ष पद भी संभाले हुए हैं। माना जाता है कि भारत के पूंजीपति वर्ग ने  2014 में मोदी जी को सत्ता में लाने में मदद की थी।

भाजपा द्वारा किये चुनावी वादों के अनुरूप मोदी सरकार द्वारा  जीएसटी, दिवालिया कानून जैसे किये गए आर्थिक उपायों से पूंजीपति वर्ग प्रसन्न तो है। लेकिन वह वैश्विक आर्थिक संकट के चलते सशंकित भी है। ऐसे संकेत भी हैं सभी पूंजीपति सिर्फ बीजेपी पर दांव नहीं लगाना चाहते हैं।  कुछ पूंजीपति कांग्रेस की भी मदद करने के हिमायती हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि कांग्रेस के महागठबंधन के सत्ता में आने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।

पार्टी सदस्यों से वार्षिक  सदस्यता शुल्क सिर्फ एक औपचारिकता रह गई है। कम्युनिस्ट पार्टियां अपने सदस्यों से  उनकी आय के तयशुदा अनुपात में ' लेवी ' वसूलती हैं।   त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री माणिक सरकार सरीखे पूर्णकालिक पार्टी कार्यकर्ता समस्त आय अपनी , मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को प्रदान कर पार्टी से मिले    ' कार्यकर्ता -वृत्ति ' के सहारे गुजर बसर करते हैं।  कम्युनिस्ट पार्टियों को भी चाहे -अनचाहे धन्ना सेठों से चन्दा लेना ही पड़ता है। वे अपनी सम्पदा को बढ़ाने के लिए पूंजी बाजार में निवेश भी करते हैं।

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स  ( एडीआर) नामक एक  स्वैच्छिक संस्था ने सात अगस्त 2018 को जारी अपनी  रिपोर्ट में पार्टियों को मिले चंदे का संक्षिप्त ब्योरा दिया है और कहा है कि वह जल्द ही विस्तृत ब्योरा भी सार्वजानिक करेगा।  ताजा ब्योरा से पता चलता है कि चंदों के मामले में दिल्ली के मुख़्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी का हिसाब -किताब बाकियों से बेहतर है।  आप के नवीनतम हिसाब -किताब के अनुसार उसे कुल 3865 चन्दा दाताओं से  24.73 करोड़ रूपये मिले।  सिर्फ आप ने स्वीकार किया है कि उसे विदेशों से भी करीब नौ करोड़ रूपये चंदे मिले।

क्षेत्रीय दलों को कुल 91.37 करोड़ रूपये के चंदे मिले।  इनमें से शिवसेना को करीब 25 करोड़ रूपये और शिरोमणि अकाली दल को 15 करोड़ रूपये मिले।

चौंकाने वाली बात यह है कि नगद चन्दा देने में असम , किसी भी राज्य से आगे रहा जिसने 72 लाख रूपये चंदे दिए। भारत में टेलीकॉम क्रान्ति के जनक माने जाने वाले और कांग्रेस के करीबी गुजराती उद्यमी, सैम पित्रोदा ने  कई बरस पहले सुझाव दिया था कि निर्वाचन आयोग से पंजीकृत एवं मान्यता प्राप्त हर राजनीतिक दल को कम्पनी अधिनियम के एक विशेष , सेक्शन 20 बी के तहत  कुछ धर्मार्थ न्यास की तरह  " नॉट–फॉर -प्रॉफिट " कम्पनी में परिणत कर दिया जाए। इन पार्टियों का 'कारोबार' शेयर बाज़ार में सूचीबद्ध किया जाए।  ताकि उनके सदस्य और समर्थक इन शेयरों की  खरीद फरोख्त कर इन राजनीतिक कंपनियों को चुनाव लड़ने या नहीं लड़ने के लिए उत्प्रेरित कर सकें। उस सुझाव पर कभी समुचित चर्चा ही नहीं हुई।

दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने अपनी पार्टी की रैलियों में लोगों के खुदरा से लेकर थोक दान तक मिलाकर  एकत्रित कुल रकम की ' थैली ' लेने  की परम्परा विकसित की थी। नई दिल्ली के बोट क्लब मैदान में 23 दिसंबर 1978 को उनकी 75 वीं जयन्ती के अवसर पर  किसान रैली में  बड़ी धनराशि की थैली हासिल हुई थी। वह थैली  अनुमानित 75 लाख रूपये की थी। चौधरी साहब ने किसान ट्रस्ट की स्थापना और उस ट्रस्ट की और से  ' असली भारत ' नामक पत्रिका का प्रकाशन इस थैली का सदुपयोग कर ही किया था।

बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख एवं उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने थैलियां लेने की परम्परा और आगे बढ़ाई। उनके राजनीतिक विरोधी आरोप लगाते हैं कि उन्होंने  इन थैलियों से  अकूत धनराशि जमा की।  यह आरोप भी लगते रहे हैं कि उन्होंने अपनी पार्टी के ' चुनावी टिकट ' बेच कर और भ्रष्टाचार के अनेक तरीकों से भी बड़ी  धनराशि जमा की। जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय ( नई दिल्ली ) से शिक्षित अर्थवेत्ता एवं पूर्व  पत्रकार और अब आंध्र प्रदेश के वैज़ाग में स्वतंत्र व्यवसाय कर रहे , जी. वी रमन्ना के अनुसार उत्तर प्रदेश विधान सभा के पिछले चुनाव से पहले  8 दिसंबर 2016 की रात आठ बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अचानक की गई घोषणा  के तुरंत बाद  उसी मध्यरात्रि से लागू नोटबंदी एक उद्देश्य संभवतः बसपा प्रमुख को चुनाव में इस्तेमाल की जाने वाली उनकी नगदी से वंचित करना भी था।

यह बात जगजाहिर है कि हाल में तमिलनाडु के तूतीकोरिन में भारतीय मूल के अनिल अग्रवाल की जिस बहुराष्ट्रीय कम्पनी , वेदांता के तांबा गलाने के संयंत्र से प्रदूषण के विरोध में प्रदर्शन में शामिल लोगों पर पुलिस फायरिंग में 13 लोगों को भून दिया गया वह मोदी जी के बड़े समर्थक हैं।

वेदांता ने भाजपा और कांग्रेस , दोनों को चंदे दिए हैं। दिल्ली हाई कोर्टमें दाखिल   अदालती दस्तावेजों के मुताबिक़ उसने 2004 से 2015 के बीच भाजपा को 17 . 65 करोड़ रूपये और कांग्रेस को 8 . 75 करोड़ रूपये चंदे दिए। राजनीतिक दलों को थैली , चन्दा लेने में कोई ख़ास अड़चन तब तक नहीं है जब तक कि ये चंदे देश के कानून के अनुसार हों। लेकिन अक्सर ये चंदे क़ानून के खिलाफ दिए और लिए जाते हैं। लेकिन बरसों से चल रहे इन अवैध चंदों को वैधता प्रदान करने के लिए  हाल में क़ानून ही बदल दिया गया।   मोदी सरकार ने पहले भी वित्त विधेयक (2016 ) के जरिए एफसीआरए में संशोधन कर राजनीतिक दलों के लिए विदेशी चंदा लेने को आसान बनाया था।

इस बरस संसद के बजट सत्र में सत्ता पक्ष ने  मुख्य विपक्ष कांग्रेस के खुले सहयोग से राजनीतिक दलों को विदेशी चन्दा के नियमन से सम्बंधित कानून ही 42 बरसों के पूर्वकालिक प्रभाव से बदल दिया। दरअसल, विदेशी  चंदा नियमन कानून ( एफसीआरए ) 2010 संशोधन विधेयक को केंद्रीय बजट से सम्बंधित वित्त विधेयक की तरह बिना बहस के ही ' गिलोटिन ' के जरिये पारित कर दिया गया । नए संशोधन से राजनीतिक पार्टियों को वर्ष 1976 से मिले सारे के सारे विदेशी चंदे  पूर्वकालिक प्रभाव से बिलकुल वैध हो गए हैं। सरकार ने विदेशी कंपनी की परिभाषा ही

बदल दी है। नई परिभाषा के तहत किसी भी कंपनी में 50 फीसदी से कम शेयर पूंजी, विदेशी इकाई के पास है तो वह विदेशी कंपनी नहीं कही जाएगी। नए संशोधन से राजनीतिक दलों को विदेशी चंदा लेना और भी आसान हो गया। यही नहीं उन्हें 1976 के बाद से  मिले तमाम विदेशी चंदे की जांच संभव नहीं होगी। संशोधन की बदौलत भाजपा और कांग्रेस , दिल्ली हाईकोर्ट के 2014 उस फैसले के शिकंजे से  बच जाएंगी जिसमें उन्हें एफसीआरए कानून के उल्लंघन का दोषी पाया गया था ।

हाल में सुप्रीम कोर्ट ने  उक्त संशोधन की वैधता को चुनौती देने वाली एडीआर   की एक याचिका विचारार्थ स्वीकार कर  ली।  इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस  दीपक मिश्रा की एक बेंच ने  2 जुलाई को केंद्र सरकार को नोटिस जारी किये हैं।  इस याचिका में संसद द्वारा पारित वित्त विधेयक 2018 के सेक्शन 217 और सेक्शन 236 को निरस्त करने की याचना की गई है, जिनके तहत विदेशी चंदे के क़ानून में नियमन को लुंज-पुंज बना दिया गया है।   केंद्र सरकार के पूर्व सचिव ई ऐ एस शर्मा इस स्वैच्छिक संस्था जुड़े हुए हैं। ऐडीआर के अनुसार इस बार के बजट सत्र में एफसीआरए कानून में संशोधन दिल्ली हाई कोर्ट के मार्च 2014 के उस निर्णय को नकारने के लिए किया गया जिसमें भाजपा और कांग्रेस , दोनों को विदेशी चंदे लेने में क़ानून का उल्लंघन करने का दोषी ठहराया गया था।  हाई कोर्ट के आदेश में निर्वाचन आयोग से इन दोनों पार्टियों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया था।

एडीआर  ने विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा वित्त वर्ष 2016 -17 के अपने आय-व्यय के निर्वाचन आयोग को सौंपे ब्योरा का विश्लेषण कर जो रिपोर्ट जारी की उसमें कई तथ्य चौंकाने वाले हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार निर्वाचन आयोग को यह ब्योरा सौंपने की अंतिम तारीख 30 अक्टूबर 2017 थी।  लेकिन सांविधिक रूप से अनिवार्य यह ब्योरा वित्त एवं विधि विशेषज्ञों से भरपूर भाजपा ने 99 दिनों की देरी से 8 फरवरी 2018 को और कांग्रेस ने तो 138 दिनों के विलम्ब से 19 मार्च 2018 को दाखिल किये।

निर्वाचन आयोग से राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी की मान्यता प्राप्त सात दलों , भाजपा , कांग्रेस , बसपा, माकपा , भाकपा और तृणमूल कांग्रेस ने  वित्त वर्ष 2016 -17 में समस्त भारत से कुल मिलाकर 1, 559 . 26 करोड़ रूपये की आय तथा कुल 1228. 26 का व्यय दर्शाया है।  भाजपा ने सर्वाधिक कुल 710 . 057 करोड़ रूपये का  ऑडिट किया खर्च घोषित किया है।  कांग्रेस ने अपनी कुल आय से 96 . 30 करोड़ रूपये अधिक 321 . 66 करोड़ रूपये का खर्च  दिखाया है। एडीआर  के अनुसार राज्य सभा के मौजूदा 229 सदस्यों में  सबसे अमीर राज्यसभा सदस्य , बिहार से जनता दल -यूनाइटेड के महेंद्र प्रसाद हैं , जिनकी घोषित  संपत्ति करीब 4 हज़ार करोड़ रुपये की है।

एडीआर के विश्लेषण से पता चलता है कि 1914 में मोदी सरकार के गठन के बाद से भाजपा का खज़ाना खूब भरा है।  वित्त वर्ष 2015 - 16 से एक ही बरस में भाजपा का खज़ाना 570 . 86  करोड़ रूपये से  81 . 18  प्रतिशत की वृद्धि दर्ज कर 1034 . 27 करोड़ रूपये का हो गया। दूसरी ओर, इसी दरम्यान कांग्रेस का खज़ाना  261 . 56 करोड़ रूपये से 14 प्रतिशत घटकर 225 . 36 करोड़ रूपये रह गया।  इन दोनों दलों ने अपनी आय के तीन मुख्य स्रोतों में से चन्दा को सर्वाधिक दिखाया है। चन्दा के मद में  भाजपा ने 997 करोड़ रूपये और कांग्रेस ने 50 करोड़  की प्राप्ति दिखाई है।  खर्च के मद में भी भाजपा सबसे आगे है।  उसने वर्ष 2016 -17 में चुनाव और आम प्रचार पर 606 करोड़ रूपये  और प्रशासनिक मद में 69 करोड़ रूपये खर्च किये। इसी दौरान चुनाव और आम प्रचार पर कांग्रेस  ने सिर्फ 149 करोड़ रूपये और प्रशासनिक मद में 115  करोड़ रूपये खर्च किये।

निर्वाचन आयोग से राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी की मान्यता प्राप्त सात दलों , भाजपा , कांग्रेस , बसपा , माकपा , भाकपा और तृणमूल कांग्रेस ने वित्त वर्ष 2016 -17 में  बैंकों  में जमा अपनी धनराशि  और सावधिक जमा पर ब्याज से कुल मिलाकर 128 करोड़ रूपये की आमदनी स्वीकार की है।  इन दलों में से भाजपा , कांग्रेस , भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और पूर्व रक्षा मंत्री शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने पिछले पांच वर्षों से अपने आय -व्यय की ऑडिट रिपोर्ट निर्वाचन आयोग को देने में लगातार देरी की है।  राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी की मान्यता प्राप्त सात दलों की कुल आमदनी 2015 -16 के 1033 करोड़ रूपये से 51 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज कर 1559 करोड़ हो गई है।

एडीआर ने सुप्रीम कोर्ट के 13 सितम्बर 2013 के एक निर्णय का हवाला देते हुए कहा है निर्वाचन आयोग प्रभावी नियम लागू करे कि कोई भी राजनीतिक दल फॉर्म 24 बी में 20 हज़ार रूपये से अधिक के मिले चंदे का ब्योरा देने का कॉलम का कोई भी भाग खाली नहीं छोड़े।  साथ ही , अमरीका , जापान , जर्मनी , फ़्रांस , ब्राजील , इटली , बुल्गारिया , नेपाल और भूटान की तरह ही भारत में भी  राजनीतिक पार्टियों को प्राप्त चंदा का पूर्ण विवरण सूचना के अधिकार के तहत सार्वजनिक समीक्षा के लिए उपलब्ध कराना अनिवार्य  हो।

उपरोक्त देशों में से किसी में राजनीतिक दलों को प्राप्त धन का 75 प्रतिशत हिस्सा छुपा कर नहीं रखा जा सकता है। वर्ष 2017 के वित्त विधेयक में आयकर अधिनियम  के सेक्शन 13 ए में संशोधन कर कहा गया है कि पंजीकृत राजनीतिक पार्टियों को आय कर से माफी दी जाएगी। बशर्ते कि वे सेक्शन 139 के सब सेक्शन 4 बी के तहत पूर्व वित्त वर्ष की अपनी आय का पूरा ब्योरा निर्धारित तिथि या उसके पहले दाखिल करें। अगर कोई भी राजनीतिक पार्टी ऐसा नहीं करती है  तो निर्वाचन आयोग उसकी मान्यता रद्द कर सकती है।  लेकिन ये सारी बातें चुनावी लोकतंत्र का ढकोसला ही लगती हैं। चुनावी  चंदा के हमाम में नंगी पड़ी राजनीतिक पार्टियां , कानून को धता बताकर चुनाव लड़ती रहती हैं।

(चंद्र प्रकाश झा वरिष्ठ पत्रकार हैं और हर विषय पर अपनी पैनी नजर रखने के लिए जाने जाते हैं। आप आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

 








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Vishva Pratap Garg :: - 08-10-2018
श्रीमान, भगवान शिव की पूजा जब गुरु स्वरूप में दी जाती है तब वह "गुरू गोरख नाथ "जी कहलाए जाते हैं। "गोरख" जिनका अर्थ है "गौमाता" के रक्षक। हिन्दू पुराणों में "गौ" में 33 कोटि देवि देवताओं का निवास माना गया है। जिसका एक अर्थ यह भी हुआ सदाशिव भगवान शिव का वह स्वरूप जिसमें वह न केवल सभी देवि देवताओं के पूज्यनीय गुरु हैं अपितु उनका पालन पोषण व संरक्षण भगवान शिव की प्राण उर्जा से ही हो रहा है। भगवान शिव को चाहें आप देवों के देव "महादेव" के रूप में पूजे या भक्त वत्सल "भोलेनाथ" के रूप में या फिर महायोगी भगवान शिव के गुरू स्वरूप "गुरू गोरखनाथ" के रूप में। वह तो हर रूप में शिव ही हैं और शिव ही रहेंगे जो सदैव भक्तजनों का कल्याण ही करते हैं कोई धंधा नहीं। यह मेरा एक श्रोता का निवेदन समझिए या एक भक्त का पर इतना ध्यान जरूर रखें कि परमपिता परमात्मा भगवान शिव की गरिमा का हनन न हो। गोरखधंधा शब्द भगवान शिव की गरिमा का अपमान करता है व आम जनमानस की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाता है। किसी अन्य शब्द का प्रयोग कर लें तो उचित है। और अगर इस शब्द की तरफ आप अन्य न्यूज चैनल व पत्रकार लोगों को भी सचेत करें तो परमात्मा के कमल चरणों में यह एक सेवा ही होगी। अलख निरंजन।।।

CPJHa :: - 08-09-2018
शुक्रिया जनचौक चंदे के गोरखधंधा पर आलेख प्रकाशित करने . एडीआर की नई रिपोर्ट आज आ गई .सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होने पर इसका फॉलो अप किया जा सकता है .