जेएनयू ने दिया गांधी के रास्ते गोडसों को जवाब, निकाला शांति मार्च

मुद्दा , , मंगलवार , 18-09-2018


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रवींद्र पटवाल

जेएनयू में तो लेफ्ट जीतता ही रहा है। लेकिन इस बार इसे खास बना दिया है एबीवीपी को आगे रख उसके जरिये जबरिया बीजेपी सरकार और प्रशासन गुंडा वाहिनी ने।

अगर ऐसा नहीं होता तो आज चुनाव जीतने के बाद आश्वस्त वाम दलों के छात्र अपनी थकान मिटा रहे होते, हंसी चुहुल कर रहे होते। और हर बार की तरह एक अलसाया आश्वस्त गुमान रहता।

लेकिन हर बार हारने वाले लोग कुछ और ही इरादे से इस बार तैयार थे। और उन्होंने रविवार की रात फिर हिंसा की, एक एनएसयूआई समर्थक छात्र को रात 3 बजे पीटने पर जब वर्तमान छात्र संघ अध्यक्ष ने अपनी जिम्मेदारी समझ भाग कर बचाने की कोशिश की तो बदले में उन्हें भी हमले का शिकार होना पड़ा।

कहानी अब शुरू होती है। और इसीलिए इस बार का छात्र संघ कन्हैया कुमार और शेहला राशिद वाले समय की तरह लगता है याद किया जायेगा।

इस हमले ने जेएनयू के छात्रों, अध्यापकों सबको सकते में डाल दिया। और सुबह से यह तय किया गया कि इस तरह के उकसाने वाले हमले का जवाब अगर उसी तरह से किसी ने दिया तो बहार भेड़िया तैयार है, वह किसी भी तरह से इस संस्थान को बंद कराना चाहता है। इसलिए आक्रोश और बैचेनी को एक स्वर एकताबद्ध शांति के लिए जेएनयू को खड़ा होना पड़ेगा।

और कल शाम को हजारों की संख्या में ऐसा हुआ भी। लेकिन इस कदम पर वामपंथ के अंदर एक बड़ी बहस को जन्म दे दिया है।

कई अति उत्साही और रूमानी लोग इसे मौके के रूप में लेना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि एक थप्पड़ की जगह चार लगाने चाहिए। ये सब गांधी की तरह शांति का पाठ पढ़ना दरअसल संशोधनवाद है। और वे इस सब पर उबासियां निकाल रहे हैं।

दूसरी तरफ कुछ लोग इस अभूतपूर्व समय में भी वाम नेताओं के सड़कों पर समर्थन में न आने को उनकी वैचारिक जड़ता से जोड़ रहे हैं। आज जिस खतरे को जेएनयू का आम छात्र और अध्यापक समझ रहा है, उसे गंभीरता से अगर राष्ट्रीय नेता भी लेते, मीडिया इसे बड़ा खबर बनाती और यह एक बड़ी राजनैतिक पहलकदमी होती, जिसमें तत्काल ही केंद्र सरकार की बड़ी किरकिरी होती।

आज का यूनाइटेड जेएनयू अभूतपूर्व था। एक पद या छात्रसंघ महत्वपूर्ण है भी नहीं।

जब कैंपस का एक एक छात्र अपनी अस्मिता के लिए, अपनी पढ़ाई के लिए, अपनी स्वतन्त्रता के लिए जागरूक होकर एक आवाज में खड़ा होता है तो यह उस पीढ़ी को एक नए स्तर पर ले जाता है। यह चेतना जेएनयू के इस बैच को वह देगा जो मुश्किल से कभी कभी ही मिलती है। सवाल फिर से वही रहेगा, क्या जेएनयू अपने सर्किल से बाहर निकलकर समाज से भी जुड़ेगा? संघ ने इस कोशिश को बढ़ाया है, चाहे बदनाम करने के लिए ही सही, पर जेएनयू आज पूरे देश में जितना जाना जाता है उतना शायद ही कोई और यूनिवर्सिटी। जेएनयू के पास यह सुनहरा मौका है।

देश में वाम दलों को भी नेतृत्व चाहिए, जिसमें बेहतर पैनापन हो, जनता की नब्ज को सही ढंग से समझने का माद्दा हो।

(लेखक रविद्र पटवाल सामाजिक कार्यकर्ता हैं और सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं।)

 










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Umesh chandola :: - 09-18-2018
Jnu community Must Must grab this opportunity to get rid of Allegation of Tukde Tukde Gang. Why not jnu Union file a criminal defamation case against bjp party or abvp or Rajnath Singh for Not registering an fir. For saying Umar Khalid visited Park twice inspite of the fact that he is not having any passport? Act now!! For this and more issues. I think Prashant bhusan etc are already there to defend free.