पांच राज्यों के चुनाव नतीजे देश की दिशा ही नहीं बल्कि कई नेताओं का तय करेंगे भविष्य

विमर्श , , बृहस्पतिवार , 06-12-2018


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पुण्य प्रसून वाजपेयी

बीजेपी या कांग्रेस ही नहीं बल्कि देश की तमाम राजनीतिक पार्टियां भी जानती हैं कि 11 दिसबंर के बाद देश की राजनीति बदल जायेगी। और संभवत: पांच राज्यों से इतर देश में वोटरों का एक बड़ा तबका भी मान रहा है कि पांच राज्यों के जनादेश से 2019 की राह निकलेगी । जैसे-जैसे तारीख नजदीक आ रही है वैसे-वैसे कांग्रेस और बीजेपी की राजनीति में भी परिवर्तन साफ दिखायी दे रहा है। और इस बदलते माहौल की सबसे बड़ी वजह यही है कि दांव पर बीजेपी या कांग्रेस पार्टी नहीं बल्कि नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी का होना है ।

क्योंकि एक तरफ 2014 के जनादेश ने जिस तरह मोदी के लार्जर दैन लाइफ के औरे को बना दिया। वहीं नेहरु-गांधी परिवार में 2014 का सबसे कमजोर राहुल गांधी का कद 2019 में उसी दिशा में ले जा रहा है जहां 11 दिसबंर के बाद या तो वह देश के प्रधानमंत्री पद के सबसे प्रमुख दावेदार हो जायेंगे या फिर क्षत्रपों की कतार में खड़े नजर आयेंगे। लेकिन कैसे 2014 के हालात 2019 की बिसात पर बीजेपी और कांग्रेस की चाल को उलट दे रहे हैं ये समझना कम दिसचस्प नहीं है। 

पहले कांग्रेस की जीत तले बीजेपी की फितरत को समझें। गुजरात में बराबरी की टक्कर देते हुये जीत ना पाना । कर्नाटक में गठबंधन से मात दे देना। और राजस्थान में कांग्रेस की जीत का मतलब है बीजेपी के भीतर जबरदस्त उथल-पुथल । जो वसुंधरा राजे सिंधिया को एक क्षेत्रीय पार्टी बनाने की दिशा में ले जा सकती है । क्योंकि मोदी-शाह की जोड़ी वसुंधरा को बर्दाश्त करने की स्थिति में तब होगी नहीं। और इसके संकेत बीजेपी छोड़ कांग्रेस में गये मानवेन्द्र सिंह (बीजेपी नेता जसंवत सिंह के बेटे) को जिताने के लिये अंदरुनी तौर पर बीजेपी का ही सक्रिय होना । यहां ये समझ जरुरी है कि बीजेपी का मतलब अमित शाह होता है। और मानवेंद्र की जीत का मतलब वसुंधरा की हार है । ये खेल पहले कांग्रेस में खूब होता था ।

लेकिन कांग्रेस बदल रही है तो सचिन पायलट की मोटर साइकिल के पीछे अशोक गहलोत बैठ कर हवा खाने से नहीं कतराते। खैर मध्यप्रदेश में अगर कांग्रेस जीतती है तो नया सवाल शिवराज सिंह चौहान के बाद कौन ये भी उभरेगा। ठीक उसी तरह जैसे दिल्ली में कांग्रेस हारी तो 15 बरस सत्ता भोगने वाली शीला दीक्षित को लेकर हुआ क्या या कौन से सवाल उठे ये महत्वपूर्ण है । ये अलग बात है कि अब कांग्रेस संभली है तो शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित को कांग्रेस का महासचिव पद दे दिया गया है। पर सवाल है कि क्या संघ के प्रिय और मोदी-शाह को खटकने वाले शिवराज का राज बीजेपी के भीतर भी बरकरार रह पायेगा। और इसी के सामानांतर छत्तीसगढ़ में भी क्या कांग्रेस की जीत रमन सिंह के आस्तित्व को भी बरकरार रख पायेगी। क्योंकि रमन सिंह या कहें उनके बेटे का नाम जिस तरह राहुल गांधी ने पनामा पेपर के जरिये उठाया तो विपक्ष के तौर पर लड़ाकू बीजेपी की अगुवाई कैसे रमन सिंह कर पायेंगे ।

खासकर तब जब रमन सिंह के खिलाफ बतौर कांग्रेसी उम्मीदवार खड़ी अटलबिहारी वाजपेयी की भतीजी करुणा शुक्ला को जिताने में बीजेपी का ही एक प्रभावी गुट लगा हुआ है । यानी रमन सिंह को हारा हुआ देखने वाले छत्तीसगढ़ बीजेपी में हैं । और बीजेपी का मतलब अमित शाह ही होता है ये बताने की जरुरत नहीं है । और इसी लकीर को अगर तेलंगाना ले जाइये तो वहां बीजेपी खिलाड़ी के तौर पर तो है लेकिन बीजेपी जिन मुख्य खिलाड़ियों के आसरे खेल रही है उसमें कांग्रेस के लिये तेलंगाना में संगठन खड़ा करने और चन्द्रबाबू नायडू के साथ होने के हालात ने झटके में केसीआर, औवैसी और बीजेपी को एक ही मंच पर ला खड़ा किया ।

यानी कांग्रेस के लिये धर्म की राजनीति में जो सवाल उलझा था उसका रास्ता तेलगंना में निकलता दिखायी देता है जहां कांग्रेस का साफ्ट हिन्दुत्व बीजेपी-केसीआर के वोट बैक में सेंध लगाती है और खामोश मुस्लिम को अपने अनुकूल करती है । यानी बीजेपी की बिसात पर केसीआर का चलना और ओवैसी का संभल-संभल कर खुद को संभालना ही कांग्रेस की जीत है । क्योंकि ये 2014 की उसी आहट को 2019 में दोहराने की दिशा में ले जा रही है जब एक वक्त कोई कांग्रेस के साथ चलना नहीं चाह रहा था तो अब ये संकट 11 दिसंबर के जनादेश के बाद बीजेपी के साथ हो सकता है । जब एनडीए में भगदड़ मच जाये ।

लेकिन इसके उलट बीजेपी की जीत सीधे राहुल गांधी की लीडरशीप पर सवाल खड़ा करती है । यानी बीजेपी अगर तीन राज्यों में जीतती है तो मोदी-अमित शाह का कद जितना नहीं बढ़ेगा उससे राहुल गांधी का कद कहीं ज्यादा छोटा हो जायेगा । और संकेत तब यही निकलेंगे कि 2019 में कांग्रेस विपक्ष की अगुवाई करने की हैसियत में नहीं है । लेकिन बीजेपी की जीत बीजेपी के संगठन को मोदी-शाह तले जिस तरह केन्द्रित करेगी उसमें बीजेपी का 2019 का चेहरा वहीं होगा जैसा इंदिरा गांधी के वक्त कांग्रेस का था । 

और यहीं से सबसे महत्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है कि 2019 की तरफ बढ़ते कदम एक तरफ बीजेपी को केन्द्रीकृत करती जा रही है तो संकट से जूझती कांग्रेस अपने पिरामिड वाले ढांचे को उलटने का प्रयास कर रही है । 11 दिसबंर को जीत के बाद 2019 के लिये बीजेपी में सारे फैसले मोदी-शाह करेंगे । 11 दिसंबर को जीत के बाद कांग्रेस में राहुल की मान्यता को सर्वोपरि जरूर होगी लेकिन संगठन का ढांचा नीचे से ऊपर आयेगा । यानी कार्यकर्ता की आवाज को महत्व दिया जायेगा । बीजेपी में जिस तरह 75 पार के नेताओं को मार्गदर्शक मंडल में बैठा कर रिटायर कर दिया गया ।

उसके उलट कांग्रेस में ओल्ड गार्ड संगठन को मथने में लगेंगे । और उसके लिये निर्देश राहुल गांधी नहीं देंगे बल्कि बुजुर्ग नेता खुद ही कहेंगे । यानी जो संकेत चिदंबरम ने ये कहकर दिया कि मनमोहन सिंह की दूसरी पारी में ही उन्हे मंत्री नहीं बनना चाहिये था बल्कि संगठन को संभालना चाहिये था । ये संकेत है कि कांग्रेस धीरे-धीरे युवाओं के हाथ में जायेगी । तो बीजेपी की जीत मोदी-शाह की ताकत को संघ से भी ज्यादा बढ़ाती है । और बीजेपी को सिर्फ कार्यकर्ताओं के आंकड़ों में विस्तार मिलता है । कार्यकर्ताओं की उपयोगिता मोदी-शाह की जोड़ी तले ना के बराबर हो जाती है ।

लेकिन कांग्रेस की जीत राहुल गांधी को संगठन सुधारने से लेकर कांग्रेस को युवा ब्रिगेड के जरिये मथने का मौका देगी । जिसमें युवा मंत्री होगा लेकिन बुजुर्ग रिटायर ना होकर संगठन और सत्ता के बीच कड़ी के तौर पर रहेंगे । यानी कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही बदल रही है या 11 दिसंबर के बाद बदलती हुई दिखायी देगी तो बधाई मोदी सत्ता को ही देनी होगी । जिसने चरम की राजनीति को अंजाम दिया । असर यही हुआ कि अब बीजेपी का कांग्रेसीकरण हो नहीं सकता और कांग्रेस सत्ता के मद में खोकर गांधी परिवार की भक्ति में लीन हो नहीं सकती । अब तो नये राजनीतिक प्रयोग । वैकल्पिक नीतियों की सोच । आर्थिक सुधार के आगे का इकनामिक मॉडल और ग्रामीण भारत के मुद्दों को केन्द्र में रखने की मजबूरी ही 2019 की दिशा तय कर रही है ।

(ये लेख वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी के फेसबुक पेज से साभार लिया गया है।)

 








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