कमलनाथ सरकार के पास बहुमत होना ही उसके टिके रहने की गारंटी नहीं!

मुद्दा , , बुधवार , 22-05-2019


kamalnath-mp-vidhansabha-majority-guarantee-govt-bjp-congress

अनिल जैन

संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह कतई जरूरी नहीं कि चुनाव में हमेशा ही किसी न किसी पार्टी को बहुमत हासिल हो। कई बार अल्पमत की सरकारें भी बाहरी समर्थन से चलती हैं और मिली-जुली सरकारें भी बनती हैं। कई बार तो अल्पमत वाली या मिली-जुली सरकारें कामकाज के लिहाज से पूर्ण बहुमत वाली सरकारों से भी बेहतर साबित होती हैं। वैसे किसी भी चुनाव के नतीजों में जब त्रिशंकु सदन की स्थिति उभरती है और मिली-जुली सरकारें बनती हैं तो राजनीतिक स्थिरता पैदा होने का अंदेशा भी हमेशा बना रहता है। ऐसी स्थिति में सरकार चलाना राजनीतिक प्रबंधन और चतुराई पर निर्भर करता है। 

लेकिन ऐसी सरकारों को बनाने, बचाने और गिराने के खेल में अक्सर राजनीति अपने निकृष्टतम रूप में सामने आती है। ज्यादातर मामलों में यह स्थिति सदन भंग होने या राष्ट्रपति शासन लागू होने तक जारी रहती है। ऐसा कई बार हुआ है और अभी भी हो रहा है। इस समय देश के कई राज्यों में मिली-जुली सरकारें चल रही हैं, जिन पर अस्थिरता की तलवार लटक रही है। मध्य प्रदेश भी ऐसे राज्यों में शुमार है, जहां कांग्रेस की सरकार कुछ छोटी पार्टियों और निर्दलीय विधायकों के समर्थन से चल रही है, और जिसे गिराने की कोशिशों में मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा शुरू दिन से जुटी हुई है और इस समय उसने अपनी कवायदें तेज कर दी हैं।

एक फिल्मी गीत की तर्ज पर कहा जाए तो मध्य प्रदेश में 'यह तो होना ही था!’ लगातार 15 सालों तक सत्ता में रही भाजपा की ओर से जिस तरह पांच महीने पुरानी कांग्रेस की सरकार के अल्पमत में होने का दावा करते हुए उसकी विदाई का गीत गुनगुनाया जा रहा है, वह जरा भी हैरान करने वाला नहीं है। लोकसभा चुनाव के नतीजे आने में अभी एक दिन का वक्त बाकी है लेकिन एग्जिट पोल्स के अनुमानों को ही वास्तविक नतीजे मानकर चल रही भाजपा एक बार फिर कांग्रेस सरकार के अल्पमत में होने का दावा करते हुए राज्यपाल से विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने और मुख्यमंत्री को अपना बहुमत साबित करने का निर्देश देने की मांग कर रही है। दूसरी ओर मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भाजपा की इस मांग की खिल्ली उड़ाते हुए कहा है कि उनकी सरकार को कोई खतरा नहीं है और भाजपा नेताओं को किसी भी तरह के सपने देखने का हक है।

दरअसल, मध्य प्रदेश की पांच महीने पुरानी कांग्रेस सरकार पर खतरे के बादल उसी दिन से मंडराना शुरू हो गए थे, जिस दिन कमलनाथ ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। दिसंबर 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में राज्य की 230 सदस्यों वाली विधानसभा में कांग्रेस को 114 सीटें हासिल हुई थीं जो बहुमत के आंकड़े से दो कम थी। दूसरी ओर भाजपा को 109 सीटें मिली थीं। चुनाव नतीजे आते ही बहुजन समाज पार्टी के दो, समाजवादी पार्टी के एक और चार निर्दलीय विधायकों ने सरकार बनाने के लिए कांग्रेस को अपना समर्थन देने का ऐलान कर दिया था। इस प्रकार कांग्रेस कुल 121 विधायकों के समर्थन के बूते सरकार बनाने में कामयाब रही थी। 

ऐसा नहीं है कि भाजपा ने अपना बहुमत न होते हुए भी उस वक्त सरकार बनाने की कोशिश न की हो। उसकी ओर से न सिर्फ निर्दलीय विधायकों को साधने की कोशिशें की गई थीं बल्कि कांग्रेस के भी कुछ विधायकों से संपर्क किया गया था। योजना यह थी कि निर्दलीय विधायकों का समर्थन हासिल कर और कांग्रेस के कुछ विधायकों से इस्तीफा दिलवा कर विधानसभा की कुल प्रभावी सदस्य संख्या के आधार पर अपने बहुमत का इंतजाम कर लिया जाए। उस समय भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की भोपाल यात्रा को भी इसी सिलसिले में देखा गया था। लेकिन भाजपा के रणनीतिकार अपनी किसी भी हिकमत को अमली जामा नहीं पहना सके थे।

प्रदेश में अपनी सरकार बनाने की योजना में नाकाम रहने के बाद भी भाजपा नेता चुप नहीं बैठे। चार महीने पहले जनवरी में जब कर्नाटक में चल रही जनता दल (सेक्युलर) और कांग्रेस की साझा सरकार को गिराने की कवायदें जोरों पर थीं, उस वक्त भी भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने इंदौर में एक बयान जारी किया था, जिसमें उन्होंने कहा था- 'जिस दिन भी बॉस का इशारा मिल जाएगा, हम एक सप्ताह में सरकार गिरा देंगे।’

प्रदेश में ताजा राजनीतिक घटनाक्रम के तहत भी विजयवर्गीय का बयान आया है कि कमलनाथ सरकार की उम्र अब ज्यादा लंबी नहीं बची है और वह 22 दिन भी नहीं रह पाएगी। उनका यह बयान मुख्यमंत्री कमलनाथ के उस बयान के जवाब में आया है, जिसमें कमलनाथ ने राज्य की 29 में से 22 लोकसभा सीटें जीतने का दावा किया है। यही नहीं, केंद्रीय मंत्री और प्रदेश भाजपा के पूर्व अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने तो विजयवर्गीय से भी एक कदम आगे बढ़ते हुए दावा किया है कि कई कांग्रेसी अन्य विधायक हमारे संपर्क में हैं और हम जब चाहेंगे, तब सरकार गिरा देंगे। 

सरकार के बहुमत का परीक्षण करने के लिए विधानसभा का सत्र बुलाने की मांग करते हुए राज्यपाल को पत्र लिख चुके नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने तो और भी साफ शब्दों में कहा कि लोकसभा चुनाव के नतीजे आने और केंद्र में दोबारा भाजपा की सरकार बनते ही कमलनाथ सरकार की विदाई हो जाएगी। कहने की आवश्यकता नहीं कि भाजपा नेताओं के इन सारे बयानों को पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की सहमति प्राप्त है। क्योंकि खुद पार्टी अध्यक्ष अमित शाह भी एक से अधिक बार कह चुके हैं कि लोकसभा चुनाव के बाद मध्य प्रदेश, राजस्थान और कर्नाटक की सरकारें किसी भी दिन गिर जाएंगी।

बहरहाल, भाजपा नेताओं की ताजा गतिविधियों और बयानों को लेकर मुख्यमंत्री कमलनाथ बेफिक्र हैं। उनका कहना है वे पांच महीने के भीतर दो मौकों पर विधानसभा में अपना बहुमत साबित कर चुके हैं और नियम तथा प्रक्रिया के तहत आगे जब भी जरूरत होगी, वे अपना बहुमत साबित कर देंगे। कमलनाथ के इस आत्मविश्वास भरे बयान को थोड़ा स्पष्ट स्वर देते हुए राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री जीतू पटवारी का कहना है कि जहां भाजपा की सोच खत्म होती है, वहां से कमलनाथ की सोच शुरू होती है, लिहाजा भाजपा नेता किसी तरह की गलतफहमी में न रहें।

दरअसल, कमलनाथ सरकार को गिराने की जिस योजना पर भाजपा नेता काम कर रहे हैं, उसी से मिलती-जुलती योजना के तहत अपनी सरकार को बचाए रखने की तैयारी कमलनाथ और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह पहले ही कर चुके हैं। सूत्रों के मुताबिक भाजपा के करीब 7-8 विधायक दोनों नेताओं के संपर्क में हैं, जो मौका आने पर विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर भाजपा का खेल बिगाड़ सकते हैं। इसके अलावा कमलनाथ ने भाजपा सरकार के दौरान हुए कुछ ऐसे कथित घोटालों की जांच की तैयारी भी कर रखी है, जो सीधे-सीधे पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनकी सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों से संबंधित हैं।

बहरहाल मुख्यमंत्री कमलनाथ और उनकी पार्टी के अन्य नेता और मंत्री अपनी सरकार को लेकर चाहे जितना आश्वस्त हों, मगर 23 मई को चुनाव नतीजे अगर एग्जिट पोल्स के अनुमानों के मुताबिक आए तो उनकी सरकार पर मंडरा रहे खतरे के बादल और ज्यादा गहराने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। इस सिलसिले में मणिपुर और गोवा की मिसालें याद रखी जानी चाहिए। इन दोनों राज्यों में भाजपा नीत सरकार बनाने के लिए जिस तरह संवैधानिक प्रावधानों और मान्य परंपराओं की अनदेखी देखी हुई, विधायकों की कथित तौर पर खरीद-फरोख्त की गई और राज्यपालों ने जिस तरह की भूमिका निभाई, उस सबको देखते हुए कुछ भी होना मुमकिन है।

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)








Tagkamalnath vidhansabha majority guarantee govt

Leave your comment











n08AF :: - 05-22-2019
This is your employment contract http://fatmomtube.in.net fat mom tube As a commemoration to All-Star week, the Mets, along with MLB, will take part in various charitable projects that contribute to Hurricane Sandy relief efforts and veterans and renovation projects in Queens and Brooklyn, as well as FanFest at the Javits Center in Manhattan.

9wEL4Z :: - 05-22-2019
Have you read any good books lately? http://xvedio.in.net/xvidoes/ xvidoes “The recent request for an EGM to replace key personnel would suggest our concerns are shared by other significant shareholders. We would therefore urge the board of Rangers Football Club to agree to allow the EGM to proceed as soon as possible to enable the thousands of fans who have invested in the club to hear all sides in an open forum.”

FcAMqT :: - 05-22-2019
One moment, please http://9taxi.in.net www.9taxi.com It said the suspects were natives of the North Caucasus, amountainous southern region not far from the Black Sea city ofSochi, where Russia hosts the 2014 Winter Olympics in February.The region is some 2,000 km (1,200 miles) from Kirov.

bfC4m :: - 05-22-2019
We're at university together http://tiava.in.net tiava The memo encourages "dispositions/discharges as soon as possible." Hospital spokesperson Sandy Dean explained this direction, saying, "We are are encouraging health care providers to be more efficient when handling their paperwork instead of writing discharge orders later in the day ... no patient has been or will be discharged before it is medically appropriate."