“तुम मेरी किताबें सिलेबस से निकालोगे, तो हज़ारों लोग मेरी किताबें सड़कों पर पढ़ेंगे”

खरी-खरी , नई दिल्ली, मंगलवार , 06-11-2018


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जनचौक ब्यूरो

‘मेरे नाम के आगे ‘शेफर्ड’ लगा है, जिसका अर्थ होता है ‘चरवाहा’, ये कहते हैं कि ये नाम ईसाई नाम है। ये थोड़ा भी पढ़ते-लिखते नहीं, मेरे पूर्वज भी चरवाहे थे, मैं भी वही हूं। अगर ये पढ़ने लिखने वाले होते, तो कभी किताबों पर बैन नहीं लगाते। ये ज्ञान विरोधी लोग हैं, जो मुल्क का नुकसान कर रहे हैं। हम शूद्र लोगों ने काम कर करके ही मुल्क को बनाया है, जबकि दो चार सवर्ण जातियों ने बिना कोई काम किए परजीवी की तरह बस खाया है। इसीलिए हमारा मुल्क इतना पीछे हो गया। अब ये हमारे सवालों व विचारों को भी मिटाना चाहते हैं, लेकिन ये सफल नहीं होंगे।’ ये बातें कांचा अइलैय्या ने दिल्ली विश्वविद्यालय में 3 नवंबर को पब्लिक मीटिंग में कहीं। दिल्ली विश्वविद्यालय में शैक्षणिक मामलों की स्थायी समिति द्वारा अपनी किताबें हटाये जाने के विरोध में आयोजित कार्यक्रम में वे बोल रहे थे।

पिछले 24 अक्तूबर को डीयू की स्थायी समिति ने दो विवादित प्रस्ताव दिए कि राजनीति विज्ञान विभाग के पाठ्यक्रम में शामिल कांचा अइलैय्या की तीन किताबें ‘व्हाई आई एम नॉट अ हिन्दू’, ‘बफैलो नेशनलिज़्म- ए क्रिटिक ऑफ स्पिरिचुअल फ़ासिज़्म’ और ‘पोस्ट हिन्दू इंडिया- ए डिस्कोर्स इन दलित-बहुजन सोशियो स्पिरिचुयल ऐंड साइंटिफिक रिवोल्यूशन’ के पाठ ‘हिन्दू विरोधी’ व ‘भारतीयता विरोधी’ हैं, इसलिए हटा दिए जाएं। दूसरा विवादित सुझाव ये दिया कि ‘दलित’ शब्द संविधान में नहीं है, इसलिए ‘दलित’ शब्द का अकादमिक प्रयोग वर्जित किया जाए। ‘फ़ाइट फॉर सोशल जस्टिस इन डीयू’ द्वारा आयोजित इस प्रतिरोध सभा में कांचा को ‘बैन कल्चर के प्रतिरोध में’ बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था, जहां कांचा ने अपनी तीनों किताबों पर तफ़सील से बात की और ललकार बोले कि 'अगर तुम किताबों को सिलेबस से निकालोगे, तो हज़ारों लोग हाथ में किताबें लेकर सड़कों पर पढ़ेंगे, विचारों को नहीं मारा जा सकता।'

डीयू में आमतौर पर पब्लिक मीटिंग की संस्कृति नहीं रही है, बावजूद इसके नॉर्थ कैंपस के गेट नं 4 पर खुले मंच से कांचा को सुनने सैकड़ों की संख्या में डीयू के शिक्षक व छात्र तीन घंटे तक जमे रहे। कांचा ने क्रमशः अपनी किताबों पर बात करते हुए कहा ‘मैं हिन्दू क्यों नहीं हूं किताब में मैंने बचपन में बच्चे के पैदा होने से लेकर, उसकी सामाजिक निर्मिति, बचपन, विवाह, सामाजिक संबंध, हिन्दू देवी-देवता और हमारे देवी-देवता, दलितीकरण बनाम हिंदूकरण जैसे विषयों पर विस्तार से बात रखते हुए कहा कि ये हिन्दुत्व के ठेकेदार संघी लोगों से मैं ये सवाल करता हूं कि ‘शूद्र’ कभी हिन्दू हो ही नहीं सकता, जिसका मैं दर्शन, समाजशास्त्र और आर्थिक-सामाजिक मनोविज्ञान अपनी किताबों में दे रहा हूं, तुमको मेरी बातें गलत करनी है, तो इनका जवाब देते हुए किताबें लिखो। लेकिन ये ज्ञान विरोधी हैं, वर्ना ये किताबें बैन न करते।

‘बफैलो नेशनलिज़्म’ किताब में कामगार शूद्र जातियों के बारे में बात करते हुए बताया कि इस मुल्क को गाय का दूध नहीं, भैंस के दूध से मजबूती आई है, लेकिन चूंकि भैंस काली होती है और शूद्रों के साथ जुड़ी है, इसलिए इसकी पूजा नहीं करते। मेरा वश चले तो हर विश्वविद्यालय के गेट पर भैंस लेकर बांध दूं, कि देखो ये इस मुल्क की मेहनत व कामगार हिम्मत की प्रतीक है। आज ज़रूरत है कि वैज्ञानिक चेतना के साथ सभी को मुफ्त शिक्षा दी जाए, जबकि ये ज्ञान-विरोधी शिक्षा को ही बर्बाद कर रहे हैं।

अपनी तीसरी किताब ‘हिन्दुत्व मुक्त भारत’ पर बात करते हुए कांचा ने कहा कि आज मुल्क पर ज्ञान विरोधी, शूद्र विरोधी संघी ताकतों का कब्जा है, इसीलिए यहां ज्ञान-मीमांसा दुनिया के सामने फिसड्डी रही। शूद्रों और महिलाओं को कभी पढ़ने नहीं दिया, जबकि यही कामगार लोग हैं। वर्ना भारत की कोई एक किताब भी प्लेटो, अरस्तू, एडम स्मिथ की तरह दुनिया भर में पढ़ाई जाती। ये सब सन्यासी, पाखंडी हैं, जो आज सत्ता में बैठे हैं। इनका विरोध करना देश विरोधी व ज्ञान विरोधी होना नहीं है। इनको कभी समझ नहीं आएगा। न पढ़ते हैं और न पढ़ने देंगे। आज का समय अंबेडकर, नेहरू और मार्क्स को जोड़कर नैरेटिव देने का है।

दिल्ली विश्वविद्यालय में स्थायी समिति के प्रस्ताव के विरोध में प्रदर्शन हुए, साथ ही राजनीति विज्ञान विभाग ने प्रस्ताव पारित किया कि वे अपने यहां पाठ्यक्रम में कोई बदलाव नहीं करेंगे। अंतिम निर्णय विश्वविद्यालय की अकादमिक समिति को करना है। गौरतलब है कि दो वर्ष पहले एके रामानुजन के लेख ‘तीन सौ रामायण’ को विभाग के विरोध के बाद भी हटा दिया गया, साथ ही नंदिनी सुंदर व अर्चना प्रसाद की आदिवासियों पर लिखी किताबों को ‘नक्सली’ बताकर हटा दिया गया। इसी कड़ी में अब दलित-बहुजन वैचारिक दर्शन व समाजशास्त्रीय विश्लेषण पर आधारित कांचा की किताबों को ‘हिन्दू विरोधी’ बताकर हटाया जा रहा है। इसके खिलाफ़ दिल्ली विश्वविद्यालय में पहली बार 'बैन' की गई किताबों के लेखक को ही बुलाया और व्याख्यान सुना गया।

ऐसे में सवाल ये उठना स्वाभाविक है कि दलित, पिछड़े, आदिवासी, अल्पसंख्यक व महिलाओं द्वारा रचे गए नए विमर्शों पर लिखी किताबें विश्वविद्यालयों में नहीं पढ़ी जाएंगी, तो फिर विश्वविद्यालय किस काम के लिए हैं? क्या उनका पाठ्यक्रम सत्ता तय करेगी? डीयू में तमाम शिक्षक, छात्र व शोधार्थी मिलकर स्थायी समिति के सुझाव के विरोध में नारे लगाते हुए 30 व 31 अक्तूबर को प्रोटेस्ट किए कि ‘संघी सिलेबस नहीं चलेगा, भगवा सिलेबस नहीं चलेगा।’ ऐसे में ये आयोजन महत्वपूर्ण रहा कि जिनकी किताबें निकाल रहे हैं, डीयू उसी अपने लेखक को बुलाकर सुनता रहा। ये सत्ता व विश्वविद्यालय प्रशासन के लिए संकेत है कि तुम विचारों को नहीं मार सकते।

कार्यक्रम में तमाम छात्रों, शोधार्थियों व शिक्षकों ने भी अपनी बात रखी। जिसमें आभा देव, रतनलाल के साथ कई वक्ताओं ने पूरे मसले पर अपना प्रतिरोध जताया। अंत में धन्यवाद ज्ञापन शिक्षक संघ की प्रतिनिधि के बतौर  नंदिता नारायन ने  दिया। इसमें सैकड़ों की संख्या में लोग शामिल हुए।

 








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