गुजरात चुनाव का साम्प्रदायीकरण और संसदीय प्रणाली का संकट

गुजरात की जंग , , मंगलवार , 12-12-2017


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प्रवीण मल्होत्रा

प्रधानमंत्री को मणिशंकर अय्यर के घर पर पाकिस्तानी षड्यंत्र और कथित तख्ता पलट की पल-पल की जानकारी है, लेकिन डोकलाम में 1800 चीनी सैनिकों की घुसपैठ और निर्माण कार्यों की कोई जानकारी नहीं है। क्या गुजरात विधानसभा के चुनाव देश की सीमाओं की सुरक्षा से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं कि प्रधानमंत्री ने राजधर्म का पालन करना छोड़कर अपनी सारी ऊर्जा गुजरात में पुनः सरकार बनाने में झोंक दी है ! 

एक राज्य विधानसभा के चुनाव में प्रधानमंत्री ने अपना सर्वस्व झोंक दिया है। उन्होंने न सिर्फ खुल कर साम्प्रदायिक कार्ड खेला है, बल्कि पड़ोसी राष्ट्र को भी एक राज्य के विधानसभा चुनाव में घसीट लिया है। प्रधानमंत्री ने बनासकांठा की जनसभा में कथित रूप से यह रहस्योद्घाटन किया था कि मणिशंकर अय्यर के घर पर पाकिस्तान की सहायता से अहमद पटेल को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाने की साजिश रची गई थी। प्रधानमंत्री ने जनसभा में एक अत्यंत गम्भीर किन्तु पूरी तरह से काल्पनिक घोषणा की थी कि पाकिस्तान गुजरात के चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने एक आधारहीन बात यह भी कही थी कि पाकिस्तान गुजरात में अहमद पटेल को मुख्यमंत्री बनाने का प्रयास कर रहा है। जबकि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्य सभा सदस्य अहमद पटेल स्वयं कह चुके हैं कि वे मुख्यमंत्री पद के दावेदार नहीं हैं। प्रधानमंत्री की इस घोषणा का पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने तुरन्त खण्डन करते हुए भारत सरकार को नसीहत दे डाली कि वे अपने आंतरिक मामलों में पाकिस्तान को बेवजह न घसीटें। प्रधानमंत्री की पार्टी के ही एक अन्य वाचाल नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी ने, स्वामी न सिर्फ अपनी उच्छश्रृंखलता के लिये कुख्यात हैं, बल्कि अत्यंत अविश्वसनीय भी हैं, तो यहां तक कह दिया कि मणिशंकर अय्यर के घर पर सरकार का तख्तापलट करने की साजिश रची गई थी। मानो भारत एक लोकतान्त्रिक देश न होकर सैनिक तानाशाही वाला राष्ट्र है! 

यह अलग विषय है कि क्या अहमद पटेल को मुख्यमंत्री बनने से रोकने के लिये कोई संवैधानिक प्रावधान है? क्या अहमद पटेल भारत के नागरिक नहीं हैं? क्या भारत के संविधान में कहीं यह लिखा हुआ है कि एक अल्पसंख्यक किसी राज्य का मुख्यमंत्री नहीं बन सकता है? जबकि कश्मीर में मुस्लिम महबूबा मुफ्ती के साथ स्वयं प्रधानमंत्री की पार्टी ही सरकार में भागीदार है। पंजाब में तो हमेशा ही अल्पसंख्यक सिख मुख्यमंत्री बनते रहे हैं। आज भी वहां सिख कैप्टन अमरिंदर सिंह मुख्यमंत्री हैं। जब डॉ. जाकिर हुसैन, फकरुद्दीन अली अहमद, एपीजे अब्दुल कलाम और सरदार जैल सिंह भारत के राष्ट्रपति बन सकते हैं, अल्पसंख्यक सिख डॉ. मनमोहन सिंह दस वर्ष तक भारत के प्रधानमंत्री रह सकते हैं, अन्य विद्वान मुस्लिम और अल्पसंख्यक व्यक्ति उपराष्ट्रपति, राज्यपाल, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एवं अन्य न्यायाधीश, विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री तथा मुख्य निर्वाचन आयुक्त बन सकते हैं तो एक अल्पसंख्यक मुस्लिम कश्मीर के अतिरिक्त किसी अन्य राज्य का मुख्यमंत्री क्यों नहीं बन सकता है? क्या सिर्फ इसलिये कि वह मुस्लिम है और उस राज्य को आपने पिछले डेढ़ दशक से साम्प्रदायिकता की प्रयोगशाला बना रखा है? क्या देश के प्रधानमंत्री को यह शोभा देता है कि वह इस तरह के साम्प्रदायिक शगूफे छोड़ कर चुनाव जीतने की हसरत रखे ? 

बहरहाल, प्रधानमन्त्री की इस आधारहीन घोषणा का न सिर्फ पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने खण्डन किया है बल्कि पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह, पूर्व भारतीय राजनयिक चिन्मय गरेखान, पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल प्रदीप कपूर तथा वरिष्ठ पत्रकार प्रेम शंकर झा ने भी प्रधानमंत्री के इस रहस्योद्घाटन का खंडन कर दिया है। उन्होंने जो कहा है उसका सार यह है कि उस दिन मणिशंकर अय्यर के निवास पर आयोजित डिनर में कई गणमान्य वरिष्ठ नेता, पूर्व प्रधानमंत्री, पूर्व उपराष्ट्रपति, पूर्व मंत्री, पूर्व राजनयिक तथा पूर्व सेनाध्यक्ष शामिल हुए थे। वहां भारत-पाक सम्बन्धों में सुधार के बारे में चर्चा अवश्य हुई थी, किन्तु गुजरात चुनाव पर कोई चर्चा नहीं हुई थी। अहमद पटेल का तो उल्लेख भी नहीं आया था। क्या देश के गणमान्य नागरिकों को भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव घटाने के सम्बन्ध में अनौपचारिक चर्चा भी नहीं करना चाहिये? क्या इसके लिये भी उन्हें सरकार से अनुमति लेना पड़ेगी? क्या किसी व्यक्ति को अपने निवास पर निजी डिनर पार्टी आयोजित करने के लिये भी सरकार की अनुमति लेना आवश्यक है? क्या वे सब गणमान्य नागरिक भी देशद्रोही हैं जो पाकिस्तान के साथ तनाव को समाप्त करना चाहते हैं, और सिर्फ एक पार्टी तथा एक विचारधारा विशेष के लोग ही देशभक्त हैं?

यक्ष प्रश्न यह है कि क्या प्रधानमंत्री पद की मर्यादा उन्हें इस बात की इजाजत देती है कि वे बिना किसी आधार के एक ऐसी डिनर पार्टी को सरकार के विरुद्ध साजिश करार दें जिसमें देश के 70 से अधिक गणमान्य नागरिक शामिल थे! यह डिनर मीटिंग पाकिस्तान के पूर्व विदेशमंत्री कसूरी के सम्मान में आयोजित की गयी थी, जो कि भारतीय वीसा पर "अनंत" नाम के थिंक टैंक के निमंत्रण पर भारत- पाक सम्बन्धों पर भाषण देने के लिये भारत आये थे। क्या भारत सरकार को पड़ोसी देश के पूर्व विदेशमंत्री की इस भारत यात्रा की जानकारी नहीं थी? यदि सचमुच जानकारी नहीं थी तो यह भारतीय इंटेलिजेंस की सम्पूर्ण असफलता है। 

अय्यर दम्पत्ति की मेजबानी में आयोजित इस डिनर मीटिंग में कसूरी के अलावा भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह, पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल दीपक कपूर, पूर्व विदेश मंत्री डॉ. नटवर सिंह, पूर्व राजनयिक टीसीए राघवन, शरत सभरवाल, के.शंकर वाजपेयी, सलमान हैदर, वरिष्ठ पत्रकार प्रेम शंकर झा आदि शामिल हुए थे। क्या प्रधानमंत्री को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत ढोबाल, आईबी या किसी अन्य इंटेलिजेंस एजेंसी ने सूचना दी थी की मणिशंकर अय्यर के निवास पर अहमद पटेल को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाने का षड्यंत्र रचा गया है? यदि ऐसी कोई सूचना नहीं थी तो क्या प्रधानमंत्री जैसे सर्वोच्च संवैधानिक कार्यपालिक पद बैठे व्यक्ति को यह शोभा देता है कि वे इतने प्रतिष्ठित और गणमान्य व्यक्तियों पर देश के विरुद्ध किसी साजिश के इतने आधारहीन आरोप लगायें? और यदि उनके पास किसी षड्यंत्र की पुख्ता जानकारी थी तो क्या बनासकांठा जैसे छोटे से शहर की किसी आमसभा में इतने गहरे षड्यंत्र का रहस्योद्घाटन किया जाये ? इस षड्यंत्र या साजिश पर तो प्रधानमंत्री को कैबिनेट और सुरक्षा मामलों की सर्वोच्च समिति की तुरन्त बैठक बुलानी चाहिये थी और साजिशकर्ता व्यक्तियों पर, अतीत में चाहे वे कितने ही वरिष्ठ पदों पर क्यों न रहे हों, कठोर कार्रवाई करना चाहिये थी। राष्ट्रीय सुरक्षा से सम्बंधित इतने महत्व के मामले को एक चुनावी जनसभा में प्रकट करने का कोई औचित्य नहीं था।

प्रधानमंत्री के इस कथित रहस्योद्घाटन ने अत्यंत शालीन और अल्प भाषी पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को बहुत आहत और व्यथित कर दिया है। उन्होंने तीन पेज का एक प्रेस नोट जारी कर प्रधानमंत्री से कुछ सवालों का जवाब मांगा है। डॉ. मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री से पूछा है कि वे बिना निमंत्रण और बिना आधिकारिक यात्रा के पाकिस्तान क्यों गये थे? यह उल्लेखनीय है कि लाहौर में भारत के प्रधानमंत्री को "गार्ड ऑफ़ ऑनर" नहीं दिया गया था, क्योंकि उनकी यात्रा प्रधानमंत्री की आधिकारिक यात्रा नहीं थी। डॉ. सिंह ने प्रधानमंत्री से यह भी जानना चाहा है कि उन्होंने पठानकोट की आतंकवादी घटना के बाद पाकिस्तान की आईएसआई को पठानकोट एयर बेस का दौरा करने की इजाजत क्यों दी थी? प्रधानमंत्री से इन सवालों के जवाब की अपेक्षा करना व्यर्थ ही है, क्योंकि किसी को जवाब देकर सन्तुष्ट करना उनका स्वभाव ही नहीं है। इसीलिये उन्होंने प्रधानमंत्री बनने के बाद से आज तक एक भी प्रेस कांफ्रेंस नहीं की है, ताकि उन्हें असहज सवालों का जवाब ही न देना पड़े। लेकिन गुजरात चुनाव के बाद संसद के शीतकालीन सत्र में यह मामला जोर-शोर से उठने वाला है। हमेशा की तरह प्रधानमंत्री और सत्ता पक्ष की ओर से कोई संतोषजनक जवाब नहीं आयेगा और विपक्ष द्वारा सदन की कार्रवाई में अवरोध पैदा किया जायेगा। हमारी लोकतान्त्रिक संसदीय प्रणाली की यही नियति है।

गुजरात चुनाव का 18 दिसम्बर को चाहे जो परिणाम आये, इस चुनाव अभियान ने हमारी संसदीय लोकतान्त्रिक प्रणाली को सुदृढ़ नहीं बल्कि कमजोर और अंदर से खोखला ही किया है, और इसके लिये प्रधानमंत्री और भारतीय जनता पार्टी ही पूरी तरह से दोषी हैं।

(प्रवीण मल्होत्रा सेवानिवृत्त विक्रय कर उपायुक्त हैं।)






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