डिप्लोमेसी का संतुलन संभालिए लेकिन सोच-समझकर

देश-दुनिया , , बृहस्पतिवार , 17-05-2018


israel-palestine-attack-usa-india-modi-deaths

अल्पयु सिंह

"सत्तर साल में ऐसा पहली बार हुआ है कि कोई प्रधानमंत्री इजरायल गया हो। ऐसा क्या था जो हमें इजरायल जाने से रोक रहा था। तब मैंने तय किया कि 

मैं तो सीधा वहां जाऊंगा और गया। इसके बाद फिलीस्तीन जाना था तो वहां भी गया।"

पिछले दिनों प्रधानमंत्री ने लंदन में एक इंटरव्यू के दौरान मिडिल ईस्ट पॉलिसी को लेकर खुद की पीठ ऐसे ठोंकी थी। ये बात सही है कि पिछले एक अर्से से भारत नई चुनौतियों, नए हालातों में विदेश नीति को 'रिएडजस्ट' करने की कोशिश कर रहा है। खासकर इजरायल और फिलीस्तीन को लेकर ये 'रिएडजस्टमेंट' कूटनीतिक बैलेंस से जोड़ा जा रहा है।

लेकिन हाल के कदमों को देखकर लगता है कि डिप्लोमेसी के जिस तराजू में फिलीस्तीन और इज़रायल दोनों को रखा जा रहा है, उसका एक पलड़ा  इजराइली पक्ष की ओर बार-बार झुकता दिख रहा है।

ताज़ा मसला इजराइली हमले पर विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया से जुड़ा है। सोमवार को हुई इजराइली कार्रवाई में साठ फिलीस्तीनियों की मौत पर 

विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा है कि "भारत इजरायल और गाजा पट्टी बॉर्डर पर बढ़ते तनाव को लेकर गहन रूप  से  चिंतित है। इन तनावपूर्ण हालातों में 50 फिलीस्तीनियों की मौत पर हमें गहरा दुख है। हमारा सभी पक्षों से अनुरोध है कि वो पहले से ही तनावपूर्ण स्थिति को और गंभीर ना बनाने के लिए प्रयत्न करें।"

भारतीय विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया की भाषा पर ध्यान दें तो लगता है जैसे कि कूटनीतिक बैलेंस बनाने के चक्कर में निष्पक्ष सहज प्रतिक्रया कहीं दब गई।  अंतर्राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट बताती हैं कि इन हमलों का शिकार छोटे बच्चों से लेकर शारीरिक रूप से अक्षम लोग भी हुए हैं। अब सोचने वाली बात ये है कि जिन लोगों के जान गंवाने पर हम गहरा दुख जता रहे हैं, उन्होंने दोतरफा झड़पों में नहीं, बल्कि इजराइल की एकतरफा कार्रवाई में जान गंवाई है। तो फिर कार्रवाई की आलोचना को लेकर होंठ क्यों सिलने ?

अब भारतीय प्रतिक्रिया जहां कूटनीतिक बैलेंस से बोझिल है तो दुनिया के कई बड़े देशों ने साफ-साफ शब्दों में इजराइल की इस कार्रवाई की कड़ी आलोचना की है। ना सिर्फ चीन और रशिया, बल्कि  ब्रिटेन और फ्रांस जैसे पश्चिमी देशों की भाषा और शब्दावली भारत से कहीं ज्यादा साफ़ और सहज और तीखी लगती है।

दरअसल कूटनीति की भाषा का शिफ्ट इस साल फरवरी में भी दिखा था।। जब प्रधानमंत्री मोदी फिलीस्तीन के दौरे पर थे। दौरे से पहले फिलीस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने जैसे मोदी के लिए पलक पांवड़े बिछा दिए थे। दौरे से ठीक पहले अब्बास ने कहा था कि "फिलीस्तीन भारत की ओर अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर मिले सहयोग को कभी भुला नहीं सकता। भारत ने हमेशा ही हमारा साथ 

दिया है।"

लेकिन इसी दौरे में बदली शब्दावली का पहला नज़ारा मिला। प्रधानमंत्री ने  'स्वतंत्र' और 'संप्रभु 'फिलीस्तीन का तो जिक्र किया लेकिन 'अखंड' शब्द अपने बयान से हटा लिया। हैरानी इस बात को लेकर थी कि पिछले कई सालों से 

भारतीय विदेश नीति की भाषा में फिलीस्तीन के लिए स्वतंत्र, संप्रभु, अखंड शब्द का ही इस्तेमाल किया जा रहा था। 2015 में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और 2012 में मनमोहन सिंह के बयान में भी यही शब्दावली थी। खुद पीएम मोदी ने भी मई 2017 में अब्बास के भारत दौरे के दौरान 'अखंड' फिलीस्तीन 'टर्म 'का इस्तेमाल किया था। लेकिन इस बड़े बदलाव को एक तरह से नेतनयाहू सरकार की कूटनीतिक जीत की तरह देखा गया। जो सही भी हो सकता है क्योंकि मोदी के कार्यकाल में इजरायल और भारत संबंधों का स्वर्णकाल माना जा रहा है। दोनों नेताओं की केमिस्ट्री कमाल की है। और इसे पीएम को डी-हाइफनेशन नीति का अहम हिस्सा भी माना गया।

हालांकि ये अलग बात है कि बीच-बीच में अपने दो फैसलों के जरिए मोदी सरकार ने दिखाने की कोशिश की कि विदेश नीति के पुराने समीकरणों को वो पूरी तरह भूली नहीं है। जेरुसलम  पर अमेरिका के प्रस्ताव पर भारत का विरोध और इस साल मिडिल ईस्ट दौरे में इजरायल ना जाने का फैसले का संदेश कुछ- कुछ इसी बैलेंस को पकड़े रहने जैसा था। 

लेकिन विदेश नीति और कूटनीति की संकरी गली में एक दो बार नहीं बल्कि हर बार इसी संतुलन को साधना होगा। फिलीस्तीन के संबंध में खासतौर से इसलिए भी क्योंकि फिलीस्तीन को सिर्फ इज़रायल के साथ संबंधों वाला

चश्मा पहनकर देखना सही नहीं होगा।  फिलीस्तीन संघर्ष का मसला तीसरी दुनिया की प्रगतिवादी एकजुटता की नस को आज भी  पकड़ता है। हालांकि इस नस की धड़कन अब मंद जरूर  है।

वहीं फिलीस्तीन से जुड़े मसलों पर भारत के पॉलिसी शिफ्ट का इस्तेमाल पाकिस्तान अरब वर्ल्ड के सामने हमें मुस्लिम विरोधी दिखाने के लिए कर सकता है। इसलिए इस बात को समझना होगा कि विदेश नीति के नए पड़ावों से गुजरते वक्त बीते  सफर के अनुभव भी ज़हन में रखे जाना बेहद जरूरी है, क्योंकि वो आगे के सफर में मददगार  ही साबित होंगे।

(अल्पयु सिंह पेशे से पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहती हैं।)




Tagisrael palestine attack india modi

Leave your comment