फासीवाद के विध्वंसक लक्ष्य को पाने के लिए फेक न्यूज़ के घोड़े पर सत्ता की सवारी

पड़ताल , , बृहस्पतिवार , 12-07-2018


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डॉ. राजू पांडेय

फेक न्यूज़ का संसार जितना सनसनीखेज और उत्तेजक है उतना ही भयावह भी। दरअसल मानव के मनोविज्ञान के स्याह पक्ष की गहरी और आपराधिक समझ फेक न्यूज़ को बेहद प्रभावोत्पादक और विध्वंसक बना देती है। बहुत पहले फ्रांसिस बेकन ने अपने विश्व विख्यात निबंध ऑफ ट्रुथ में सत्य-असत्य के संबंधों और शक्तियों की विवेचना करते हुए लिखा था कि असत्य का मिश्रण हमेशा आनंददायी होता है। यदि मानव मन से व्यर्थ के विचार, हास्यास्पद आशाएं, अनुचित आकलन और असत्य तथा असम्भव कल्पनाएं हटा ली जाएं तो बहुत से मनुष्यों का मन-मस्तिष्क दयनीय रूप से संकुचित अवस्था में चला जायेगा और उन्हें अवसादग्रस्त और अक्रिय बना देगा। फेक न्यूज़ के संबंध में हुए नवीनतम शोध और अनुसंधान मनुष्य के असत्य के प्रति इस दुर्दमनीय आकर्षण की शक्ति को रेखांकित करते हैं।

मैसाच्यूसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) के शोधकर्ताओं का हालिया अध्ययन यह दर्शाता है कि सूचना की समस्त श्रेणियों में असत्य सूचनाओं का प्रसार सच्ची खबरों की तुलना में बहुत अधिक तीव्र गति से और काफी अधिक व्यापकता एवं गहराई के साथ होता है। विशेषकर राजनीति से जुड़ी झूठी खबरें तो सर्वाधिक तीव्र गति से फैलती हैं और इनका असर भी अधिक होता है। जबकि प्राकृतिक आपदाओं, विज्ञान और वित्त से जुड़ी झूठी खबरें अपेक्षाकृत धीमी गति से फैलती हैं और इनका प्रभाव भी पॉलिटिकल फेक न्यूज़ की तुलना में कम होता है। यह अध्ययन यह भी संकेत करता है कि सामान्य पंजीकृत सोशल मीडिया यूजर भले ही फेक न्यूज़ का जनक न हो लेकिन इसे फैलाने में वह बढ़ चढ़कर हिस्सेदारी निभाता है। 

प्यू रिसर्च सेंटर ने भी दिसम्बर 2016 के एक सर्वे में बताया कि 23 प्रतिशत अमेरिकी वयस्क जाने अनजाने फेक न्यूज़ शेयर करने के लिए उत्तरदायी हैं। एमआईटी के अध्येताओं ने ट्विटर पर मौजूद 126000 खबरों का विश्लेषण किया जो 30 लाख ट्विटर उपयोगकर्ताओं द्वारा लगभग 45 लाख बार ट्वीट की गई थीं। इस विश्लेषण से यह ज्ञात हुआ कि सच्ची खबरों की तुलना में झूठी खबरों के रिट्वीट होने की संभावना 70 प्रतिशत अधिक होती है। सच को 1500 व्यक्तियों तक पहुंचने के लिए झूठ की तुलना में छह गुने समय की आवश्यकता होती है। इंडियाना यूनिवर्सिटी के फिलिप्पो हमें उन फर्जी और आपराधिक तत्वों के विषय में चौंकाने वाले आंकड़े देते हैं जो फेक न्यूज़ फैलाने में संलग्न हैं। उनके अनुसार फेसबुक पर 60 लाख और ट्विटर पर 48 लाख बॉट्स मौजूद हैं और ये फेक न्यूज़ फैलाने के लिए उत्तरोत्तर परिष्कृत तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

वारविक यूनिवर्सिटी के अन्वेषणकर्ता यह बताते हैं कि कालांतर में सत्य सिद्ध होने वाली सनसनीखेज खबरों के विषय में संदेह निवारण और शंका समाधान में औसतन 2 घण्टे का समय लगता है जबकि असत्य सिद्ध होने वाली अफवाहों की सच्चाई सामने आते आते औसतन 14 घण्टे लग जाते हैं तब तक ये खबरें जितना नुकसान करना होता है कर चुकी होती हैं। इस अध्ययन के अनुसार किसी असत्य दावे के समर्थन में किए जाने वाले ट्वीट्स बहुत कम समय में हजारों बार रिट्वीट किए जाते हैं। किन्तु जब इन असत्य खबरों का फैक्ट चेक सामने आता है तब उसे रिट्वीट करने की प्रवृत्ति नहीं दिखती। फैक्ट चेक आने में अधिक समय लगता है। फेक न्यूज़ के प्रसार में अनेक नितांत एक्टिव यूज़र्स अपनी भूमिका जोर शोर से निभाते हैं किंतु फैक्ट चेक के प्रचार प्रसार हेतु ऐसा संगठित प्रयत्न होता नहीं दिखता। फेक न्यूज़ का उत्पादन एक संगठित व्यापार है जिसे कुछ मुट्ठी भर लोग संचालित कर रहे हैं जबकि फैक्ट चेक का कार्य निजी स्तर पर किया जाता है और वह अभी प्रारंभिक दौर में है। इंडियाना विश्वविद्यालय में हॉक्सी और ट्रुथी जैसे प्लेटफार्म विकसित किए जा रहे हैं जो फेक न्यूज़ का पर्दाफाश करने में सहायक होंगे।

फेक न्यूज़ के राजनीतिक षड्यंत्रों हेतु उपयोग का अंदाज़ा तब लगता है जब 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों में सोशल मीडिया और फेक न्यूज़ की भूमिका पर नेशनल ब्यूरो ऑफ इकॉनॉमिक रिसर्च के एक शोध पत्र में आलकॉट, हंट और मैथ्यू बताते हैं कि इन चुनावों से तीन माह पहले फ़ैलने वाली फेक न्यूज़ स्टोरीज में से ट्रम्प से जुड़ी झूठी खबरें 3 करोड़ बार रिट्वीट की गईं जबकि हिलेरी क्लिंटन से जुड़ी ऐसी ही खबरें केवल 80 लाख बार रिट्वीट की गईं। यद्यपि केवल .92 प्रतिशत अमेरिकी नागरिकों ने ट्रम्प से जुड़े फेक न्यूज़ को देखा और याद रखा जबकि हिलेरी क्लिंटन के लिए यह संख्या .23 प्रतिशत थी। इन फेक न्यूज़ पर विश्वास करने वाले लोगों की संख्या देखने और याद रखने वाले लोगों की भी आधी थी।

हमारे देश की परिस्थितियां ऐसी हैं कि फेक न्यूज़ के प्रभाव विध्वंसक हो सकते हैं और हमारी सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था को अस्थिर करने में भी सक्षम हो सकते हैं। भारत का जनमानस तर्क के स्थान पर भावना से संचालित होता रहा है। धर्म की हमारे जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका रही है और हमारी धार्मिक आस्थाओं का दुरुपयोग भी जमकर हुआ है। यौन और आर्थिक अपराधों में लिप्त बाबाओं के विषय में निरन्तर होने वाले खुलासों के बावजूद इन और इन जैसे धर्म गुरुओं पर अंध श्रद्धा कम होती नहीं दिखती। जब देश के नागरिकों को उनकी धार्मिक पहचान के माध्यम से चिन्हित और वर्गीकृत-संगठित करने का आत्मघाती प्रयास अपने चरम पर है तब आस्था से अंधश्रद्धा की ओर जाने वाले पतनोन्मुख मार्ग पर लोगों का धकेला जाना भी तय है।

अफवाहों के प्रति हमारा आकर्षण और सनसनी के लिए हमारी लालसा सोशल मीडिया के अभ्युदय से कहीं पहले से हमारे व्यवहार को प्रभावित करती रही है। चाहे सितम्बर 1995 में पहले दिल्ली और फिर पूरे देश में दूध पीती गणेश मूर्तियां हों या फिर दिल्ली का ही 2001 का मंकी मैन हो- हमने यह सिद्ध किया है कि अफवाहों में जीने के लिए हमें किसी तकनीकी अविष्कार की दरकार नहीं है। सोशल मीडिया मौखिक प्रचार द्वारा फैलने वाली अफवाहों को एक दृश्य श्रव्य आधार प्रदान करता है। अब इन अफवाहों को देखा, सुना और पढ़ा जा सकता है जिससे यह अधिक प्रामाणिक लगने लगती हैं।

सोशल मीडिया क्रांति भारत के राजनीतिक और सामाजिक जीवन में भारी उथलपुथल का कारण बन रही है। पिछले कुछ सालों में स्मार्ट फोन के दामों में भारी गिरावट आई है। टेलीकॉम कंपनियों की गलाकाट प्रतिस्पर्धा ने फ्री डाटा प्लान्स से बाजार को पाट दिया है। इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के आंकड़ों के अनुसार भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या जून 2018 तक 50 करोड़ तक पहुंच चुकी है। दिसंबर 2016 से दिसंबर 2017 के मध्य शहरी भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की वृद्धि दर 9.66 प्रतिशत थी जबकि ग्रामीण भारत में यह दर 14.1 प्रतिशत थी।

किन्तु जहां शहरों में रहने वाली 45.5 करोड़ आबादी में 29.5 करोड़ इंटरनेट यूजर्स हैं वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली 91.8 करोड़ जनसंख्या में केवल 18.6 करोड़ लोग इंटरनेट का उपयोग करते हैं। भारत में मासिक रूप से सक्रिय व्हाट्सएप यूज़र्स की संख्या 20 करोड़ है। स्टेटिस्टा.कॉम के आंकड़े बताते हैं कि अप्रैल 2018 तक भारत में फेसबुक यूजर्स की संख्या विश्व में सर्वाधिक 27 करोड़ हो चुकी थी। जबकि इसी अवधि में हमारे देश में ट्विटर यूज़र्स की कुल संख्या एक करोड़ को पार कर रही थी। भारत में इंटरनेट यूज़र्स की आयुवर्ग वार संख्या का आंकड़ा यह बताता है कि सर्वाधिक इंटरनेट यूजर्स 18-24 वर्ष की आयु के हैं। इनमें पुरुषों की संख्या 7.38 करोड़ और महिलाओं की संख्या 2.34 करोड़ है।

 सोशल मीडिया क्रांति ने अशिक्षित और अल्पशिक्षित वर्ग के लिए सूचनाओं और ज्ञान के नए द्वार खोले हैं। बिना स्कूल और कॉलेज की फीस पटाए(गरीबी और आजीविका की जद्दोजहद अशिक्षा और अल्पशिक्षा का कारण रही है) और  बिना किसी गुरु, शिक्षक या पंडित की मध्यस्थता(जो हमेशा भेदभाव और पक्षपात का कारण बनती थी) के दृश्य श्रव्य माध्यम से ज्ञान बिलकुल अनकट और अनसेंसर्ड रूप से उस तक पहुंच रहा है। सूचनाओं और ज्ञान के विशाल संसार तक अपनी बेरोकटोक पहुंच से आनंदित यह तबका अभी इतना विवेकवान नहीं बन पाया है कि यह समझ सके कि उसे परोसे जा रहे ज्ञान सूत्र  बंधनों से मुक्त करने वाले नहीं अपितु नए प्रकार के बन्धनों में बांधने वाले हैं। ज्ञान का यह प्रकाश जिस विश्व को उसके सम्मुख उजागर कर रहा है वह दरअसल भ्रम की बुनियाद पर खड़ा मायालोक है। फेक न्यूज़ में आकर्षण है, सनसनी है, वह हमारे अवचेतन मन में चल रहे अनियंत्रित और कुत्सित विचारों के साथ संगत है, वह वैसा ही सच हमारे लिए गढ़ने का आभास देता है जो हमें प्रिय है तब भला उससे अप्रभावित कैसे रहा जा सकता है। फेक न्यूज़ को बिना तर्क की कसौटी पर कसे स्वीकार करने की मानसिकता तक लोगों को पहुंचाने के लिए एक चरणबद्ध प्रक्रिया अपनाई जाती है।

इसकी शुरुआत कुछ धार्मिक संदेशों से होती है जिन्हें शेयर न करने पर देवी देवताओं के कोप का भय दिखाया जाता है। ऐसे ही धार्मिक लगने वाले संदेशों और इनका प्रसार न करने पर दण्ड का भय दिखाने के वर्षों पुराने पारंपरिक तरीकों से लोगों की कंडीशनिंग प्रारंभ होती है। किसी संदेश को लाइक या शेयर करते ही सोशल मीडिया प्लेटफार्म द्वारा आपकी पसंद की पहचान कर ली जाती है और मिलते जुलते संदेशों की बमवर्षा आप पर प्रारंभ हो जाती है। धीरे धीरे  इन संदेशों के साथ आने वाले इतिहास, राजनीति और सेना आदि से सम्बंधित ऐसे संदेशों की स्वीकार्यता और ग्राह्यता बढ़ती जाती है जो तथ्यों के साथ की गई चालाक हेराफेरी का नायाब नमूना होते हैं। इनमें यथार्थ और कल्पना का घातक मिश्रण होता है। एक दो ऐतिहासिक तथ्यों की ओट में बहुत सारे जहरीले झूठ आपके दिमाग में ठूंस दिए जाते हैं। उदाहरण स्वरूप एक वायरल पोस्ट की चर्चा आवश्यक लगती है जिसके अनुसार बहुभोगी और अय्याश जवाहरलाल नेहरू ने अपनी बीमार पत्नी की घोर उपेक्षा की। स्थिति यहां तक आ गई कि सुभाष चंद्र बोस ने कमला नेहरू को स्विट्जरलैंड के एक सैनिटोरियम में भर्ती कराया जहां असहाय और एकाकी अवस्था में उनकी मृत्यु हुई। सच्चाई यह है कि कमला नेहरू की बीमारी के दौर में नेहरू अधिकांशतया जेल में थे।

मित्र धर्म का निर्वाह करते सुभाष विएना से बाडेनवैलेर के सैनिटोरियम में जाकर कमला नेहरू से मिले थे और उनकी सहायता भी की थी। कमला नेहरू की मृत्यु के समय नेहरू और इंदिरा दोनों उनके पास थे। पत्नी की मृत्यु से नेहरू व्यथित और अशांत हो गए थे। पंडित नेहरू की आत्मकथा में स्थान स्थान पर इस घटनाक्रम का उल्लेख भी मिलता है। भारत जैसे देश में इससे पहले कि फेक न्यूज़ अपना असल असर डाले आम आदमी के इतिहास बोध को विकृत करने वाली ऐसी हजारों पोस्ट उसे अपनी वास्तविक परंपरा से काटकर एक असहिष्णु और हिंसक व्यक्ति में बदलने का कार्य करती हैं। इनका आसान शिकार वे नौजवान होते हैं (जिन्हें व्यंग्यपूर्वक व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के स्नातक कहा जाता है) जो ज्ञान के प्राथमिक और पुस्तकीय स्रोतों की व्यापकता में उलझने के स्थान पर इंटरनेट द्वारा परोसे जाने वाले इंस्टेंट ज्ञान पर विश्वास करते हैं। इंटरनेट से जुड़ने वाला वह अशिक्षित या अल्पशिक्षित तबका भी आसानी से भरमाया या बरगलाया जा सकता है जिसके लिए मोबाइल पर प्राप्त जानकारी वेद वाक्य का दर्जा रखती है।

राजनीतिक दलों के आई टी सेल में कार्य करने वाले युवा कॉरपोरेट कल्चर की उपज होते हैं जिसमें किसी भी कीमत पर सफलता अर्जित करना ही एक मात्र ध्येय होता है भले ही वह कीमत मनुष्यता और मानव जीवन की क्यों न हो। ये न केवल राजनीतिक प्रोपेगैंडा के लिए शरारतपूर्ण और झूठी खबरें फैलाने का आपराधिक षड्यंत्र रचते हैं बल्कि असहमति के स्वरों को कुचलने के लिए गालियों भरी भाषा का उपयोग भी खुलकर करते हैं। किसी युवा सोशल मीडिया उपयोगकर्ता के लिए ये एक रोल मॉडल की भांति होते हैं- बेपरवाह, दुस्साहसी,एडवेंचर पसंद, आक्रामक, खतरों के खिलाड़ी- खतरों के इस खेल में सुरक्षित रहकर नाम और पैसा कमाने वाले करिश्माई करतबबाज। इस तरह हमें वैचारिक हिंसा का अभ्यस्त बनाया जाता है। इसके बाद अगला चरण भौतिक हिंसा का होता है। यह ट्रेनिंग के बाद होने वाले रियल एक्शन जैसी प्रक्रिया है। ब्रेनवाशड हो चुके इंटरनेट और सोशल मीडिया उपयोगकर्ता के सम्मुख जब मुजफ्फरनगर दंगों के लिए उत्तरदायी वीडियो जैसा कोई भड़काऊ और झूठा समाचार आता है तो इसकी प्रतिक्रिया वैचारिक और भौतिक हिंसा के रूप में होती है। जब हम विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स को संकलित करते हैं और हमें ज्ञात होता है कि व्हाट्सएप और फेसबुक पर वायरल होने वाले झूठे और भड़काऊ संदेशों और समाचारों के कारण पिछले 20 दिनों में देश भर में 27 हत्याएं हो चुकी हैं तो हमें हतप्रभ रह जाना पड़ता है। दरअसल यह खतरे की घंटी है। अभी तक हमने परमाणु और जैविक हथियारों के विषय में सुना है किंतु सोशल मीडिया पर फैलती अफवाहों के कारण फैल रही हिंसा की इन घटनाओं को देखकर यह प्रतीत होता है कि एक नए हथियार का परीक्षण छोटे छोटे जन समूहों पर किया जा रहा है- एक ऐसा हथियार जो किसी समाज को असहिष्णु, हिंसक और बर्बर बनाने की क्षमता रखता है।

इस हथियार का मुकाबला करने की इच्छा शक्ति न तो समाज में दिखती है न सरकार में। आज फेसबुक और ट्विटर का उपयोग सुशिक्षित युवा जनमानस की कंडीशनिंग के लिए हो रहा है जबकि व्हाट्सएप का निशाना अपेक्षाकृत अनगढ़, अल्पशिक्षित या अशिक्षित इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं। हमारे देश में व्यापक और कठोर सायबर कानूनों का अभाव है। किन्तु यदि ऐसे कानून बना भी लिए जाएं तो क्या वर्तमान राजनीतिक ढांचे में इन पर अमल किया जा सकेगा जहां हर राजनीतिक दल की आई टी सेल वैचारिक गुंडागर्दी के लिए प्रशिक्षित, पुरस्कृत और प्रशंसित हो रही है। देश के प्रधानमंत्री स्वयं अपनी लार्जर दैन लाइफ छवि के निर्माण और उसकी रक्षा के लिए सोशल मीडिया की अतिशयोक्तियों पर आश्रित हैं और मुख्य विरोधी दल के नेता प्रधानमंत्री के इस बाजारू फार्मूले की भोंडी नकल करने की कोशिश में लगे हैं। फ़ासिस्ट शक्तियां अपने मनोनुकूल इतिहास की रचना के लिए सोशल मीडिया का जमकर उपयोग कर रही हैं और फासीवाद विरोधी ताकतें सच को हारता देख बौखलाहट में झूठ का आश्रय लेने की गलती कर रही हैं। अभी तक सरकार की कोशिशें फेसबुक और व्हाट्सएप को धमकियां देने तक सीमित हैं। संदेशवाहक पर संदेश प्रदाता की पहचान का उत्तरदायित्व डालकर सरकार कहीं न कहीं स्वयं कार्रवाई करने से बच रही है।

सरकार का यह रुख सोशल मीडिया की रक्षा करने वाली अहस्तक्षेप और आत्मनियंत्रण को प्रोत्साहित करने वाली नीति के रूप में भी परिभाषित किया जा सकता है। लेकिन यह आशंका भी जायज है कि सोशल मीडिया पर फैली अराजकता का सर्वाधिक लाभ भी सत्तारूढ़ दल को मिल रहा है इसलिए सरकार कड़ी कार्रवाई हेतु झिझक रही है। व्हाट्सएप और फेसबुक की विश्व बाजार पर पकड़ और इनके कॉरपोरेट जगत में दबदबे का असर भी कॉर्पोरेट परस्त सरकार की कार्रवाई पर साफ दिखता है वरना अब तक तो इनके मुकाबले के लिए देशभक्ति से ओतप्रोत कोई स्वदेशी सोशल मीडिया प्लेटफार्म अस्तित्व में आ गया होता और इसके उपयोग की वकालत नेता-अभिनेता-खिलाड़ी रेडियो और दूरदर्शन पर कर रहे होते। सोशल मीडिया के दुरुपयोग की यह चुनौती कठिन है, परिस्थितियां गंभीर हैं किंतु झूठ और सनसनी के प्रति हमारे अंदर उपस्थित आकर्षण है कि कम होने का नाम ही नहीं लेता।

(डॉ. राजू पांडेय तमाम विषयों पर अपने गंभीर लेखन के लिए जाने जाते हैं। आप आजकल छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में रहते हैं।)

 










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