चुनाव खर्चे में कर्नाटक ने तोड़े अब तक के सारे रिकार्ड

विमर्श , , बुधवार , 16-05-2018


karnatak-expenditure-record-election-modi

रवींद्र पटवाल

कर्नाटक का चुनाव खर्च 10 हजार करोड़ को पार कर गया। इतना खर्चीला चुनाव आज तक किसी राज्य के इतिहास में नहीं हुआ। पिछले लोकसभा चुनाव को अब तक के इतिहास का सबसे महंगा चुनाव अभियान बताया गया था जिसमें सरकारी अनुमान 30 हजार करोड़ का था।

आज अकेले एक मझोले राज्य का चुनाव खर्च 10 हजार करोड़ आंका गया है। इसमें पीएम के दौरे और ब्लैक मनी का कोई जिक्र नहीं है। क्या आपको लगता है कि आपकी तरह कर्नाटक का मतदाता हर खबर की खबर और अपने विवेक का इस्तेमाल कर वोट दिया होगा? जहां इतने शाही खर्च से यह चुनाव लड़ा गया, जिसमें इंसान के दिमाग को कुछ दिनों के लिए मीडिया, रैली, पैसा, दारू, धार्मिक, जातीय, क्षेत्रीय, जिन्ना, लिंगायत कार्ड कण्ट्रोल करता हो?

खैर चुनाव के रिजल्ट जो सुबह कुछ और, दिन में कुछ और और शाम तक कुछ और घोषित हुए। 

दोपहर तक आते-आते यह वर्डिक्ट यह निश्चित करने के लिए पर्याप्त था कि राहुल गांधी और कांग्रेस को भारत की जनता बीजेपी के विकल्प के रूप में नहीं देख पा रही। किसान, मजदूर, दलित, अल्पसंख्यक, महिला, आदिवासी, गरीब और छोटे दुकानदार सहित मध्य वर्ग का एक बड़ा हिस्सा आज नोटबंदी, जीएसटी, बैंकिंग एनपीए घोटाले और देश की कीमत पर कॉर्पोरेट के तेजी से आगे बढ़ते जाने से बुरी तरह आहत है।

पिछले चार सालों में भारत के विभिन्न तबकों ने जितने आन्दोलन खुद किये हैं, वह शायद ही आजाद भारत के इतिहास में हुए हों। याद रखिये, यह सब आन्दोलन स्वतःस्फूर्त हुए हैं। 

न कांग्रेस, न सपा, बसपा और न ही लेफ्ट ने इन आंदोलनों के श्रीगणेश में कोई भूमिका निभाई। अपवाद स्वरूप राजस्थान और नासिक के किसान आन्दोलन में सीपीएम के किसान संगठन के। 

ऐसे में विकास, विकास और सिर्फ विकास के नारे के पीछे मजबूत नेतृत्व के मोदी चेहरे जिसमें बाकी पार्टी की सारी भूमिका खत्म कर दी गई है। जनता के पास यह भ्रम आसानी से बनाने में सफलता मिलती दिखती है कि मोदी का विकल्प न विपक्ष के पास है और न ही बीजेपी के अंदर। धन बल और मीडिया बल के जरिये निर्मित यह इमेज एक वोटर को, परेशान और फटेहाल भारतीय को राहत तो नहीं देती, पर उसके पास कोई ठोस विकल्प भी नहीं दिखता।

ऐसे में शाम को अचानक कांग्रेस की ओर से जेडीएस को बिना शर्त समर्थन की गुगली ने पूरे देश को चौंका दिया। मणिपुर, मेघालय और गोवा में सबसे बड़े दल के रूप में उभरी कांग्रेस को अपना केन्द्रीय दल भेजने में जहां 2-3 दिन लग गए, और 2 सीट पर आई बीजेपी ने साम, दाम, दंड भेद के आंकड़े पहले से फिट कर बिसात बिछाकर सबसे बड़े दल होने के बावजूद कांग्रेस को इन 3 राज्यों में राज्यपाल की कृपा से सरकार बनाने के प्रथम अधिकार से च्युत कर दिया। 

आज कर्नाटक में कांग्रेस जेडीएस के साथ मिलकर बहुमत के आंकड़े से आगे निकल चुकी है, पर राज्यपाल साहब ने बीजेपी को अपना बहुमत सिद्ध करने के लिए एक हफ्ते का समय दे दिया है। अब यह बहुमत सिद्ध करने के लिए अगर कुछ हजार करोड़ और खर्च हो जाएं तो एक सरकार ही नहीं बदलेगी, बहुत कुछ बदलेगा।

दरअसल हम भारत के लोग, परसेप्शन को ही सच मानने के आदी हो गए हैं। जीते हारे कोई, सच क्या है और उसकी क्या अहमियत है। सबसे बड़ा खेल परसेप्शन का है। अगर तीन महीने तक कठुआ रेप केस में जम्मू में जनमत के अंदर यह परसेप्शन बनाने में कोई सफल रहता है कि हिन्दुओं के नेताओं को फंसाया जा रहा है और रोहिंग्या जम्मू में फ़ैल गए हैं तो एक अबोध बच्ची का रेप भी क्षम्य है। लेकिन वही 3 महीने के आन्दोलन को जब राज्य पुलिस की रिपोर्ट पर जज को बंधक बनाने की अति होती है तो परसेप्शन बदलने लगता है और बड़ी तेजी से देश और दुनिया को हकीकत पता चलने पर यही परसेप्शन अति के कारण बदलता है तो उन्ही पार्टी के नेताओं को कहना पड़ता है कि उनका सिर इस घटना से शर्म से झुक गया है।

आज कांग्रेस जिस चौराहे पर खड़ी है, उसकी जिम्मेदार वह खुद है। उसने कोई इच्छा शक्ति नहीं दिखाई। उसने आगे बढ़कर कोई आन्दोलन को जमीन पर सफल बनाने के लिए संघर्ष नहीं किया। उसने मात्र उस पर अपनी टिप्पणी और मोदी सरकार के दावों की पोल खोल अभियान को जारी रख खुद को विकल्प के रूप में पेश किया। जैसे किसी के पाप पर तैयार कलफ लगे कपड़े पहन विकल्प के लिए राहुल गांधी तैयार खड़े हैं।

इस शिथिलता को पहला मेजर ब्रेक लगाते हुए कांग्रेस ने पहली बार एक बड़ा संदेश दिया है। जेडीएस के नेतृत्व को कर्नाटक में स्वीकार कर उसने 2019 की लड़ाई को एक सच में तब्दील करने की बड़ी भूमिका निभाई है। आज के नतीजे के हिसाब से अगर कांग्रेस और जेडीएस मिलकर आम चुनाव लड़ें तो बीजेपी को मात्र 6 सीट लोकसभा की मिलेगी। मतलब कर्नाटक में 11 सीट का नुकसान। इसी तरह यूपी, बिहार, बंगाल, उड़ीसा, महाराष्ट्र जैसे तमाम राज्यों में अगर कांग्रेस 2019 में खुद को पीछे रखकर एक बड़े सतरंगी मोर्चे को आगे करती है, और देश को आगे रखती है तो कोई कारण नहीं कि यह महागठबंधन 350 सीट से ज्यादा लोकसभा सीट पा जाए। यह चुनाव के बाद का अलायन्स इस बात को रेखांकित करने और बाकी क्षेत्रीय दलों को इस ओर ले जाने के कदम के रूप में एक सकारात्मक संदेश है। कर्नाटक के नाटक में सरकार कौन बनाता है, यह गौण हो गया है। 

(रवींद्र पटवाल सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने के साथ ही तमाम सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियों में भी जीवंत भागीदारी करते रहते हैं।)

 




Tagkarnatak expenditure election modi record

Leave your comment