कश्मीर किसका और कश्मीरी किसके!

मुद्दा , , बुधवार , 20-02-2019


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अंबरीश कुमार

हम कश्मीर के जिस भूगोल के लिए लड़ रहे हैं उसका इतिहास बदल रहा है कश्मीर के हालात कभी इतने नहीं बिगड़े थे ज्यादातर कश्मीरी नौजवानों को आतंकवादियों ने भटका कर आतंक के रास्ते पर धकेल दिया है वे नारा लगाते हैं ,वे पत्थर फेंकते हैं , वे आजादी मांगते हैं ,हर हफ्ते जुमे के दिन वे गुमराह हैं इसमें कोई शक नहीं पर बगल के पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के लोगों की बदहाली नहीं देख पाते उनके पीछे पकिस्तान है ,आतंकवादी संगठन हैं पर कश्मीर की अवाम के पीछे हम क्यों नहीं हैं ? ऐसी धारणा क्यों बन गई है नौजवान पीढ़ी से संवाद कोई सार्थक पहल हाल के वर्षों में दिखाई भी नहीं पड़ी

यह दुर्भाग्यपूर्ण हैअस्सी के दशक में पहली बार जब कश्मीर गया तो श्रीनगर के डाउन टाउन के हब्बा कदल में अपने कश्मीरी पंडित राजा कौल के घर रुका था वह भी दस दिन तक क्योंकि भारी बर्फ़बारी के चलते रास्ता बंद हो गया था रोज शाम लाल चौक के पुराने काफी हाउस में बैठना होता चर्चा होती और घूमना भी होता तब आतंकवाद का दौर नहीं था पर अलगाव का संकेत मिलने लगा था कश्मीरी लोगों से खासकर घाटी के लोगों से तभी मुलाकात हुई पिछली बार जब कश्मीर के दौरे पर गया तो उसके चार दिन बाद ही कश्मीरी उग्रवादी वानी मारा गया और हालात बिगड़ने लगे इस दौरे में डाउन टाउन तो गया पर कश्मीरी पंडितों के उजाड़ जले हुए घर देखने

उस घर को देखने भी जिसमें कभी ठहरा था इससे पहले शुक्रवार पत्रिका में माजिद जहांगीर से कवर स्टोरी भी कराई थी पर यह दौर आतंकवाद का था इस दौर में भी गुलमर्ग ,खिलनमर्ग आदि जगहों पर जाना हुआ सैलानी आने लगे थे और लोगों को कुछ आमदनी भी होने लगी थी पर एक खौफ था

गुलमर्ग जाते हुए बड़ी शानदार कोठियां भी दिखीं एक तबका बहुत गरीब नजर आया तो कुछ लोगों की संपन्नता बढ़ी भी वरिष्ठ पत्रकारों से बात भी हुई उनका मानना था नौजवानों को भरोसे में लिए बिना कश्मीर में कुछ होने वाला नहीं है वर्षों से सेना है पर हालात तो बिगड़ते ही गए हैं पकिस्तान की शह से कई आतंकवादी संगठन कश्मीर में नौजवानों को बरगला रहे हैं ,भड़का रहे हैं पर राजनैतिक दल क्या कर रहे हैं

अब इन हालात में हमें कश्मीर के साथ क्या कश्मीरी अवाम के बारे में नहीं सोचना चाहिए रास्ता संवाद से निकलेगा या बंदूक से ? कश्मीर हमारा अभिन्न अंग है ,कश्मीरी भी उसमें हैं या नहीं कभी श्रीनगर के डाउन टाउन में जाकर देखें अगर संभव हो तो बातचीत करें हालात बहुत गंभीर हैं नब्बे के दशक में हालात किसने बिगाड़े चुनाव में धांधली कर जनमत को ठिकाने लगाया गया होता तो राजनैतिक प्रक्रिया ठप हुई होती कांग्रेस से लेकर नेशनल कांफ्रेंस तक दोषी हैं इतिहास पर ज्यादा जोर देने से अब कुछ नहीं होगा भूगोल बचाना है तो कश्मीरी अवाम को भी बचाना होगा भाजपा और पीडीपी की सरकार बनी तो भी उम्मीद हुई लेकिन वह भी प्रयोग नाकाम रहा कश्मीरी पंडित किस तरह इन हालात में लौट सकते हैं जब सुरक्षा बल के जवान ही सुरक्षित नहीं हैं

पर इस सबके बावजूद राजनैतिक पहल से ही रास्ता निकलेगा। सभी दलों को ,समाज को यह बताना पड़ेगा कि आखिर रास्ता क्या हो। कश्मीरी पंडित भी बताएं ,जो हुआ वह हुआ अब रास्ता क्या है। क्या नए सिरे से कश्मीरी अवाम से संवाद नहीं होना चाहिए ? सेना तो वहां है ही ,पर सेना कोई स्थाई विकल्प कभी नहीं होती। साथ ही कश्मीर में विकास ,शिक्षा ,रोजगार आदि के बारे में भी सोचना चाहिए। 

(अंबरीश कुमार शुक्रवार के संपादक हैं और इंडियन एक्सप्रेस समूह से 26 सालों तक जुड़े रहे हैं।)







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