इलेक्टोरल बॉन्ड पर सरकार ने कहा- राजनीतिक दलों की फंडिंग का स्रोत जानना मतदाताओं के लिए जरूरी नहीं

मुद्दा , नई दिल्ली, शुक्रवार , 12-04-2019


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। चुनाव में इलेक्टोरल बॉन्ड पर रोक लगाने के मसले पर सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर दिलचस्प बहस छिड़ गयी है। सरकार के वकील यानी देश के एटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि पारदर्शिता कोई मंत्र नहीं हो सकती है। साथ ही उनका कहना था कि उनके विचार में मतदाता को केवल प्रत्याशी के बारे में जानने का हक है। उसे यह जानने की क्या जरूरत है कि राजनीतिक दलों का पैसा कहां से आता है। 

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के नेतृत्व में गठित तीन सदस्यीय बेंच को संबोधित करते हुए एटार्नी जनरल ने राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता की जरूरत पर कहा कि मौजूदा दौर की सचाई पर गौर करना जरूरी है। और इसे बगैर खास समस्याओं को चिन्हित किए लागू नहीं किया जा सकता है। बेंच के दूसरे सदस्यों में जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस संजीव खन्ना शामिल थे।

इसके पहले एटॉर्नी जनरल ने राजनीतिक दलों की फंडिंग को सीमित करने की बात कही थी साथ ही ये भी कहा था अभी तक राज्य की तरफ से किसी तरह की फंडिंग का प्रावधान नहीं है। उन्होंने कहा कि इलेक्टोरल बांड स्कीम के तहत अपनी पहचान का खुलासा न करने के पीछे दानदताओं की ऐसे लोगों से रक्षा करनी है जिनको उन्होंने कोई सहयोग नहीं दिया है।

इस बात पर कि योजना मतदाताओं के जानने के अधिकार के खिलाफ जाती है वेणुगोपाल ने कहा कि “उन्हें इस बात को क्यों जानना चाहिए कि राजनीतिक दलों का पैसा कहां से आ रहा है।” उन्होंने यह बात जस्टिस गुप्ता के उस बयान पर कही जिसमें उन्होंने सिस्टम पर पवित्रता को बढ़ावा देने की बात कही थी। और कहा था कि “मतदाताओं के जानने के अधिकार का क्या यह अहम हिस्सा नहीं है कि किस पार्टी की कहां से फंडिंग हो रही है।”

इस पर एजी ने कहा कि पुत्तुस्वामी फैसले के बाद निजता के अधिकार का भी मामला बनता है।

सीजेआई गोगोई ने एजी से पूछा कि बॉंड को खरीदने वाले का नाम क्या बैंकों को पता होगा? जब स्पष्ट उत्तर नहीं आया तब सीजेआई ने कहा कि “अगर खरीदार की पहचान ज्ञात नहीं है तो इसके बहुत दूरगामी नतीजे निकल सकते हैं। कालेधन से निजात पाने के आपके पूरे प्रयास पर नकारात्मक असर पड़ेगा।”

हालांकि बाद में वेणुगोपाल ने कहा कि बैंक को खरीदार की पहचान पता होगी क्योंकि बांड को खरीदने के लिए केवाईसी का भरा जाना जरूरी है।

इस पर जस्टिस खन्ना ने कहा कि केवाईसी खरीदार की पहचान का केवल प्रमाण भर है। लेन-देन की वास्तविकता की कोई गारंटी नहीं है। एजी ने कहा कि लोग बांडों की खरीद केवल अपने खाते में मौजूद पैसे से कर सकते हैं। इसलिए सभी पैसों की गणना होगी। जस्टिस खन्ना ने कहा कि इस तरह से सेल कंपनियां भी सहयोग करने में सक्षम हो जाएंगी। इस पर एजी ने कहा कि इनकम टैक्स अथारिटी जरूरत के मुताबिक सूचनाएं लेती रह सकती है। उन्होंने कहा कि नयी योजना पुरानी से बुरी नहीं है जिसमें काला धन पूरी व्यवस्था में बहता रहता था। उन्होंने इसे काले धन को कम करने के लिए सरकार की ओर से एक प्रयोग करार दिया। और कहा कि केवल समय ही बताएगा कि ये कितना सफल रहा।

इस बीच, चुनाव आयोग ने बेंच को बताया कि बांड के रूप में राजनीतिक दलों को कितना डोनेशन हासिल हुआ। कमीशन की तरफ से वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने कहा कि इसका खुलासा खुद राजनीतिक दलों ने ही किया है।

एडीआर की तरफ से पेश होते हुए वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक 221 करोड़ में 210 करोड़ रुपये का बांड अकेले बीजेपी द्वारा खरीदा गया है।

   








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