इंदिरा ने प्रिवी पर्स खत्म किया, मोदी ने खोला पूंजीपतियों के लिए खजाना

माहेश्वरी का मत , , मंगलवार , 21-11-2017


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अरुण माहेश्वरी

19 नवंबर से इंदिरा गांधी का जन्म शताब्दी वर्ष शुरू हो गया है। अपने लगभग पंद्रह साल के प्रधानमंत्रित्व (1966-1977 ; 1980-1984) के दौरान शुरू से ही उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा । शुरू में कांग्रेस दल के अंदर के सिंडिकेट धड़े के दबाव आए। इंदिरा ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण और राजाओं के प्रिवी पर्स को ख़त्म करके व्यापक जन समर्थन के बल पर उन्हें पूरी तरह निरस्त कर दिया ।

फिर बांग्लादेश के मुक्ति युद्ध के समय मुक्ति योद्धाओं को सैनिक सहायता देकर और सीधे भारतीय सेना को उतार कर उन्होंने धर्म पर आधारित राष्ट्र की थिसिस को खारिज कर दिया । इसमें भी जनता का उन्हें भरपूर समर्थन मिला ।

इस प्रकार अपने प्रारंभिक उठान के दौर में ही इंदिरा गांधी ने व्यापक जन-समर्थन से बड़े-बड़े कदम उठाए । लेकिन इसी दौर में उनकी छवि को जीवन से इतना बड़ा बना दिया गया जिसके चलते उनमें एक तानाशाह की प्रवृत्ति पैदा हुई और 1975 में उन्होंने आंतरिक आपातकाल के जरिये सारी सत्ता को अपने हाथ में ले लिया । 1977 में वे बुरी तरह पराजित हुईं ।

लेकिन इसके साथ ही फिर इंदिरा ने जनता की ओर रुख़ किया । जनता पार्टी की सरकार अपने अन्तर्विरोधों के कारण ढाई साल में ही गिर गई और 1980 में फिर इंदिरा गांधी सत्ता में आ गईं ।

1980 में सत्ता में आने के बाद ही उनके लिये बड़ी चुनौती पैदा हुई पंजाब में सिख आतंकवाद की । इंदिरा ने ऑपरेशन ब्लू स्टार (जून 1984) के जरिये अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में सेना भेज कर उसे जड़ से उखाड़ दिया, लेकिन इसकी उन्हें बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ी । चार महीने बाद ही 31 अक्तूबर 1984 के दिन उनके दो सिख सुरक्षाकर्मियों ने उनकी हत्या कर दी ।

गौर करने की बात है कि इंदिरा गांधी ने पूरे राजनीतिक जीवन में बार-बार जनता के बीच से अपने लिये शक्ति हासिल की और बड़े से बड़े फैसले के वक्त भी कभी अस्थिरता और अनिर्णय का परिचय नहीं दिया । 1971 में पाकिस्तान को बुरी तरह से पराजित करने के बाद भी इंदिरा गांधी में कोई अति-उत्साह नहीं देखा गया और न ही इसके पहले बैंकों के राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स की समाप्ति के वक्त उन्होंने कोई उछल-कूद की । आपरेशन ब्लू स्टार का निर्णय लेते समय भी वे पूरी तरह से धीर-स्थिर बनी रहीं।

इंदिरा गांधी की तुलना में जब हम आज के प्रधानमंत्री मोदी को रखते हैं, मोदी के चरित्र का उथलापन, उसकी अगंभीरता और विवेकशून्यता जैसे निपट नंगे रूप में हमारे सामने दिखाई देने लगते हैं । मोदी हमेशा जनता से युद्ध की मुद्रा में रहते हैं, आम लोगों को सता कर ख़ुश होते हैं । इन्होंने सामान्य लोगों को चोर बताते हुए उन्हें दंडित करने के लिये नोटबंदी और विकृत जीएसटी की तरह के कदम उठाए । इसी प्रकार, इंदिरा के विपरीत, चंद बड़े लोगों के लिये मोदी सरकार के ख़ज़ाने की झोली खोल कर खड़े दिखाई देते हैं । मोदी बोलते ज्यादा और काम कम करते हैं । अमेरिका सहित विदेशी राष्ट्राध्यक्षों को गले लगाने की इनकी आतुरता आँखों को और भी चुभने वाली होती है ।

मोदी सिर्फ साढ़े तीन साल के शासन के बाद ही हांफने लगे हैं । आज स्थिति इतनी बदतर है कि 2019 के पहले ही उन्हें गद्दी छोड़ कर राजनीति के किसी उपेक्षित कोने में दुबक कर बैठना पड़ सकता है । इसीलिये वे अमेरिकी प्राइवेट एजेंसियों से अपने और अपनी सरकार के लिये प्रमाण पत्र जुटाते हैं । वास्तविकता यह है कि जनता के बीच मोदी की कोई साख नहीं बची है और काला धन आदि के विरुद्ध इनकी सारी बातें लोगों को कोरी चकमेबाजी लगने लगी है ।

इंदिरा ने सिख आतंकवाद पर निर्णायक प्रहार किया और मोदी हिंदू आतंकवादी ताकतों को बढ़ावा दे रहे हैं।

(अरुण माहेश्वरी वरिष्ठ लेखक और स्तंभकार हैं और आजकल कोलकाता में रहते हैं।)

 






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