काशी बचा न, क्योटो बना

घटना-दुर्घटना , , बृहस्पतिवार , 17-05-2018


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चंचल बीएचयू

राजनीति जब झूठ, छल, प्रपंच और लालच पर उतर आए तो उसका गंतव्य महानाश होता है। काशी में खेला गया झूठ का खेल देखिए-‘‘काशी को स्मार्ट सिटी (?) बनाएंगे। काशी को क्योटो (?) कर देंगे। तालियां दोनों पर बजी थी। क्योंकि बड़ी झूठ थी। छोटी मोटी होती तो पकड़ में आ जाती। झूठ का दर्शन बहुत लुभावना होता है, क्योंकि आपकी अकल को मनमाफिक भागने का अवसर देता है। दिलचस्प रहा कि स्मार्ट सिटी का मतलब क्या होता है? यह शहर कैसा होगा? खाका क्या होगा? ताली बजानेवाले नहीं जानते। मजे की बात जिसने यह जुमला फेंका उसे खुद नही मालूम कि स्मार्ट सिटी क्या होती है? 

काशी क्या जाने क्योटो क्या है ? लेकिन सुन कर फूल गया। छन्नू लाल,पदमपति हथहो दे देकर ताली बजा-बजा के घर-घर मोदी बोलते रहे अब जब बनारस टूट रहा है तो सड़क पर खड़े होकर खिड़की में मुंह डाले कदमताल कर रहे हैं। क्योटो दरसाल काशी को सलाम करने आता है। हवाई अड्डे पर उतरते ही काशी की माटी पर माथा रखेगा और कहेगा तथागत की धरती है।कोई बनारसी बता दे ये क्योटो गया है? इस काशी की अपनी ठसक है। इसकी गति शून्य है। शून्य पर फिर कभी। हमने कहा कि यह कुंडों का शहर है। अनगिनत ताल, कुंड जल से भरा इस शहर की पहचान है। इनका संबंध सीधे गंगा से और फिर आपस में है। कहां छेद करोगे काशी में ?

सड़क तो तमीज से बना नहीं सकते चले हो काशी पर फ्लाईओवर डालने? काशी को समझो। यहां गंगा दक्षिण से उत्तर बहती है। कभी काशी विश्वविद्यालय के भूगर्भ विभाग से मिले हो, उनसे जानना चाहे हो कि काशी की बनावट कैसी है? पांच हजार साल पुराना शहर है यह, मंत्र नहीं है असलियत है। जरूरत की चीजें कैसे हल होती रही उस काशी की ? पीने का पानी, गंदे पानी की निकासी ये सब कैसा था? अचंभे में पड़ोगे यह जानकर की शहर की गंदगी या गंदा पानी गंगा में नहीं जा सकता था।

क्यों बनारस गंगा के किनारे पूर्वी हिस्से को बहुत ऊंचा रखा हुआ है जिससे सारी गंदगी पश्चिमी ओर निकल जाए। अभी 200 साल पहले 1825 में एक अंग्रेज इंजीनियर ने काशी के पानी निकाशी को समझ कर ड्रेनेज बनाया। काशी का ड्रेनेज पूरे जाल की तरह फैला था। बढ़ती हुई आबादी और निकम्मे अधिकारियों ने उसके मुहाने को बंद कर दिया। कहां करोगे खुदाई ? काशी पर वजन मत डालो। अकल लगाओ।

बनारस को,उसके अपने हाल पर छोड़ कर अगल बगल कहीं कोई और शहर बना देना सरकार का दायित्व था और समझदारी भी। अगर सरकार को यह लग रहा था कि बनारस की बनावट में खराबी है और लोगों की जरूरत पूरी नहीं हो पा रही है। मगर सरकार अक्सर बे सिर सोचती है। उसकी सोच में सबसे पहले उसे अपना भला पूरा करने की ललक रहती है।

बनारस दुनिया का पहला शहर है जहां खुदाई हो ही नहीं सकती। इसकी दो वजहें हैं एक, यह कुंडों का शहर है पूरे शहर में जो सात कुंड हैं (अब तो कुछ पट रहे हैं,) एक दूसरे से अंदर ही अंदर जुड़े हैं। प्राचीन काल मे इन कुंडों के ही पानी का प्रयोग होता था। जब भी खुदाई होगी गच्चा मिलेगा ही। शहर के ऊपर अतिरिक्त भार नहीं डाल सकते,जमीन नीचे जाएगी ही। बनारस गलियों का शहर है चौड़ी सड़कों का नहीं। यहां भारी वाहन या चार चक्का प्रतिबंधित होना चाहिए। और भी बहुत से कारक तत्व हैं जिन्हें समझे बगैर शहर पर हाथ नहीं उठाना था।

काशी हादसे का मुख्य अपराधी उत्तरप्रदेश का उप मुख्यमंत्री केशव मौर्या है-

सपा सरकार के कार्यकाल में राजन मित्तल नाम के एक अधिकारी को उसके ‘‘काले कारनामे’’ और भ्रष्टाचार के कारण यूपी ब्रिज काॅरपोरेशन से अखिलेश यादव ने मुअत्तल कर दिया था। और उस पर जांच चल रही थी कि सरकार बदल गयी और भाजपा सरकार में योगी जी के साथ केशव मौर्या को ताल तिकड़म से उपमुख्यमंत्री का ओहदा मिला साथ मे सार्वजनिक निर्माण मंत्रालय। मंत्रालय मिलते ही राजन मित्तल साफ शफ्फाक हो गए और एवज में एक नहीं दो विभाग के जीएम बना दिये गए। यूपी ब्रिज काॅरपोरेशन के एमडी के साथ-साथ निर्माण विभाग भी सौंप दिया गया। तुर्रा यह कि प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र काशी में चल रहे अनेक फलदायी योजनाओं की जिम्मेदारी भी मित्तल ही को मिली। योगी साहब सकते में हैं, अगर जांच चलती है तो केशव और मित्तल की जोड़ी ने ठेके और पोस्टिंग में जो करतब दिखाए हैं वो अकूत दौलत तक पहुंचायेगी। ध्यान रहे केशव पुराने ठेकेदार हैं। 

अब फैसले ‘‘ऊपर’’ होने लगे हैं, और वह किसी न किसी हादसे के रूप में ऊपर से भेजा जाता है। इसे कहते हैं ‘‘दैविक संदेश’’। कोलकाता में फ्लाईओवर गिर गया कई जाने गईं। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे दैविक संदेश बताते हुए कहा था यह दैविक संदेश है तृणमूल के लिए। इसे कहते हैं एंटायर पोलिटिकल साइंस। यह दो या दो से अधिक ग्रहों पर घटित होने वाली घटनाओं का विश्लेषण करता है। काशी हादसा पर क्या संदेश आया? बाचना बाकी है। 

                                 (समाजवादी पृष्ठभूमि के चंचल चित्रकार और पत्रकार हैं। आजकल जौनुपर स्थित अपने गांव में रहते हैं।)




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