ग्राउंड रिपोर्ट: जम्मू-कश्मीर के चुनावी माहौल में उत्साह कम बेरूखी- बेचैनी ज्यादा है!

साप्ताहिकी , , शुक्रवार , 19-04-2019


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चंद्रप्रकाश झा

17 वीं लोक सभा चुनाव के लिए जम्मू-कश्मीर में अभूतपूर्व सुरक्षा व्यवस्था के बीच चप्पे -चप्पे पर सुरक्षाकर्मी तैनात हैं। सप्ताह में कम से कम दो दिन हाईवे नागरिक वाहनों का आवागमन रोक दिया जाता है जब उन पर सुरक्षा बलों के वाहनों का काफिला गुजरता है।  मतदाताओं का अलगाववादियों ने मतदान के बहिष्कार का आह्वान कर रखा है जिसका असर कश्मीर घाटी में ज्यादा और अन्यत्र लगभग नगण्य नज़र आया। कश्मीर में चुनाव के प्रति बेरुखी पहले भी रही है। मतदान की औसत दर ज्यादा नहीं रही।  लेकिन इस बार माहौल कुछ अलग ही है जिसमें बेरुखी और बेचैनी का मिश्रण है। चुनाव के ऐन पहले पूर्व आईएएस अधिकारी शाह फैसल एवं नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ की पूर्व उपाध्यक्ष शेहला राशिद की जिस पार्टी - जम्मू कश्मीर पीपुल्स मूवमेंट के गठन की घोषणा की गई उसकी कोई चुनावी गतिविधि नहीं है। संभव है यह पार्टी आगामी विधान सभा चुनाव में सक्रिय हो।  

निर्वाचन आयोग ने 87 सीटों की भंग की जा चुकी जम्मू-कश्मीर विधान सभा के चुनाव ' सुरक्षा' कारणों से नहीं कराने का निर्णय किया। 2014 के पिछले लोकसभा चुनाव में राज्य में छह में से तीन सीटें, जम्मू, उधमपुर और लद्दाख बीजेपी ने जीती थी। तीन, अनंतनाग बारामूला और श्रीनगर पीडीपी  ने जीती थी। इस बार राज्य में पांच चरणों में  मतदान कराये जा रहे हैं। सुरक्षा कारणों से अनंतनाग लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र में तीन चरणों में मतदान निर्धारित है। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार प्रथम चरण में 11 अप्रैल को जम्मू में 72  प्रतिशत और बारामूला में 35 प्रतिशत मतदान की खबर है। 

54 फीसदी विस्थापित कश्मीरी पंडितों ने भी वोट डाले। दूसरे चरण में 18 अप्रैल को श्रीनगर में करीब 15 प्रतिशत और  प्रतिशत  और उधमपुर में 70  फीसद मतदान की सूचना है। अलगाववादियों द्वारा मतदान का बहिष्कार करने के आह्वान के बावजूद  कोई ख़ास वारदात की खबर नहीं है। इस बार के चुनाव में कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच लगभग गठबंधन है। लेकिन कुछेक सीट पर दोनों के प्रत्याशी हैं।  

श्रीनगर

दिल्ली से 876 किलोमीटर उत्तर की दूरी पर अवस्थित श्रीनगर की लोक सभा सीट के लिए 18 अप्रैल को मतदान हुआ , जहां करीब 14 लाख मतदाता हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में श्रीनगर सीट से पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ( पीडीपी ) के तारीक अहमद कारा निर्वाचित हुए थे। किन्ही कारणों से कारा ने जब अक्तूबर 20 16 में इस्तीफा दे दिया तो अप्रैल 2017 के उपचुनाव में राज्य के तीन बार मुख्यमंत्री रहे एवं नेशनल कांफ्रेंस के नेता फारूख अब्दुला जीते। डॉ फारूख अब्दुला पहले भी यहां से तीन बार सांसद रह चुके हैं। उनके पुत्र उमर अब्दुल्ला भी यहां से तीन बार लगातार सांसद रहे हैं।

फारूख अब्दुला की माता, बेगम अकबर जहां अब्दुल्ला  (1907 -2000 ) को भी लोक सभा में इस सीट का दो बार प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला था। इस बार  श्रीनगर सीट से कुल 12 उम्मीद्वार हैं जिनमें ' पीपल्स कॉन्फ्रेंस ' के इरफान रजा अंसारी सबसे अमीर हैं जिनके पास 66.54 करोड़ रुपये की संपत्ति है। फारूख अब्दुल्ला के पास 12.1 करोड़ रुपये की संपत्ति है। पीडीपी प्रत्याशी एवं  शिया नेता आगा मोहसीन के पास 18.30 लाख रुपये की चल और एक करोड़ रुपये की अचल संपत्ति है। भाजपा के उम्मीदवार खालिद जहांगीर के पास 64 लाख रुपये की चल और डेढ़ करोड़ रुपये की अचल संपत्ति है। श्रीनगर में 12 उम्मीदवार मैदान में हैं।

भाजपा प्रत्याशी एवं पूर्व पत्रकार खालिद जहांगीर ने दिल्ली में बसे कश्मीरी पंडितों के बीच चुनाव प्रचार के लिए पहुंचना मुनासिब समझा। पहली बार चुनाव लड़ रहे खालिद जहांगीर ने दिल्ली जाकर विस्थापित कश्मीरी पंडितों के बीच चुनाव प्रचार किया। उनके बीच किसी भी प्रत्याशी के चुनाव प्रचार का यह पहला अवसर था। एक अंतर्राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल के पत्रकार रह चुके खालिद को प्रधानमंत्री नरेंद मोदी की जम्मू में 2014 में हुई रैली में भाजपा में शामिल किया गया था। वह अपने चुनाव प्रचार को लेकर बहुत उत्साहित हैं और विस्थापित कश्मीरी पंडितों के लिए कुछ अभिनव प्रयास करना चाहते हैं। विस्थापित कश्मीरी पंडितों में से करीब 400 का नाम अभी भी घाटी की मतदाता सूची में दर्ज है।

निर्वाचन आयोग ने दिल्ली में बसे कश्मीरी पंडितों के अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने के लिए विशेष प्रबंध किये हैं , जिसके लिए उन्हें ' माइग्रेंट फॉर्म ' भर कर दाखिल करना पड़ता है। बताया जाता है कि कुछ ही कश्मीरी पंडितों ने इस तरह अपना नाम दर्ज कराया है। अधिकतर ने दिल्ली और अन्यत्र बस जाने के बावजूद मुख्यतः भावनात्मक कारणों से अभी तक कश्मीर की ही मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज करा रखा है। भाजपा ने 2019 के आम चुनाव के लिए अपने चुनावी ' संकल्प पत्र ' में विस्थापित कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास की एक योजना शुरू करने का वादा किया है।

करीब 10 लाख की आबादी का यह खूबसूरत शहर जम्मू -कश्मीर की ग्रीष्मकालीन राजधानी है। यह कश्मीर घाटी और झेलम नदी के तट पर बसा हुआ है। शहर का उल्लेख कल्हण के 12 वीं सदी के प्राचीन ग्रन्थ राजतरंगिणी में मिलता है जो , भाषाशास्त्रीय रूप से सूर्य नगर का स्थानिकीकरण भी माना जाता है। कश्मीर घाटी में 14 वीं सदी तक हिन्दू एवं बौद्ध शासकों का राज रहा। 1586 में मुग़ल बादशाह अकबर ने इसे जीत कर अपने काबुल सूबा में मिला दिया। शाहजहां ने अलग कश्मीर सूबा कायम कर श्रीनगर को उसकी राजधानी बनाया। मुग़ल साम्राज्य के पतन के बाद घाटी में कई दशक तक अफगान कबीलों और जम्मू के डोगरा शासकों का राज रहा।

1814 में पंजाब के सिख शासक महाराजा रणजीत सिंह ने कश्मीर घाटी के ज्यादातर हिस्सों और श्रीनगर को भी फतह कर अपने राज में मिला लिया। 1846 में सिख शासकों और ब्रिटिश राज के बीच लाहौर की संधि हुई जिसकी बदौलत कश्मीर घाटी पर ब्रिटिश राज का अधिपत्य हो गया और जम्मू क्षेत्र के डोगरा शासक महाराजा गुलाब सिंह को जम्मू-कश्मीर राज्य का अर्ध -स्वतंत्र शासक मान लिया गया। ब्रिटिश शासन से भारत और पाकिस्तान को आज़ादी मिलने पर कश्मीर के तत्कालीन शासक महाराजा हरि सिंह ने अपनी रियासत का इन दोनों में से किसी देश में विलय करने से इंकार कर दिया।

पाकिस्तान समर्थित कबीलाई जब श्रीनगर तक पहुंच गए तो महाराजा हरि सिंह ने भारत से मदद मांगी और उसमें जम्मू -कश्मीर के विलय के करार पर 26 अक्तूबर 1947 को हस्ताक्षर कर दिए। भारत सरकार ने तत्काल सैन्य कार्रवाई कर अपनी सेना को विमान से श्रीनगर भेज उन कबीलाइयों का हमला विफल कर दिया। उसके बाद से कश्मीर घाटी के कुछ भाग पाकिस्तान अधिकृत हैं जिसे वहां की सरकार ने ' ' आज़ाद कश्मीर' के रूप में ' स्वतंत्र देश ' की मान्यता दे रखी है। हिमालय की वादियों में पसरे इस राज्य के मुख्यतः तीन क्षेत्र हैं , जम्मू , कश्मीर और लद्दाख।  भारत की 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की एक करोड़ से कुछ अधिक आबादी का 67 प्रतिशत मुस्लिम , 30 फीसदी हिन्दू और एक प्रतिशत से कुछ अधिक बौद्ध है. राज्य  का 78114 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पाकिस्तान अधिकृत है जिसमें से 5180 वर्ग किलोमीटर उसने चीन को सौंप रखा है।  चीन ने भी लेह (लद्दाख ) का 37555 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर कब्जा कर रखा है

अनंतनाग

लोकसभा की 1916 से ही रिक्त अनंतनाग सीट पर उपचुनाव ' सुरक्षा कारणों ' से नहीं कराये गए जो महबूबा मुफ़्ती के मुख्यमंत्री बनने के बाद इस सीट से उनके दिए इस्तीफा के कारण रिक्त हुई थी। इस बार अनंतनाग के विभिन्न जिलों में तीन चरणों में मतदान कराये जा रहे है. वहां करीब 13 लाख मतदाता हैं। अनंतनाग में विभिन्न जिलों में तीसरे चरण में 23 अप्रैल , चौथे चरण में 29 अप्रैल और  पांचवें चरण में शोपियां और पुलवामा जिले में 6 मई को मतदान होगा। अनंतनाग में कुल 18  प्रत्याशियों में पीडीपी की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती, भाजपा के सोफी यूसुफ, कांग्रेस के गुलाम अहमद मीर और नेशनल कांफ्रेंस के हसनैन मसूदी शामिल हैं।

लद्दाख

लद्दाख , भारत में क्षेत्रफल के हिसाब से सबसे बड़ा लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र है। इसकी आबादी तो सिर्फ एक लाख 60 हज़ार है लेकिन क्षेत्रफल 173266  वर्ग किलोमीटर है। लद्दाख में छह मई को वोट डाले जाने हैं। पिछली बार यहां से जीते भाजपा के छिवांग क्षेत्र की उपेक्षा का आरोप लगाकर 2018 में पार्टी और  संसद की सदस्य्ता से भी इस्तीफा दे दिया। इस बार भाजपा ने जमयांग सेरिंग नामग्याल को और कांग्रेस ने रिगजिन स्पालबर को अपना प्रत्याशी बनाया है।

बारामूला

उत्तरी कश्मीर के बारामूला लोक सभा निर्वाचन क्षेत्र करीब 11 लाख मतदाता है पिछली बार पीडीपी के मुजफ्फर हुसैन बेग जीते थे।  इस बार पीडीपी ने अब्‍दुल कयूम वानी को भाजपा  ने मोहम्मद मकबूल वार को कांग्रेस ने हाजी फारूक मीर को और नेशनल कांफ्रेस ने मोहम्‍मद अकबर लोन को प्रत्याशी बनाया है।

जम्मू

जम्मू लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में करीब 18 लाख मतदाता हैं। 2014 में यहां  भाजपा के जुगल किशोर जीते थे जो इस बार भी पार्टी प्रत्याशी हैं। कांग्रेस के प्रत्याशी  रमन भल्‍ला हैं। यह क्षेत्र राज्य में भाजपा का गढ़ रहा है।

ऊधमपुर

 ऊधमपुर 2014 में  भाजपा नेता एवं केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह जीते , जो इस बार भी प्रत्याशी हैं। उन्हें जम्मू -कश्मीर के ' हिन्दू ' मुख्यमंत्री के लिए भाजपा का चेहरा माना जाता है। इस बार पीडीपी ने वहां अपने प्रत्याशी खड़े नहीं किये हैं। लेकिन कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस गठबन्धन के प्रत्याशी चुनावी मुकाबला में डटे हैं। ऊधमपुर सीट पर कुल 1 2 उम्मीदवार हैं जिनमें  कांग्रेस के विक्रमादित्‍य सिंह भी है।  

भारत के संविधान से अलग जम्मू -कश्मीर के अपने संविधान के प्रावधानों के तहत विधान सभा चुनाव छह बरस पर कराये जाते हैं। विधान सभा के नवम्बर -दिसंबर 2014 में हुए पिछले चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था। तब भाजपा ने  अप्रत्याशित रूप से पीडीपी के साथ गठबंधन सरकार बनाई थी। पीडीपी नेता मुफ़्ती मोहम्मद सईद मुख्यमंत्री बने। उनके निधन के बाद उनकी पुत्री , महबूबा मुफ़्ती ने दोनों के गठबंधन की नई सरकार बनाने के लिए कोई हड़बड़ी नहीं की। वह काफी सोच -समझ कर ही चार अप्रैल 2016 को पीडीपी - भाजपा गठबंधन की दूसरी सरकार की मुख्यमंत्री बनीं। दोनों दलों के बीच कभी कोई चुनावी गठबंधन नहीं रहा।

दोनों ने सिर्फ राज्य की सत्ता पर काबिज होने के लिए चुनाव-पश्चात गठबंधन किया। यह गठबंधन अगले चुनाव के पहले ही टूट गया।  बीजेपी इस गठबंधन की सरकार रहते हुए आम चुनाव में उतरने का जोखिम नहीं लेना चाहती थी। बीजेपी ने जम्मू -कश्मीर में जो अपनी ही गठबंधन सरकार गिरायी उसके गहरे चुनावी निहितार्थ थे।  भाजपा प्रवक्ता राम माधव ने ऐसा करने के दो बड़े कारण बताए थे जो उनके शब्दों में 'आतंकवाद को नियंत्रित करने में महबूबा मुफ़्ती सरकार की विफलता ' तथा गैर -मुस्लिम बहुल जम्मू और लद्दाख तीनों की ' उपेक्षा ' है। राज्य में बीजेपी का जनाधार इन्हीं दोनों क्षेत्रों में है।

(चंद्रप्रकाश झा वरिष्ठ पत्रकार हैं और अभी जम्मू-कश्मीर का दौरा कर लौटे हैं।)








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