देश के किसानों ने दी सत्ता की चौखट पर दस्तक

आंदोलन , , बुधवार , 22-11-2017


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आशुतोष आर्यन

राजधानी दिल्ली में देशभर से 184 संगठनों से जुड़े किसान एक बैनर तले एकट्ठा हुए। वे सूखा, कर्ज माफी, आत्महत्या समेत कई पीड़ादायक मसलों से मुक्ति चाहते हैं। किसानों ने इस मौके पर देश के निजाम के सामने अपनी बातों को पूरी मजबूती के साथ रखा। ये तबका ऐसा है जो पूरे देश का बोझ अपने कंधे पर उठाए खड़ा रहता है लेकिन मौजूदा हालात ये है कि उसका परिवार भूखे मरने को अभिशप्त है। आर्थिक तंगहाली मानो उनके जीवन का हिस्सा बन गयी है। भारत में किसान आत्महत्या का मामला बहुत तेजी से बढ़ रहा है। सरकारी आंकड़े भी चीख-चीख कर यही बता रहे हैं। ऐसा नहीं है कि किसान चुप बैठे हैं। सच्चाई ये है कि वे लगातार देश के विभिन्न हिस्सों में धरना-प्रदर्शन कर रहे थे/कर रहे हैं। लेकिन विडंबना ये है कि उनकी आवाज कहीं नहीं सुनी जा रही है।

सत्ता हमेशा भारत के किसानों की मजबूरी का मजाक उड़ाती रही है और कुछ लोग उनके प्रति संवेदना के दो आंसू बहाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते हैं। उनकी पीड़ा में कुछ समय के लिए छाती पीटकर अपनी जवाबदेही पूरी कर लेते हैं। इस तरह से अपनी पूरी जिम्मेदारी से बच निकलते हैं। लेकिन समय के साथ उनका संकट कम होने की जगह और बढ़ता जा रहा है। उनके खेतों पर अब कारपोरेट की नजर है और सरकार की मदद से वो न केवल पूरा हथियाने के फिराक में है बल्कि वहां ऐसी चीजों के उत्पादन का मंसूबा पाले हुए हैं जिससे पूरे खेत के बंजर हो जाने का खतरा पैदा हो गया है। यह बड़ी साजिश है।

किसानों का प्रदर्शन। 

इसके जरिये कॉरपोरेट जगत उनके खेतों में विदेशी मल्टीनेशनल कंपनियों को लाकर बैठाना चाहता है। किसान बहुत सालों से कर्ज माफी के साथ-साथ अपनी फसलों का उचित मूल्य मांग रहे हैं। दिल्ली में अखिल भारतीय किसान संघर्ष समिति के बैनर तले इकट्ठा किसानों का संसद के सामने प्रदर्शन उसी का हिस्सा है। उनकी पीड़ा सुनने के लिए सरकारें न पहले तैयार थीं और न आज ही हैं। हर बार किसानों की आवाज को अनसुना किया जाता रहा है। लेकिन पहली बार इतनी भारी तादाद में किसान एकजुट हुए हैं। यह किसी भी इंसाफ पसंद व्यक्ति के लिए खुश  होने का मौका है। बावजूद इसके इसके कई दूसरे पक्ष भी हैं। केवल कर्ज माफी और अनाज के उचित मूल्य तक किसानों की पीड़ा और दुख दर्द सीमित नहीं है। किसान खेतों को सींचने के जरिये अपने खून-पसीने-तकलीफ से पूरे देश को सींचने का काम करते हैं। सच्चाई ये है कि खेती के लिए सरकार की तरफ से मिलने वाली ज्यादातर सुविधाएं किसानों तक पहुंच ही नहीं पाती हैं। सब कुछ उनका कुदरत के भरोसे चलता है। कभी बारिश वरदान बन जाती है तो कई मौके ऐसे आते हैं जब उससे बड़ा अभिशाप कोई दूसरा नहीं होता है। ऊपर से अगर बाढ़ आ गई तो फिर घर से लेकर खेत तक की बर्बादी का जो मंजर खड़ा होता है उसका शब्दों में बयान कर पाना भी मुश्किल है। तबाही के उस खौफनाक मंजर को देखकर किसी का भी कलेजा मुंह को आ जाएगा। लेकिन उनके ये सवाल कभी मुद्दे ही नहीं बन पाते। सरकारी शोर के बीच सब कुछ दब जाता है।

राजनीतिक फ्रेम से बाहर निकलकर किसानों की वास्तविक स्थिति को समझने की जरूरत है। पहले भी राजनीतिक दल अपने वोट के लिए किसानों के हितों को बेचते रहे हैं। लेकिन दाम बहुत कम लगाते थे। लेकिन अब पुरानी गलतियों से सीखने का वक्त आ गया है। और किसानी और खेती के संकट को समग्रता में समझना होगा। किसानों की पीड़ा एक बार फिर निहित राजनीतिक स्वार्थों की भेंट न चढ़ जाए। इसका ख्याल रखना होगा। सच ये है कि उन्होंने लगातार अपनी पीड़ा का बयान किया है लेकिन लोग ही उस पर संवेदनशील नहीं हो सके। 

कृषि उपज की कीमत को समग्रता में समझने की जरूरत है। पुरानी गलतियों से सबक लेने और नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ने का वक्त है। उनकी पीड़ा देश की पीड़ा है अगर इस एहसास के साथ चीजें देखी जाएंगी तो समस्या को हल करना बहुत ज्यादा कठिन नहीं है। बीज व कीटनाशक दवाओं के नाम पर बड़े-बड़े विज्ञापन की मदद से पर्यावरण में जहर घोला जा रहा है। उनके जरिये खेत को खोखला बनाया जा रहा है। भारतीय मीडिया की प्राथमिकता में किसानों का स्थान कहीं दूर-दूर तक नहीं है। चंद एक चैनलों और अखबारों को छोड़ दिया जाए तो इस बार भी किसानों का प्रदर्शन मीडिया में अपनी कोई जगह नहीं बना सका। सारा समय पद्मावती और उसके जरिये राजपूतों की आन-बान और शान को ही बचाने में ही गया। क्योंकि उनके लिए पद्मावती पर बहस किसानों की संगठित आवाज से ज्यादा अहम थी। लेकिन लोग शायद भूल जाते हैं कि किसान हैं तो सांस की डोर है। इसलिए किसान व किसानी को बचाना अपने आपको बचाना है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि देश भर में तिल-तिल कर मरने वाले व संसद के सामने 'डेरा डाले’ किसानों की पीड़ा पूरे देश की पीड़ा कब बनेगी?

(आशुतोष आर्यन सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं और आजकल पूर्णिया में रह रहे हैं।)

 






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