होटल बिक्री मामले में जारी है अजीबोगरीब खेल; लालू पर शिकंजा लेकिन अफसर अछूते

विवाद , नई दिल्ली, सोमवार , 19-03-2018


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। राजद प्रमुख और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव इस समय जेल में हैं। चारा घोटाले में संलिप्तता के चलते उनको सजा सुनाई गयी है। लेकिन पिछले साल उन पर रेल मंत्री रहते हुए नियम-कानून को ताख पर रखकर रेलवे के रांची और पुरी स्थित दो होटलों को एक निजी कंपनी को बेचने और उसके एवज में पटना में प्राइम लोकेशन पर जमीन लेने का आरोप लगा। मामला बहुत चर्चित हुआ। लालू के आवास पर सीबीआई ने ताबड़तोड़ छापे मारे। 

सीबीआई ने इस मामले में लालू और उनके परिजनों पर एफआईआर दर्ज किया है। इस मामले में सीबीआई के आर्थिक अपराध शाखा ने अपने कानूनी विंग की सलाह को दरकिनार कर दिया। सीबीआई के कानूनी विंग का मानना है कि रेल मंत्री रहते हुए लालू प्रसाद यादव पर कोई मामला नहीं बनता है। सीबीआई ने आपराधिक षड्यंत्र, धोखाधड़ी और आपराधिक कदाचार के इस मामले में लालू प्रसाद, उनकी पत्नी राबड़ी देवी, उनके बेटे तेजस्वी यादव, डिलाईट मार्केटिंग कंपनी प्राइवेट लिमिटेड के सरला गुप्ता (प्रेमचंद गुप्ता की पत्नी), विजय कोचर और विनय कोचर (निदेशक सुजाता होटल प्राइवेट लिमिटेड), मैसर्स लारा प्रोजेक्ट्स एलएलपी और आईआरसीटीसी के तत्कालीन प्रबंध निदेशक पीके गोयल पर मुकदमा दायर किया। सीबाआई ने जहां लालू और उनके परिजनों पर मुकदमा लादने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी है वहीं आईआरसीटीसी के दो वरिष्ठ अधिकारियों का नाम इससे हटा दिया।

सीबीआई के आर्थिक अपराध विभाग ने पूछताछ के लिए जो सूची बनाई थी उसमें से दो आईआरसीटीसी अधिकारियों में से एक का नाम तो पूछताछ के पहले ही निकाल दिया। जबकि इस मामले में मुख्य भूमिका निभाने वाले आईआरसीटीसी निदेशक (पर्यटन), राकेश सक्सेना से भी पूछताछ करने की जहमत नहीं उठाई। सूत्रों का कहना है कि राकेश सक्सेना ने ही रांची और पुरी के होटलों को रखरखाव और प्रबंध के लिए कोचर बंधुओं के सुजाता होटल प्राइवेट लिमिटेड को सार्वजनिक एवं निजी साझेदारी के तहत देने का प्रस्ताव दिया था।   

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या लालू प्रसाद यादव किसी गहरे साजिश के शिकार हुए हैं? सीबाआई का कानूनी विंग जब इस मामले में लालू प्रसाद की सीधे कोई भूमिका नहीं देखता है तो आखिर मामला क्या है? साजिश करने वाला कौन है? इसके जवाब के लिए हमें एक साल पीछे जाकर बिहार की राजनीतिक स्थिति पर नजर दौड़ानी होगी। 

दरअसल, बिहार में आरजेडी-जेडीयू के महागठबंधन की सरकार बीजेपी के लिए किरकिरी साबित हो रही थी। लाख कोशिशों के बावजूद आरजेडी-जेडीयू गठबंधन में दरार नहीं आ रही थी। लालू प्रसाद यादव के चारा घोटाले में संलिप्तता और सजा के बावजूद भी महागठबंधन सरकार पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। ऐसे में केंद्र सरकार के इशारे पर सीबीआई ने एक नया मुद्दा उछाला। सीबीआई का दावा है कि रेल मंत्री रहते हुए लालू प्रसाद ने 2006 में रेलवे के दो होटलों का निजीकरण के नाम पर अपनी चहेती कंपनी को औने-पौने दामों पर बेच दिया। इसके बदले उक्त कंपनी ने लालू को पटना में बेशकीमती जमीन खरीद कर दी। 

जुलाई 2006 में, सक्सेना ने सिफारिश की कि होटल को ऐसे किसी निजी फर्मों को सौंप दिया जाए जिसका पिछले तीन वर्षों में सालाना 5 करोड़ रुपये का न्यूनतम कारोबार हो। तीन वर्ष तक उस कंपनी का 2 करोड़ रुपये की नेट वर्थ  और पिछले पांच वित्तीय वर्षों में कम से कम एक दो सितारा होटल को चलाने का अनुभव हो। निविदा के मानदंडों को तत्कालीन आईआरसीटीसी के प्रबंध निदेशक गोयल ने मंजूरी दी  थी।

लेकिन इन होटलों के लिए एक निविदा नोटिस जारी करने से पहले, पर्यटन विभाग के सक्सेना ने अक्टूबर 2006 में मानकों को कम कर दिया। अब न्यूनतम कारोबार का मानदंड 5 करोड़ रुपये से कम होकर 3 करोड़ रुपये हो गया है और नेट वर्थ 2 करोड़ रुपये से 1 करोड़ रुपये हो गया है। इसे  भी गोयल ने तुरंत मंजूरी दे दी थी। इन होटलों के लिए निजी क्षेत्र की कंपनियों को आमंत्रित करने के लिए कोई विज्ञापन नहीं जारी किया गया था। लेकिन 24 नवंबर 2006 को रेल रत्ना बजट होटल के एक अलग सेट के लिए एक निविदा सूचना से बिक्री शुरू हुई थी।

इन होटलों के लिए पात्रता शर्तें नौ दिनों बाद एक विज्ञापन के माध्यम से आईं, जो निविदा दस्तावेज खरीदने की आखिरी तारीख 30 नवंबर को तय की गई थी। लेकिन समय सीमा समाप्त होने से पहले, सक्सेना ने पात्रता शर्तों के संशोधन के लिए एक नोट शुरू किया। 13 नवंबर, 2006 को उन्होंने पिछले पांच सालों के मानक को कम करने का प्रस्ताव किया। सुजाता होटल प्राइवेट लिमिटेड द्वारा प्रस्तुत किए गए बोली दस्तावेजों के सीबीआई विश्लेषण से पता चला है कि यह 3 नवंबर को घोषित पूर्व शर्तों के अनुसार निविदा के लिए पात्र नहीं था क्योंकि ‘‘पिछले चार सालों में इसके पास दो स्टार होटल चलाने का अनुभव नहीं था। यहां यह देखने में आता है कि टेंडर प्रक्रिया के दौरान ‘‘आईआरसीटीसी के अधिकारी सुजाता होटल के पक्ष में हो गए।  

5 जुलाई, 2017 को सीबीआई के कानूनी विंग ने आरोपी की सूची में गोयल का नाम बरकरार रखा, लेकिन सक्सेना को छोड़ दिया। सीबीआई ने इसका कोई कारण नहीं बताया। सक्सेना दिल्ली में विभागीय रेलवे प्रबंधक बन गए, जहां वह 2009 तक रहे। 2013 में, वह मुंबई रेलवे विकास निगम के प्रबंध निदेशक बने, जहां से वो 2015 में सेवानिवृत्त हुए।

   


 










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