विपक्षी एकता और कांग्रेस से क्यों दूर भाग रहीं हैं मायावती

माहेश्वरी का मत , , बुधवार , 13-03-2019


mayawati-akhileshyadav-sp-bsp-congress-oppositionalience

अरुण माहेश्वरी

मोदी के ख़िलाफ़ विपक्ष की एकता अभी राजनीतिक चर्चा का एक प्रमुख विषय है। कुछ राज्यों की परिस्थिति साफ़ हो चुकी है। लेकिन मूलत: उत्तर प्रदेश का मामला उलझा हुआ होने से इसमें भारी असमंजस और आधा-अधूरापन दिखाई दे रहा है। मन में यह सवाल उठता है कि मायावती क्यों आगे बढ़-बढ़ के कांग्रेस के साथ कोई समझौता न करने की बातें कह रही है? इसमें राजनीति है या कोई दूसरी गैर-राजनीतिक बात, समझना मुश्किल है।

अब तक इतना तो साफ़ है कि मोदी के ख़िलाफ़ लड़ाई का नेतृत्व मायावती-अखिलेश के हाथ में नहीं है। पांच राज्यों में अपनी सरकारों के अलावा पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में समझौते के बाद इस लड़ाई के नेतृत्व में कांग्रेस स्थापित हो चुकी है। वामदल भी केरल में अपनी सरकार और पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा में अपनी मज़बूत स्थिति के चलते नई धर्म-निरपेक्ष सरकार के मज़बूत सहयोगी की भूमिका अदा करने के लिये तैयार दिखाई देने लगे हैं। इसीलिये मायावती के इस मत से उन्हें कोई ख़ास राजनीतिक लाभ शायद ही मिलेगा। फिर भी, उत्तर प्रदेश में पिछले उप-चुनावों के परिणामों से यह समझा जा सकता है कि उसे कांग्रेस को छोड़ कर चलने से सीटों के मामले में कोई नुक़सान नहीं होगा। 

फिर भी कह सकते हैं कि अभी की स्थिति का अंतिम परिणाम अस्पष्ट ही है। बीजेपी खुद इतना जान गई है कि उसका अब जीत कर आना असंभव हो चुका है। इसीलिये वह अपनी जीती हुई सीटों को छोड़ कर भी अन्य दलों से गठबंधन करने के लिये आकुल-व्याकुल है। कहना न होगा, यही यथार्थ विपक्ष के दलों पर उल्टे रूप में काम कर रहा है। 

बीजेपी के अपने सिर्फ पचीस प्रतिशत मत रह गये हैं। पिछले चुनाव में उसे मिले मतों में 10 प्रतिशत की निश्चित सार्विक गिरावट हुई है। इससे निकलने का उसके पास कोई उपाय नहीं है। मोदी के कार्यकाल का हर क़दम, बल्कि हर क्षण उसके ख़िलाफ़ काम कर रहा है। इसीलिये राष्ट्रवाद की तरह के वायवीय विषयों से वह सिर्फ अपना मन बहला रही है। उसकी पराजय को सुनिश्चित जान कर ही सभी विपक्षी दल उस नई परिस्थिति में अब अपने को देखने लगे हैं और अपनी रणनीतियां तैयार कर रहे हैं। इसीलिये आपस में इतनी ज़्यादा खींच-तान भी है।

इन सबके बीच देखना यह है कि जनता विपक्ष के चुनाव में किस प्रकार का निर्णय लेती है। हमारा अनुमान विगत कुछ सालों के चुनाव परिणामों पर टिका हुआ है। गुजरात के चुनाव के बाद के परिणामों पर। हमारे पास ज़मीनी सर्वेक्षण की कोई सुविधा नहीं है, लेकिन मोदी-विरोधी प्रबल जन-भावना को हम महसूस कर सकते हैं। मोदी का पूरा शासन काल जनता के सभी हिस्सों के लिये भारी सांसत से भरा काल रहा है। मोदी की कही हुई किसी भी बात पर लोगों को कोई यक़ीन नहीं रह गया है। लगातार झूठ बोलने की उनकी फ़ितरत ने ही बालाकोट आदि की तरह के मामलों में भी सरकार के दावों को संदेह के घेरे में खड़ा कर दिया है। मोदी जब विपक्ष को सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल उठाने के लिये लताड़ते हैं, तब उनकी तल्ख़ी ही यह बताने के लिये काफ़ी है कि वे आम लोगों को लताड़ रहे होते हैं। मोदी का तूफ़ानी प्रचार अभियान भाजपा की हालत को और ख़स्ता कर रहा है, क्योंकि उसका सब कुछ बदनाम मोदी के आसरे पर ही टिकता जा रहा है। 

दुर्भाग्य की बात यह है कि जो पेशेवर लोग अभी सर्वेक्षण की रिपोर्टें पेश कर रहे हैं, वे सच नहीं कह रहे हैं, वे सिर्फ मोदी-शाह की चाकरी कर रहे हैं। बहरहाल, इतना साफ़ है कि विपक्ष के बीच अंत तक जितनी भी एकता बनेगी, भाजपा की पराजय का स्वरूप उसी अनुपात में बड़ा होता जायेगा। मोदी की हार तय हो चुकी है। 

                  (अरुण माहेश्वरी लेखक स्तंभकार हैं और कोलकाता में रहते हैं।)










Leave your comment