70 सालों के भ्रष्टाचार के लालू अकेले दोषी!

राजनीति , , बृहस्पतिवार , 11-01-2018


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वीना

किसी भी लूट को जनता किस तरह देखती है। कोई भी लूट कैसे सही-ग़लत, ठहराई जाती है। अगर गड़बड़ियां पकड़ में नहीं आईं तो क्या कुछ ग़लत हुआ ही नहीं? 

यदि दो गुनाहगारों ने आपसी सहमति से एक-दूसरे का गुनाह छुपा लिया तो क्या वो गुनहगार नहीं हैं? अगर किसी कर्म को गुनाह की श्रेणी में रखा जाता है और वो गुनाह किया गया है। तो ज़ाहिर है कोई गुनहगार भी होगा। 

मुनाफा होना चाहिये पर घाटा हो रहा है। मगर इस घाटे में कोई धांधली नज़र नहीं आती। नज़र नहीं आती या कोई देखना नहीं चाहता। हमारे देश में रेल व्यवस्था एक ऐसी व्यवस्था है जो ग़रीब से ग़रीब और अमीर से अमीर के नफे-नुकसान से जुड़ी हुई है। गरीब उसे एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए इस्तेमाल करता है। और अंबानी सरीखा अपनी माल ढुलाई के लिए। फिर भी रेलवे घाटे का सौदा है। आखि़र क्यों? 

अब जबकि गरीब से रेल यात्रियों से जी भर किराया वसूला जा रहा है। तब भी रेल घाटे में है क्यों?  सवाल दर सवाल। जवाब नदारद। 

लालू प्रसाद ने जो गरीब रथ चलाई थी उसका शुरुआती किराया करीब 650 रुपये था। आज वही टिकट साधारण खिड़की पर 1 हजार से ज़्यादा का है। लोगों का कहना है कि लालू के समय में इस ट्रेन में 4 सौ तक वेटिंग क्लियर हो जाया करती थी। जबकि आज 4 भी मुश्किल है। जितने भी टिकट खरीदे जाते थे लालू आखि़र में डिब्बे जोड़ कर सबको मात्र 650 रूपये में ही उसकी यात्रा करा देते थे। ऐसा शायद ही होता हो कि किसी ने टिकट करवाया और उसे जगह न मिली हो। आज महीनों पहले भी वेटिंग मिलती है। जो 2-4 वेटिंग होने पर भी क्लीयर नहीं हो सकती है। 

हां, तत्काल प्रीमियम, सुपर प्रीमियम में 2 हज़ार से 2800 रुपये आप खर्च कर सकते हैं तो आखि़री घड़ी में भी आपका स्वागत है। यानि राजधानी का किराया गरीब रथ में वसूला जा रहा है। 

सुना है टिकट एजेंट या किसी को भी हज़ार रूपये का 2800 वसूलने की पोल न खोलने की धमकी दी गई है। ताकि जन विरोध से बचा जा सके। लालू की गरीब रथ के मुकाबले भाजपा के सुरेश प्रभु ने आनंद विहार टर्मिनल से गोरखपुर तक हमसफर रेल शुरू की है। जिसमें पहले आओ सस्ता पाओ के आधार पर टिकट दिया जा रहा है। पहले 50 प्रतिशत टिकट की कुल क़ीमत 1165 रुपए है। 50 प्रतिशत सीटों की बुकिंग के बाद बेस फेयर में 10 प्रतिशत का इजाफा होगा और कुल किराया बढ़कर 1268 रुपए हो जाएगा। आखिरी 10 प्रतिशत बची सीटों पर यह किराया बढ़ते हुए 1656 रुपए तक पहुंचेगा। खाना, बेडिंग और बाक़ी सर्विस चार्ज अलग से। इसी तर्ज पर अब सभी ट्रेनों के तत्काल टिकट काटे जा रहे हैं। पर रेल की तिजोरी है कि फिर भी खाली की खाली। 

रेलवे के जीवन में ये शायद पहला और आख़िरी मौक़ा था जब बग़ैर किराया बढ़े, लालू प्रसाद यादव ने अपने रेलमंत्री कार्यकाल में न केवल घाटा नहीं होने दिया बल्कि हर साल 20-22 हज़ार करोड़ मुनाफा कमा कर भी दिया। 

लालू द्वारा रेलवे के प्रबंधन में मूलभूत परिवर्तन किए गए। जैसे माल भाड़ा की 500 पन्नों की जटिल सूची को एक पन्ना कर आसान बना दिया गया। ताकि अलग-अलग वर्ग के माल भाड़े के बहाने होने वाली चोरी को रोका जा सके। भाड़े की ढुलाई में निजीकरण भी इस तरह से किया गया जिससे ढुलाई में होने वाली बड़ी चोरी रोकी जा सके। मालगाड़ी और पैसेंजर दोनों ट्रेनों के डब्बे बढ़ा दिए गए। स्लीपर गाड़ियों में खिड़की की तरफ एक सोने वाली सीट लगवा दी गई ताकि सीटों की संख्या बढ़ जाए। रेलवे को फायदा पहुंचाने वाले और भी बहुत से ऐसे कदम उठाए गए जिनके बारे में पहले कभी नहीं सोचा गया। 

रेलमंत्री के रूप में एक चरवाहे के बेटे लालू ने अच्छे-अच्छे मैनेजमेंट गुरुओं को पाठ पढ़ा दिया था। जिसके लिए लालू प्रसाद यादव को पूरी दुनिया ने सम्मान दिया। 

लालू के बाद रेलवे का फिर घाटे के गड्ढे में लुढ़क जाना एक ये सवाल भी उठाता है कि सत्ता परिवर्तन होने से एक काबिल व्यक्ति को हटाकर किसी अन्य को लाकर घाटा करवाना क्या देश का घाटा नहीं है? लालू ने जो हर साल 20 हज़ार करोड़ का मुनाफा दिया था उसको गंवाने का हर्जाना किसके हिस्से आना चाहिये? 

जनता ये घाटा क्यों सहे? 

और क्यों न नुकसान के नाम पर हज़ारों करोड़ का चूना देश को लगाने के लिए इसे सोच-समझकर किए गए घोटाले-भ्रष्टाचार की श्रेणी में रखा जाए। लालू के हटने के बाद टू जी घोटाले की तर्ज पर 20 हज़ार करोड़ सालाना के हिसाब से अब तक कितने हज़ार करोड़ का घोटाला किया जा चुका है इसकी जांच कब होगी? 

आज रेलवे का किराया भरना निम्न मध्यम वर्ग के लिए भी मुसीबत बन गया है। उस पर भी सीटों की मारा-मारी। दिनों-दिन बढ़ते किराए ने आम मेहनतकश मज़दूर का तो देश में एक जगह से दूसरी जगह जाने का मूलभूत अधिकार ही छीन लिया है। जी हां, आपको आज़ादी है कहीं भी जाने की। पर कम खर्च में भारतीय रेल आपको कहीं पहुंचा दे ऐसी ग़लतफहमी मत पालिये। 

लालू ने न किराया बढ़ाया और न ही रेल कर्मचारियों की संख्या कम की बल्कि रेलवे को होने वाले मुनाफे में से कर्मचारियों को हिस्सा भी दिया। बावजूद इसके हमेशा से घाटे में चली आ रही रेलवे में नामुमकिन माना जाने वाला मुनाफा कर दिखाया।

आखि़र लालू कर क्या रहे थे! क्या उन्हें कोई अलादीन का चिराग मिल गया था, जिसे घिस-घिसकर वो घाटा भी पूरा कर रहे थे और लोगों की मंगल यात्राएं भी करवा रहे थे। साथ ही बचत भी कर रहे थे। 

और ये चिराग़, बाक़ी लोगों के पास नहीं है इसलिए लालू को छोड़कर भूत-वर्तमान के सभी रेलमंत्री घाटे के दानव के आगे बेबस हैं। या फिर रेलवे बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार, अव्यवस्थाओं और अनियमितताओं का अड्डा है। 

लालू की रेल व्यवस्था 100 प्रतिशत ईमानदारी से की गई थी या ईमानदारी और योजनाबद्ध तरीके़ से रेलवे की सही ताकत को पहचान कर लालू ने उसका भरपूर फायदा सब तक पहुंचाया। सरकार, रेल कर्मचारियों, रेलवे के सहारे स्व रोज़गार चलाने वाले लाखों लोगों-कुलियों और आम जनता सहित सबको। फिर आखि़र क्यों नहीं, लालू प्रसाद यादव के पहले और बाद के समय में रेलवे में होने वाले घाटों की जांच न करवाई जाए? 

लालू पर ये आरोप भी लगे कि रेलमंत्री रहते हुए उन्होंने रेलवे की ज़मीन और होटलों को लीज़ पर देने के लिए निजी होटल कंपनी को फ़ायदा पहुंचाया। इसमें नियमों का ध्यान नहीं रखा गया। हालांकि लालू यादव ने इन आरोपों का खंडन किया है। फिर भी अगर मान भी लिया जाए कि लालू ने रेलवे में घोटाले किए थे। बावजूद इन घोटालों के उन्होंने फिर भी हज़ारों करोड़ की बचत करके दी! 

लालू के अलावा बाक़ी रेलमंत्री जो लालू से पहले रहे या उनके बाद आए और वर्तमान में हैं उन्होंने रेलवे को घाटे और आम नागरिकों को परेशानी के अलावा कुछ नहीं दिया। 

बावजूद इसके उन पर कोई आरोप नहीं है। यानि वो हर हालत में ईमानदार हैं। सवाल ये उठता है कि इन ईमानदार लोगों की सरपरस्ती में फिर रेलवे घाटे में क्यों है? क्यों इसकी जांच नहीं होती। ममता बनर्जी ने लालू पर आरोप लगाया था कि उन्होंने 80 हज़ार करोड़ का मुनाफा दिखाया है जबकि मुनाफा केवल 40 हज़ार करोड़ का है। 

यहां 40 हज़ार करोड़ का मुनाफा मानने वाली ममता ने वो सरप्लस 40 हज़ार करोड़ कहां, कैसे गंवाया? मुनाफे को घाटे में कैसे पहुंचाया? ये सवाल आजतक न सीएजी ने उठाए हैं और न ही किसी और ने। क्यों?

यहां सवाल ये नहीं है कि लालू की चोरी को क्यों चोरी न कहा जाए। अगर लालू ने कानून की निगाह में कोई गुनाह किया है तो उन्हें उसकी सज़ा मिलनी चाहिये। मग़र बाक़ी चोरों को क्यों बख्शा जाए? या बख्शा जा रहा है।

आज देश में लालू के खिलाफ शिकंजा देख कर लग रहा है कि जैसे आज़ादी के 70 साल में सिर्फ बिहार मे ही नहीं पूरे देशभर में जितने भी भ्रष्टाचार हुए हैं सब लालू ने किए हैं। बाक़ी सब दूध के धुले हैं। 

सीबीआई, सीआईडी, अदालतें कुछ इस तत्परता से लालू के पीछे पड़ी हैं जैसे कि उन्हें पूरा भरोसा है कि लालू के जेल पहुंचते ही देश फिर सोने की चिड़िया बनने के अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेगा।

बाक़ी महकमे छोड़िये लालू के चारा घोटाले से फुरसत मिले तो देशहित में केवल छुकछुक गाड़ी के बाक़ी रेलमंत्रियों का दरवाज़ा भी अपनी जांच ऐजेंसियों को दिखा दीजिये ईमानदार मोदी सरकार। यक़ीन मानिये आपका विकास और रोज़गार का वादा कुछ कदम आगे बढ़ जाएगा। और ग़रीबों का देश भ्रमण का अधिकार भी सुरक्षित हो जाएगा। 

(वीना पत्रकार और फिल्मकार हैं।)






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