अपनी गलती को भी लाभ में बदलना कोई जेटली से सीखे

मुद्दा , , मंगलवार , 14-11-2017


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गरीश मालवीय

गलती से रिमोट पर हाथ लग गया और टीवी पर सुधीर चौधरी जी पूरी रफ्तार से डीएनए प्रोग्राम में ज्ञान बाट रहे थे कि 'जनता के लिए बहुत शुभ खबर है 178 चीजों पर टैक्स कम हो गया है, अरे भाई ! जब टैक्स लगाया गया था तब आपने बोला था कि जनता के लिए अशुभ खबर है ? तब तो आधी रात की आजादी का घण्टा बजाए जा रहे थे। 

परसेप्शन ये बनाया जा रहा है कि सरकार जीएसटी को उपभोक्ताओं के हित में कर दिया है। टैक्स घटा दिया है। बहुत बड़ा सुधार कर दिया है। कोई यह बोलने को तैयार नहीं है कि अब तक आपने इन 178 वस्तुओं को किस आधार पर 28 % जीएसटी के अंतर्गत रखा हुआ था। अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बोल खेल रहे थे क्या ? 

आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि जेटली जी की ये घोषणाएं मूलतः भूल सुधार हैं। ये जीएसटी की गड़बड़ियों का नतीजा है कि अब तक संशोधन के 95 नोटिफिकेशन आ चुके हैं।

अरुण जेटली बड़े ठसके के साथ बोल रहे हैं कि रेस्टोरेंट के मालिक इनपुट टैक्स क्रेडिट का फायदा कस्टमर को नहीं दे रहे थे। इसलिए रेट अब 5% कर दिया जाता है। आपके पास क्या चार महीने में ही ख़ुफ़िया रिपोर्ट आ गयी कि आईटीसी का फायदा कस्टमर को नहीं जा रहा है ? वास्तव में आईटीसी खत्म करने से रेस्तरां संचालकों को भारी नुकसान होगा,  संचालक जब किसी से रेस्तरां के लिए माल खरीदते हैं तो वह खरीदे गए आइटम पर जीएसटी अदा करते हैं। ये टैक्स अलग-अलग आइटम्स पर अलग-अलग होता है। किसी आइटम पर 5 पर्सेंट होता है तो किसी पर 12 से 18 पर्सेंट होता है। इस टैक्स का बेनिफिट संचालक को तब मिलता है, जब वो ग्राहकों से लिए गए 18 पर्सेंट जीएसटी को सरकार को भरते हैं। इसमें संचालक का प्रॉफिट भी शामिल होता है, लेकिन अब उसे यह सारी कवायद मुफ्त में करनी होगी, और उसे सामान महंगा मिलेगा वो अलग, नतीजा यह होगा कि रेस्तरां मालिक अपना सारा नुकसान ग्राहक से वसूलेगा।

एक बात और समझिए आप कहते हैं कि आपने टैक्स कम कर दिया !  जिन दुकानदारों ने 28 फीसदी जीएसटी का भुगतान कर सामान खरीदा है। अब वह एक बार फिर घाटा उठाएगा ? जब दुकानदार 28 फीसदी टैक्स देकर सामान लाए हैं तो कैसे उसको 18 फीसदी पर दे सकते हैं ? 

इन सारी दुश्वारियों से घबराकर व्यापारी एक बार तो यह जरूर सोचेगा कि जिसने अभी तक जीएसटी नम्बर नहीं लिया है वही सुखी है, 

सरकार को यदि सुधार करना ही था तो उसे प्रक्रिया गत व्यवस्थाओं में सुधार करना चाहिए था ओर व्यापारी वर्ग वास्तव में उसी की मांग कर रहा था।

(गिरीश मालवीय आर्थिक मामलों के जानकार हैं और आजकल इंदौर में रहते हैं।)






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