कठुआ बनाम सासाराम की बहस खड़ी करने वाले दरअसल बलात्कारियों के समर्थक हैं!

बेबाक , विचार-विश्लेषण, सोमवार , 16-04-2018


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मुकुल सरल

सावधान दोस्तो! जो लोग भी कठुआ बनाम सासाराम की बहस खड़ी करना चाहते हैं, दरअसल वे न कठुआ के लिए न्याय चाहते हैं न सासाराम के लिए। इन्हें बस हिन्दू-मुसलमान के नाम पर मुद्दे को बदलना है, लोगों को लड़ाना है, अपराधियों को बचाना है। ये लोग बहुत शातिर और धूर्त हैं। एक तरह से ये बलात्कार और बलात्कारियों के समर्थक ही हैं। खुद इन्हें बलात्कारी भी कहा जाए तो कुछ ग़लत न होगा। 

हालांकि ऐसे लोगों को समझाना मुश्किल है (सफाई देने की तो बिल्कुल ज़रूरत नहीं) लेकिन इनके झूठ का पर्दाफ़ाश करना ज़रूरी है, ऐसे लोगों से पूछा जाना चाहिए कि उन्नाव की पीड़िता कौन है? हिन्दू या मुसलमान? देश में शुरू हुए आंदोलन में “जस्टिस फॉर आसिफ़ा” के साथ “जस्टिस फॉर उन्नाव” का भी नारा लगा और अब इसमें सूरत भी जुड़ गया है। जबकि अभी तो सूरत की बच्ची के बारे में यह तक पता नहीं चला कि वो कौन है, किसकी बच्ची है। सोशल मीडिया पर तो इन सबके साथ “जस्टिस फॉर ऑल” का हैशटैग भी चला। 

आज सुबह जब मैंने फेसबुक पर ही ग्रेटर नोएडा-आगरा यमुना एक्सप्रेस वे पर गैंगरेप की खबर शेयर करते हुए लिखा कि:- 

“उफ! क्या किया जाए?

...आप एक आसिफ़ा, एक उन्नाव के लिए इंसाफ़ की मांग को लेकर जब तक सड़कों पर उतरते हैं तब तक एक और सूरत, एक और नोएडा, एक और दिल्ली हो जाता है।”

तो मेरे एक पत्रकार मित्र ने कहा कि मैंने सासाराम और असम का जिक्र नहीं किया। ऐसा नहीं कि ये पत्रकार महोदय मेरे लिखे की चिंता या समय की भयावता को नहीं समझ रहे होंगे बल्कि वे जानबूझकर इसमें हिन्दू-मुस्लिम और कांग्रेस-बीजेपी का तड़का लगाना चाहते थे। ताकि सही सवाल को बदला जा सके। बहस को गुमराह किया जा सके। इसी तरह एक अन्य पत्रकार साथी ने कठुआ बनाम सासाराम करते हुए एक तस्वीर पोस्ट की।

इन लोगों को कोई कैसे समझाए कि यह बहस और ख़तरा हिन्दू-मुस्लिम और बीजेपी-कांग्रेस से बहुत आगे जा चुका है। 

जो लोग कह रहे हैं कि विरोध आंदोलन सलेक्टिव होते हैं, ये सब मोदी और बीजेपी को बदनाम करने के लिए किया जा रहा है, उनसे पूछना चाहिए कि निर्भया के आंदोलन के समय किसकी सरकार थी? बीजेपी की या कांग्रेस की? मोदी की या मनमोहन की?

क्या उस समय सरकार की ईंट से ईंट नहीं बजाई गई थी। उस समय का आंदोलन तो आसिफा और उन्नाव से भी बड़ा था। राष्ट्रपति भवन तक को घेर लिया गया था उस समय। 

क्या निर्भया कांड के समय किसी ने सरकार या बलात्कारियों को बचाने का प्रयास किया था! क्या उस समय संसद में हंगामा नहीं हुआ था। क्या उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को शर्मिंदा नहीं होना पड़ा था। उस समय तो मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी निर्भया का शव देखने भी गए थे। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को आंदोलनकारियों के बीच जंतर-मंतर जाना पड़ा था जहां उन्हें आंदोलनकारियों ने खूब खरी-खोटी सुनाई थी। क्या उस समय किसी ने हिन्दू-मुसलमान या कांग्रेस-बीजेपी का मुद्दा उठाया था। नहीं।

इसी तरह हिमाचल का गुड़िया कांड। 2017 में हुए गुड़िया के बलात्कार और हत्या के मामले ने वहां न केवल तत्कालीन कांग्रेस सरकार को हिला दिया बल्कि ये विधानसभा चुनाव में एक बड़ा मुद्दा बना और कहा जाता है कि वीरभद्र सिंह की हार में एक बड़ा कारण ये मुद्दा भी रहा। 

इतना ही नहीं जब-जब किसी राजनेता या अन्य प्रभावशाली व्यक्ति ने बलात्कार या महिलाओं के संबंध में बेतुका बयान दिया तो क्या उनकी आलोचना और भर्त्सना नहीं हुई। बीजेपी नेताओं को ही नहीं, मुलायम सिंह, आज़म ख़ान यहां तक की प्रगतिशील कहे जाने वाले शरद यादव तक को नहीं बख़्शा गया। 

और जहां तक देशव्यापी आंदोलन का सवाल है तो हमें यह भी जान लेना चाहिए कि हर जगह पहले स्थानीय तौर पर आंदोलन शुरू होता है फिर वो बाद में राष्ट्रीय स्तर का आंदोलन बनता है। कठुआ में आज से नहीं जनवरी से आंदोलन चल रहा है। उन्नाव की पीड़िता भी आज से नहीं पिछले साल जून से इंसाफ के लिए लड़ रही है। 

कठुआ में अगर बलात्कारियों के पक्ष में हिन्दू एकता मंच का जुलूस न निकला होता और वकील पुलिस को कोर्ट में चार्जशीट दाखिल करने से न रोकते तो शायद आज भी उसके लिए दिल्ली में लोग सड़कों पर नहीं उतरते। इसी तरह अगर उन्नाव की पीड़िता मुख्यमंत्री आवास पर आत्महत्या का प्रयास न करती और उनके पिता की पुलिस हिरासत में मौत न होती तो ये मुद्दा भी राष्ट्रीय स्तर पर संज्ञान में न आया होता। 

इसलिए मैं कहता हूं कि जहां कहीं भी अपराध हो, बलात्कार हो वहां लोग पूरी मज़बूती से खड़े होइए, फिर देखिए धीरे-धीरे पूरा देश आपकी आवाज़ में आवाज़ मिलाते हुए उस लड़ाई में शामिल हो जाएगा।

और सबसे बड़ी बात ये कि जहां भी धर्म या तिरंगे की आड़ में बलात्कारियों को बचाने की कोशिश की जाएगी, जहां भी सत्ताधारी अपराध में शामिल होंगे या अपराधियों को बचाने की कोशिश करेंगे उस मामले को अन्य सभी मामलों से ज़्यादा ज़ोर से, ज़्यादा मज़बूती से उठाए जाने की ज़रूरत है। उन्नाव और कठुआ के मामले में यही हुआ है इसलिए यह हम सबको ज़्यादा बेचैन करता है, ज़्यादा डराता है।








Tagकठुआ आसिफ़ा उन्नाव सासाराम इंसाफ

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