"चुनावी मोड" में जनतंत्र-प्रेमियों की जिम्मेदारी

माहेश्वरी का मत , , बुधवार , 11-07-2018


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अरुण माहेश्वरी

कल ही 'एबीपी' चैनल पर पुण्य प्रसून वाजपेयी कह रहे थे — मोदी अब चुनावी मोड में आ चुके हैं । इसे सही रूप में कहा जाए तो आरएसएस चुनावी मोड में आ गया है । अर्थात, अब आगे, 2019 तक इनका जो भी प्रकट होगा, मोदी जो बोलेंगे, आंकड़ें देंगे, विरोधियों को लताड़ेंगे और थोथे उपदेश देंगे, सब चुनावी होंगे, एक काल विशेष की जरूरतों के लिये । इन सबका सब कुछ संघोनुकूल हो, जरूरी नहीं है । इसमें बहुत कुछ ऐसा भी होगा जो संघमति वालों के शुद्ध संसार की नजर में पतनशील होगा । मसलन् मोदी मुसलमान महिलाओं के अधिकारों की बात कर सकते हैं, तो भारत की विविधता में एकता की बात भी कह सकते हैं और किसानों, मजदूरों की सेवा की बात कर सकते हैं ।

संघमति के शुद्ध मानदंडों पर ये सब पतनशील बाते हैं । कमजोर तबकों की सेवा तो संघमति में पूरी तरह से निषिद्ध है । जैसे हिटलर ने सिर्फ यहूदियों के सफाये का नहीं, देश के सभी अपंगों, बीमार और वृद्ध लोगों को भी गैस चैंबरों के सुपुर्द किया था । संघ की तात्विकता नाजीवाद है । हिटलर की 'माइन कैंफ' (आत्मजीवनी) ही नाजियों के बाइबल की तरह इनकी भी गीता है । अर्थात्, जब हम संघमति कहते हैं तो उसका तात्पर्य होता है — मूढ़मति, विनाशमति और सांप्रदायिक मति आदि के योग से निर्मित फासिस्ट-नाजी मति ।

दरअसल, 'चुनावी मोड में मोदी' का मतलब होता है संघ जगत के बाहर के एक नये जगत का मोदी। शुद्ध रूप से संघी भुवन से बाहर, उसकी तात्विक विशेषताओं से किंचित भिन्न प्रकट रूपों का मोदी । तत्वमीमांसा में प्राणी के मूल तत्व का हर नया प्रकट रूप उसकी पतनशीलता को दर्शाता है । तो यह जो चुनावी मोड का मोदी है, कहना न होगा, संघ संसार से अलग इसका अपना एक स्वतंत्र जगत होगा । यह ऑनलाइन गुंडे कहे जाने वाले ट्रोल और खास प्रकार के भक्तों का जगत होगा । चुनावी मोड के मोदी को उनका यही जगत बिल्कुल सही रूप में समझेगा और इसके कामों का असली रूप जाहिर करेगा । इसीलिये, अगर आपको चुनावी मोड के मोदी को जानना है तो उसके ट्रौल जगत के भीतर की तमाम हलचलों को जानना होगा, आपको इस चुनावी मोड के मोदी का मूल रूप समझ में आ जायेगा । 

इस दौरान इनकी भाषणबाजियों से लेकर भाव-भंगिमाओं तक पर सबकी नजर रहेगी । इनके मर्म को पकड़ने के लिये ही इन पर विचार किया जायेगा । और जब यह विचार-विश्लेषण होगा, इस चुनावी मोड के मोदी के पीछे का पूरा घटना प्रवाह तेजी से सामने आने लगेगा । उनके पूरे काल की समस्याओं से नये सिरे से सामना होगा । दुखों-कष्टों को भूल कर जीने वाले आम आदमी के जख्म फिर एक बार हरे होंगे । दैनंदिन जीवन का यथार्थ लोगों के सर पर चढ़ कर बोलेगा । और इनकी प्रतिक्रिया में मोदी और उनका ट्रोल जगत जो तमाम नाटक करेगा, उनसे उनके हर आने वाले दिन की हरकतों को पहले से ही भापा जा सकेगा । क्या कहा था, क्या किया ! अब उनकी गांठ में झूठ और कुछ और जुमलों के अलावा कुछ नहीं बचा है । कहना न होगा, आगे उनकी रोजमर्रे की जुमलेबाजी ही उनकी वह सामयिकता होगी, जिसके छद्म को भेद कर रोज इनकी फासीवादी तात्विकता को उघाड़ा जायेगा । 

विपक्ष की राजनीति का स्वरूप इन रोजमर्रे के विश्लेषणों और मोदी-संघ की दिशा-दशा पर निर्भर करेगी । उसकी राजनीतिक सिद्धांतवादिता भी इसी प्रकार नये सैद्धांतिक निष्कर्षों के लिये जगह छोड़ेगी । जो ऐसा नहीं करेंगे, वे राजनीति के बाहर के तत्व होंगे । मान लिया जायेगा कि अभी के राजनीतिक घटना-क्रम में उनका कुछ भी दांव पर नहीं है । अन्यथा, इसमें अब कोई शक नहीं है कि हर जनतंत्र प्रेमी और देशभक्त भारतीय के लिये आगे का पूरा साल हर दिन मोदी-संघ और उनके ट्रोल-भक्त जनों के सारे छद्मों को पूरी शक्ति के साथ खोल कर भारत को फासीवाद-नाजीवाद के पंजे से मुक्ति की लड़ाई का साल होना चाहिए । 

(अरुण माहेश्वरी वरिष्ठ लेखक और स्तंभकार हैं और आजकल कोलकाता में रहते हैं।)   










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