अकबर के इस्तीफे तक सीमित नहीं रहेगा #MeToo अभियान

मुद्दा , नई दिल्ली, बुधवार , 17-10-2018


mjakbar-metoo-movement-sexual-harassment-resignation

जनचौक ब्यूरो

‘अकबर महान’ ने इस्तीफा दे दिया। महिलाओं को सलाम। लेकिन यह मत समझिए कि इस्तीफा नहीं देने का फैसला खुद अकबर का था। मोदीजी समेत पूरी बीजेपी चाहती थी कि वह इस्तीफा न हो। लेकिन अकबर के इस्तीफा न दिए जाने की जितनी तैयारी मोदी ने की थी वह सब असफल रही। क्योंकि मोदी-शाह-जेटली की जोड़ी इस बात को जानती थी कि अगर अकबर ने इस्तीफा दे दिया तो सारा फोकस राफेल पर हो जाएगा! राफेल से ध्यान भटकाने के लिए इसे इतना लंबा टाला गया, हांलाकि राफेल अब बस फाइटर विमान नहीं रह गया है, बल्कि बम हो गया है।

याद करने की कोशिश कीजिए कि बोफोर्स से ध्यान हटाने के लिए राजीव गांधी ने क्या-क्या नहीं किया था। फेयर फैक्स, स्विस बैंक, बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाना और यहां तक कि अपने चुनाव का प्रचार भी अयोध्या से शुरू करना!

लेकिन हुआ क्या? कोर्ट ने भले ही राजीव गांधी को बरी कर दिया है, जनता के दिलो-दिमाग में अभी भी बोफोर्स का घूस खत्म नहीं हुआ है।

एक बात और। मानसी सोनी को मत भूलिए। वही आर्किटेक्ट मानसी सोनी जिसका पीछा 'साहेब' अपने 'गुलाम' अमित शाह से करवा रहे थे। साहेब तब गुजरात के मुख्यमंत्री थे और शाह साहेब वहां के गृह राज्य मंत्री। अगर किसी के कहने पर या फिर खुद ही अगर मानसी सोनी मुंह खोल देगीं तो क्या साहेब को प्रधानसेवक के पद से इस्तीफा नहीं देना पड़ेगा? अकबर प्रधानसेवक के सबसे बड़ा कवच थे: राफेल में भी और मीटू में भी!

जितेंद्र कुमार

पहले क़ानूनी धमकी, फिर इस्तीफ़ा देने को मजबूर! "अकबरों" ने महसूस करना शुरू कर दिया है कि जो महिलायें बीस-पच्चीस बरस पहले उनकी हैसियत के मज़बूत बाज़ुओं में कसमसाकर रह जाने के लिये मजबूर-अभिशप्त कर दी गयी थीं, अब वो महिलायें अपनी "नागरिक हैसियत" को जताते हुए "अकबरों" को घुटने पर खड़ा कर देने की हालत में आ गयी हैं। शुरुआत उन महिलाओं की तरफ़ से हुई है, जिन्हें रूढ़िवादी सोच "अर्बन नक्सल" कहती है। इसका विस्तार अभी सकुचाहट और हिचकिचाहट की दीवार तोड़ने को बेताब "रूरल नक्सल" तक होना बाक़ी है। जिन्हें पहले विरोध की महज फुलझड़ी दिखी थी, उनको विरोध के समंदर का सामना करना अभी बाक़ी है। 

मर्दों की ताक़त से "शर्म-ओ-हया" और "इज़्ज़त" के तने हुए अभी कई तंबू उखड़ने बाक़ी हैं। संयोग से अकबर "पत्रकारिता और राजनीति" से ताल्लुक रखते हैं। मगर न्यायिक और शैक्षणिक जगत भी इन्हीं "मर्दों" की दुर्गन्ध से बजबजाते हैं। ये "मर्द" हर राजनीतिक पार्टियों, सभी धर्म-मज़हबों, कॉर्पोरेट्स, एजुकेशनल वर्ल्ड और शहर-गांवों में पाये जाने वाले "दुष्ट" जीव हैं। मी टू अभियान सही मायने में ऐसे ही "दुष्टों" की शिनाख़्त कर उन्हें बेपर्द कर देने वाला साहसी और सशक्त महिलाओं का आंदोलन है। अकबर का इस्तीफ़ा, हैसियत के दम पर कुछ भी छूट लेने और महिलाओं पर अपनी ताक़त आज़मा लेने के ख़िलाफ़ एक ज़ोरदार "लेडी सिविल डिसओबिडिएन्ट मूवमेंट" की पहली जीत है। ज़ुल्मों के ख़िलाफ़ लड़ती हर औरत और इन औरतों को मज़बूती देते हर तबके (मेल-ट्रांसजेंडर) को बधाई !!!

उपेंद्र चौधरी

अकबर ने इस्तीफ़ा तो 3 दिन पहले ही दे दिया था। लेकिन तब भाजपा को चूस रहे नेता मान रहे थे अगर इस्तीफ़ा स्वीकार किया तो कल पता नहीं कौन-कौन महिला क्या-क्या खोल देगी, इसलिये इस #MeToo को कुचल देने से संस्कार और परंपरा बची रहेगी।

लेकिन मोर्चा इस बार किसी विपक्षी चुनाव लड़ रही पार्टी के नेता से नहीं था, उन अंग्रेज़ी अख़बार की महिलाओं से था जो आज 40-50 साल की प्रौढ़ और ज़िम्मेदार महिलायें हैं। एक बार अपनी झिझक और पुरुष सत्ता को चुनौती दे चुकी थीं, इसलिए खोने को कुछ था नहीं। जो संख्या मुक़दमे की धमकी तक एक दर्जन थी, वह 97 वकीलों की केंद्र सरकार की टीम देख भड़क उठी।

अब पूरे मामले पर लीपापोती के लिए मीडिया में भांड़ फिर से सामने आ गए हैं और पूरे मामले को एमजे अकबर को फंसाकर यह प्रचार फैलाने  की कोशिश  की जा रही है कि मोदी जी के स्पेशल प्रयास का नतीजा है जिसमें डोभाल की कल की अकबर से मुलाक़ात शामिल है, यह इस्तीफ़ा देने पर राज़ी किया गया।

इसे कहते हैं, जूते खाये अक़बर और लाज बचे उनकी जो अंतिम समय तक अकबर को ढाल बना, अपनी गद्दी बचा रहे थे, आज अकबर के इस्तीफ़े की भी क्रेडिट देश की महिलाओं के सामूहिक प्रतिरोध और ग़ुस्से के बजाय मोदी जी को दिलाएंगे। #MeToo बढ़े चलो, इस सुराख़ को चीर कर सारा बहुरूपियापन तार-तार कर दो।

रविंद्र पटवाल

मी टू सिर्फ अकबर के इस्तीफे पर ही तो नहीं रुकना है, मी टू को उस पितृसत्ता के पेड़ की जड़ पर हमला करना है जिसे सदियों से पोषित किया गया। ग्रंथों, शास्त्रों और न जाने किन-किन का सहारा लेकर, मी टू को अपने लिए उस हक को छीन लेना है जिसे सदियों से मारे बैठे हैं समाज वाले सभी नारीविरोधी भेड़िये। मी टू को जवाब देना है उन्हें जिन्हें सिर्फ लड़कों में ही काबिलियत दिखती है, मी टू उखाड़ फेंकने के लिए है उन सभ्यताओं को, संस्कृतियों को, जिनमें स्त्री सिर्फ भोगने की चीज़ है और जिनका महिमामंडन करना अनिवार्य सा है, मी टू शोषितों की शोषितों के लिए शोषितों के द्वारा उठाई गई आवाज है। 

इसलिए देर से आई और उतनी अब नहीं आयी जितनी आनी थी, मी टू को किसी से अपने खेमे में आकर अपने लिए आवाज उठाने की गुजारिश करने का मोहताज नहीं होना है, मी टू सिर्फ इस्तीफे तक ही तो नहीं रुकना है। मी टू को तो अभी बढ़ना है फैलना है, जाना है वहां तक जहां से कोई खबर नहीं आती, शब्द देने हैं उन सिसकियों को जो जिस्म की हवस तले दब गयीं या दबा दीं गयीं, मी टू की आवाजें देश के हर शहर की, हर गली के, हर घर से आनी हैं, सालों से पोषित पितृसत्ता को महज एक इस्तीफे से तो नहीं खत्म किया जा सकता। मी टू फेमिनिज्म को पितृसत्ता के सामने ला खड़ा कर बेनकाब करने के लिए है उस हर चेहरे को जिसे लगता है कि कोई लड़की बगैर हमबिस्तर हुए तरक्की नहीं कर सकती। मी टू सिर्फ यहीं पर तो नहीं रुकना है।

अंशुल कृष्णा

(ये सभी टिप्पणियां संबंधित व्यक्तियों की फेसबुक वॉल से ली गयी हैं।)

 










Leave your comment