मौजूदा दौर में आम अवाम के लिए जलियांवाला बाग का सबक

स्मरण , , शनिवार , 13-04-2019


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रविंद सिंह पटवाल

जलियांवाला बाग काण्ड आज से ठीक 100 साल पहले आज ही के दिन घटित हुआ था। पूरा देश चुनाव में व्यस्त है, लेकिन पंजाब सरकार ने इस बार विपक्ष के साथ मिलकर इस दिन को ख़ास बनाने और ब्रिटिश सरकार से इस घटना के लिए माफ़ी मांगने का प्रस्ताव विधान सभा में पास कराया है।

करीब 12000 गांवों की मिट्टी जलियांवाला बाग़ में मंगाई जा रही है।

ब्रिगेडियर डायर की क्रूरता इतिहास की पाठ्य पुस्तकों में बचपन में पढ़ी थी, और उस बाग़ के दर्शन भी किये और उस खूनी कुएं को भी देखा जा सकता है। 10 फुट ऊंची वे दीवारें जिसे पार कर बच निकलने का कोई जरिया नहीं था उस दिन 20000 की संख्या में जमा भीड़ के पास। एकमात्र दरवाजा जिससे जाया जा सकता था वहां डायर के गोरखा और बलूच सशस्त्र सिपाहियों की बंदूकें थीं।

तब के सरकारी आंकड़ों के हिसाब से 370 लोग मारे गए, लेकिन राष्ट्रीय कांग्रेस ने यह संख्या 1000 से अधिक और 1500 लोगों को घायल बताया।

जलियांवाला बाग़ हत्याकाण्ड क्यों हुआ?

यह किसी डायर के पागलपन का ही कारण नहीं था। 1919 की सामाजिक राजनैतिक पृष्ठभूमि इसके लिए जिम्मेदार थी। महात्मा गांधी पंजाब तब तक एक बार भी नहीं गए थे, और उन्होंने अपनी पहली पंजाब यात्रा का फैसला लिया था। यह वह समय था जब देश में रौलेट एक्ट लागू किया गया था, जिसमें मानवाधिकारों को काफी हद तक कुचलने का कानून ब्रिटिश सरकार ने पास किया था। देश भर में 6 अप्रैल 1919 को हड़ताल का आह्वान किया गया था, और बम्बई चौपाटी में खुद महात्मा गांधी के साथ 1.50 लाख लोगों का हुजूम जिसमें हिन्दू-मुस्लिम सभी भारी मात्रा में शामिल हुए।

एक उर्दू साप्ताहिक के अनुसार रौलेट एक्ट के खिलाफ देश भर में जबर्दस्त आक्रोश ने "हिन्दू और मुस्लिम समुदाय को आपस में ऐसे मिला दिया जैसे पानी में चीनी घुलती है।"

गांधी जी ने पंजाब जाने के लिए दिल्ली की ट्रेन पकड़ी लेकिन पंजाब में भारी अशांति की आशंका को देखते हुए गांधी जी को दिल्ली और पंजाब में आने पर रोक लगा दी। इस बीच 6 अप्रैल की देशव्यापी हड़ताल से 3 दिन बाद रामनवमी का त्यौहार था। पंजाब में हिन्दुओं के इस त्यौहार में भारी संख्या में मुस्लिमों की शिरकत हुई और "महात्मा गांधी की जय" के साथ "हिन्दू-मुसलमान की जय" के नारे जोर शोर से लगाए गए।

अमृतसर में शाम तक कांग्रेस के दो नेताओं सत्यपाल और डॉक्टर सैफुद्दीन किचलू को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। इस बीच 10 अप्रैल तक गांधी जी की गिरफ्तारी की सूचना ने अमृतसर में आग में घी का काम किया, भारी संख्या में हिंसा हुई और ब्रिटिश बैंक जलाने से लेकर बैंक अधिकारियों की जान गई। 11 अप्रैल को भी हिंसा की वारदात नहीं रुकी तो शहर में मार्शल लॉ लगा दिया गया और कलेक्टर ने शहर का चार्ज ब्रिगेडियर जनरल रेगिनल्ड डायर के हाथ सौंप दिया, जो गोरखा और पठान रेजिमेंट के साथ शहर में आ गया।

मार्शल ला के दौरान शहर में भीषण अत्याचार शुरू हुए। घरों में बिजली और पानी की सप्लाई बंद कर दी गई। मंदिर और मस्जिद में इकट्ठा होने पर रोक लगा दी गई। डाक सेवा ठप हो गई। इन्तहा तो तब हो गई जब हर भारतीय को बाहर घुटनों के बल चलने का आदेश हुआ, क्योंकि इस हिंसा में एक ईसाई मिशनरी महिला की मौत हुई थी।

लेकिन विरोध के स्वर दबे नहीं और सिखों के नव वर्ष बैशाखी के दिन 13 अप्रैल को तय हुआ कि स्वर्ण मंदिर के नजदीक जलियांवाला बाग़ में इकट्ठा होकर दोपहर में सभा होगी। जनरल डायर ने इस सभा के खिलाफ शहर में घोषणा करवाई लेकिन जब उसे सूचना मिली कि आज्ञा का उल्लंघन कर भीड़ जलियांवालाबाग में इकट्ठा हो रही है तो गुस्से में अपने 50 गोरखा और बलूच सशस्त्र टुकड़ी को 2 हथियारबंद गाड़ी के साथ वह सभा स्थल की ओर कूच कर दिया।

इस घटना का असर सिर्फ पंजाब में ही नहीं हुआ, बल्कि पूरे देश में विरोध की एक लहर सी उठ खड़ी हुई। 2014 के अंत तक जिस तरह देश में लेखकों और साहित्यकारों ने खुद को मिले सम्मान को सरकार को वापस करने का सिलसिला शुरू किया उसकी शुरुआत दरअसल रविंद्र नाथ टैगोर के 1919 में इस नृशंस हत्याकाण्ड के खिलाफ 100 साल पहले खुद को ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा प्राप्त नाईटहुड की उपाधि लौटा कर शुरू हुई।

गवर्नर जनरल को अपने पत्र में टैगोर लिखते हैं, "समय आ गया है जब सम्मान का तमगा जो गले में लटका है, वह सामूहिक अपमान के समक्ष बेहद घृणित जान पड़ता है। इस घड़ी में जब मेरे देशवासी तुच्छता के अहसास और अमानवीय अपमान को सहने को अभिशप्त हैं, मैं शासन से मिले इस विशेषाधिकार का त्याग करता हूं।"

बख्तरबंद गाड़ियां पुराने शहर की तंग गलियों से प्रवेश नहीं कर पाईं इसलिए डायर और सिपाही पैदल ही आगे बढ़ गए। अपने सैनिकों को तैनात करने के बाद, जनरल ने एक बार बाड़े में उसका सामना कर रही भीड़ पर गोलियां चलाने का आदेश दिया। घबराहट में भीड़ तितर-बितर हो गई, पार्क के एकमात्र प्रवेश द्वार अब सैनिकों द्वारा अवरुद्ध था। डायर ने शूटिंग जारी रखने के लिए अपने आदमियों को आदेश दिया। कुल 1,650 राउंड फायर किए गए। इस नरसंहार में लगभग चार सौ लोग मारे गए।

मार्शल लॉ के तहत, पंजाब में प्रेस और डाक पर सख्त सेंसरशिप लागू थी। जलियांवाला बाग की घटना के तथ्य काफी हद तक बाहरी दुनिया के लिए अज्ञात थे। लेकिन अफवाहें और जवाबी अफवाहें जारी थीं।

इस नरसंहार में 370 से अधिक लोगों की मौत हुई थी, जिनमें छोटे बच्चे और महिलाएं भी शामिल थीं। इस नरसंहार में सात हफ्ते के एक बच्चे की भी हत्या कर दी गई थी। इसके अलावा इस बाग में मौजूद कुएं से 100 से अधिक शव निकाले गए थे। ये शव ज्यादातर बच्चों और महिलाओं के ही थे। कहा जाता है कि लोग गोलियों से बचने के लिए कुएं में कूद गए थे, लेकिन फिर भी वो अपनी जान नहीं बचा पाए। वहीं कांग्रेस पार्टी के मुताबिक इस हादसे में करीब 1000 लोगों की हत्या हुई थी और 1500 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। लेकिन ब्रिटिश सरकार ने केवल 370 के करीब लोगों की मौत होने की पुष्टि की थी। ताकि उनके देश की छवि विश्व भर में खराब ना हो सके।

आज इस मौके पर देश भर और पंजाब सरकार द्वारा प्रस्तावित मांग और ब्रिटेन में बड़ी संख्या में मौजूद सिख प्रवासी भारतियों के कारण ब्रिटेन की प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने इस वीभत्स घटना के लिए दुःख जताया है, लेकिन अभी भी जिस तरह से ब्रिटेन को औपनिवेशिक काल में अपनी काली करतूतों के लिए एक राष्ट्र के रूप में भारतीय जनता से सार्वजनिक माफ़ी मांगनी चाहिए वह नहीं प्रदर्शित होता है।

इस 100 साल की लिगेसी में कुछ बिंदु प्रमुखता से उभर कर सामने आते हैं, जो बेहद समीचीन हैं:-

1. जालियांवाला बाग़ की घटना कोई अनायास घटना नहीं थी, बल्कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद पहली बार ब्रिटिश हुकूमत को एक फिर यह गहराई से आभास होने लगा था कि भारत की आम अवाम फिर से अपने हक़ और आजादी की चाहत में कहीं न कहीं बेलगाम हो सकती है।

2. हिन्दू, सिख और मुस्लिम एकता का जो नजारा अमृतसर में रामनवमी के समय दिखा, और जिस भारी संख्या में तमाम विभिन्न धर्मों की एकता प्रदर्शित हुई, वह हुकूमत को लम्बे समय तक चला पाने के लिए खतरनाक साबित होने वाली थी।

3. गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी के अलावा देश के विभिन्न हिस्सों खासकर बंगाल और पंजाब में क्रन्तिकारी दलों का उदय बड़ी तेजी से जोर पकड़ रहा था। 1905 के बंगाल विभाजन ने जहां बंगाल में इस प्रक्रिया को तेज किया वहीं पंजाब में अप्रवासी सिख समुदाय ने 1914 की कोमागाटा मारु काण्ड के कारण हजारों की संख्या में लाला हरदयाल के नेतृत्व में अमेरिका, मैक्सिको जापान सिंगापुर जैसे देशों से भारत की ओर प्रस्थान ने इन दो क्षेत्रों में ब्रिटिश राज की रातों की नींद उड़ा दी थी।

4. और सबसे प्रमुख था, इस प्रभाव को रोकने के लिए ब्रिटिश हुकूमत द्वारा खुद के लिए अलग और भारतीय जनता के लिए बनाये गए नए नए नियम,जिसके तहत मार्च 1919 रौलेट एक्ट (The Anarchical and Revolutionary Crime Act, 1919) में भारत की ब्रितानी सरकार द्वारा भारत में उभर रहे राष्ट्रीय आंदोलन को कुचलने के उद्देश्य से निर्मित कानून था। यह कानून सर सिडनी रौलेट की अध्यक्षता वाली सेडिशन समिति की सिफारिशों के आधार पर बनाया गया था। इसके अनुसार ब्रितानी सरकार को यह अधिकार प्राप्त हो गया था कि वह किसी भी भारतीय पर अदालत में बिना मुकदमा चलाए उसे जेल में बंद कर सकेगी।

आज जब हम 100 साल होने पर इसे याद कर रहे हैं तो आजाद भारत के पिछले 70 सालों से आज के सफर में हम पाते हैं कि एक विदेशी औपनिवेशिक शासन को बनाये रखने के लिए अंग्रेजों ने जिन काले कानूनों का सहारा लेकर भारत की जनता की आशाओं आकांक्षाओं को कुचलने का काम लिया था, उनमें से अधिकतर काले कानूनों को भारतीय दण्ड संहिता में जस का तस रख लिया गया।

आज वे काले कानून ही जो आजादी के पहले 40 सालों में यदा-कदा ही इस्तेमाल हुए आज पिछले 20 वर्षों में अधिकाधिक इस्तेमाल में लाये जा रहे हैं। धारा 124 जिसे अंग्रेजों ने अपने खिलाफ भाषण देने, भीड़ को उकसाने और हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाने को देशद्रोह की श्रेणी में रखा, उसे ही आजाद भारत ने IPC की धारा में जस का तस रख दिया, जिसका इस्तेमाल वर्तमान की सरकारें बढ़ते जनविक्षोभ से निपटने के लिए जब तब इस्तेमाल कर रही हैं।

आज बारबार फिर से हालात वैसे ही हो रहे हैं जिसमें अपने अधिकारों की बात करना, सरकार की गलतियों पर आलोचना करना, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आदि पर हमले तेजी से बढे हैं।

आज की लड़ाई आज से 100 साल पहले की लड़ाई से अधिक कठिन और उलझी हुई है। आज गोरे अंग्रेज जिनका स्पष्ट लक्ष्य था भारत की आर्थिक सम्पत्ति का अधिकतम दोहन और ब्रिटेन की समृद्धि । आज काले अंग्रेजों ने धार्मिक और जातीय घृणा और संदेह को बढ़ा कर इसे वर्तमान शासक वर्ग के हितों को साधने के लिए विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका के साथ प्रेस को अधिकाधिक अपने हितों के अनुरूप मोड़ तोड़ दिया है।

आज का संकल्प हमें 100 साल पहले के अधूरे सपनों को पूरा करने और एक वास्तविक आजाद भारत की लड़ाई को अंतिम मंजिल तक ले जाने की प्रेरणा और संकल्प से प्रेरित करता है। जलियांवाला बाग़ की तर्ज पर देश के विभिन्न हिस्सों में जिसमें कश्मीर, आदिवासी बहुल इलाके और पूर्वोत्तर भारत प्रमुख हैं, ऐसे लघु जलियांवाला बाग़ काण्ड की याद दिलाते हैं। यह लड़ाई पूरे भारत के दलित, अल्पसंख्यक, आदिवासियों और लोकतंत्र प्रेमी छात्र बुद्धिजीवी, मजदूर किसान और महिला मुक्ति के साथ अविभाज्य रूप से जुड़ा है।

(रविंद्र सिंह पटवाल स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)


 








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