जस्टिस लोया मामला: बुझ गया उम्मीदों का आखिरी चिराग !

विशेष , नई दिल्ली , मंगलवार , 28-11-2017


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जनचौक ब्यूरो

नई दिल्ली। देश में दो मीडिया संस्थानों एनडीटीवी और इंडियन एक्सप्रेस ने अभी तक अपनी साख बचा कर रखी थी। सरकार की लाख कोशिशों के बाद भी ये झुकने के लिए तैयार नहीं दिख रहे थे। इंडियन एक्सप्रेस में शायद ऐसा उसके संपादक राजकमल झा के चलते था या फिर अपने सत्ता विरोधी पाठकों के दबाव की मजबूरी थी। लेकिन वो नहीं बदला। हालांकि मालिकान ने अपने हिंदी पेपर जनसत्ता को पहले ही संघ की गोद में दिया है। दूसरी तरफ लगता है कि एनडीटीवी के कर्ज का बोझ उस पर भारी पड़ रहा है। हालांकि उसके हिंदी चैनल में रवीश कुमार ने जरूर इस प्रकरण की कई पक्षों से चीर-फाड़ की थी। लेकिन आखिर में लगता है कि दोनों ने अपने-अपने कारणों से ही सही सरकार के सामने समर्पण कर दिया है। जस्टिस लोया की मौत से जुड़ी दोनों की खबरें इसका खुलकर बयान कर रही हैं। इस प्रकरण ने इन दो मीडिया संस्थानों की ही असलियत नहीं बतायी है बल्कि इसने उम्मीदों के आखिरी चिराग को भी बुझा दिया है। न्यायालय जिसे सत्य और न्याय की आखिरी पीठ मानी जाती है। वहां से भी झूठ, फरेब और तिकड़म की बू आ रही है।

सीबीआई जज लोया की संदिग्ध मौत पर ‘दि कारवां’ के बाद इंडियन एक्सप्रेस और एनडीटीवी ने भी स्टोरी की है। पहली नजर में किसी को भी ये अच्छी पहल लग सकती है। जब पूरे मीडिया में इस मामले को लेकर चुप्पी छायी हुई है तब इन दोनों ने इसको कवर करने की कोशिश की। चूंकि दोनों की साख रही है इसलिए लोगों ने उनकी रिपोर्ट को भी तवज्जो दी है। लेकिन प्रकाशित होने के कुछ समय बाद ही इनकी रिपोर्टों की असलियत सामने आ गयी। रिपोर्ट पढ़ने के बाद किसी के लिए ये समझना मुश्किल नहीं है कि दोनों के पीछे मकसद एक है। वो है कारवां की रिपोर्ट को खारिज करना और पूरे मामले पर लीपापोती कर देना। रिपोर्ट पढ़ने के बाद आंखमूंद कर कहा जा सकता है कि ये प्रायोजित स्टोरी हैं। और ऐसा लगता है कि इन पर दबाव डालकर कराया गया है। क्योंकि ऐसे समय में जबकि दूसरे मीडिया संस्थान भरोसे के लायक नहीं बचे हैं तब इनके जरिये लोया मामले पर सरकार अपने ऊपर बढ़ रहे दबाव को कम कर सकती है। 

बहुत सारी बातें और सवाल जो इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट से उठते हैं उन्हें जनचौक में पहले ही दिया जा चुका है। यह लेख खासकर दो बिंदुओं पर केंद्रित करने के मकसद से लिखा जा रहा है। कारवां को जिन दो बिंदुओं पर तथ्यात्मक तौर पर गलत साबित करने की कोशिश की गयी है उसमें डांडे अस्पताल में ईसीजी और गेस्ट हाउस से लोया को अस्पताल ले जाने का साधन प्रमुख है। जज भी इस तरह से गलतबयानी कर सकते हैं इस रिपोर्ट ने पहली बार साबित किया है। मसलन इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दोनों जजों के हवाले से बताया गया है कि दिल के दौरे के बाद वो अपनी कार में लिटाकर लोया को गेस्ट हाउस से अस्पताल ले गए थे। लेकिन इस मामले में एनडीटीवी की रिपोर्ट का कहना है कि उसके संवाददाताओं ने गेस्ट हाउस के कर्मचारियों से मुलाकात की और उनसे पूछा कि आखिर लोया को आटो रिक्शा से क्यों ले जाना पड़ा? कर्मचारियों ने अपना नाम गुप्त रखने की शर्त पर बताया कि लोया की उस यात्रा के लिए कोई कार निर्धारित नहीं की गयी थी (ये भी एक बड़ा सवाल है। क्योंकि प्रोटोकाल के हिसाब से उन्हें गाड़ी मिलनी चाहिए थी। बाकी दोनों जज अपनी गाड़ी की बात कर रहे हैं जबकि लोया के पास उनकी अपनी कोई गाड़ी नहीं थी।) और न ही रवि भवन (गेस्ट हाउस जहां लोया रुके थे) में इसके लिए कोई निर्धारित ड्राइवर ही है। अब इसमें किसको झूठा करार दिया जाए ये तो जांच का विषय है। लेकिन इस बात में कोई शक नहीं कि दोनों पक्ष अंतरविरोधी बातें कर रहे हैं। जिसमें कोई एक ही सही है।

जस्टिस भूषण गवई और जज सुनील शुकरे।

दूसरी सबसे अहम बात ईसीजी वाली है। इंडियन एक्सप्रेस ने बाकायदा ईसीजी की रिपोर्ट की प्रति जारी कर ये साबित करने की कोशिश की है कि डांडे अस्पताल में न केवल ईसीजी की सुविधा थी बल्कि लोया का वहां ईसीजी भी हुआ था। लेकिन जब जांच-पड़ताल की गयी तो पता चला कि वो ईसीजी 30 नवंबर की है (खुद उसी ईसीजी रिपोर्ट में लिखा गया है जो मशीन से जनरेटेड है।)। जबकि लोया का टेस्ट या इलाज एक दिसंबर की सुबह हुआ था। इससे ये साबित हो जाता है कि चीजों को और साफ करने की जगह उन्हें छुपाने की कोशिश की गयी है।

 






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