बच्चा चोरी के आंकड़ों की मशाल लेकर मीडिया कर रहा है लिंच मॉब की अगुआई

मुद्दा , , मंगलवार , 10-07-2018


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राम शिरोमणि शुक्ला

इस समय जब देश में भीड़ द्वारा किसी की भी हत्या कर दिए जाने पर चिंता जताई जा रही है, तब उसे तरह-तरह से जायज ठहराए जाने की सुनियोजित साजिश भी शुरू हो चुकी है। भीड़ द्वारा की जाने यह हत्याएं और बेरहमी से पिटाई गौरक्षा के नाम पर भी हो सकती हैं, लड़का-लड़की के साथ दिखने पर भी हो सकती हैं, मांस ले जाने अथवा रखने के आरोप में भी हो सकती हैं अथवा किसी अफवाह पर भी हो सकती हैं। इसे महिमामंडित करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। ऐसे आरोपियों से जेल में जाकर केंद्रीय मंत्री का मिलना हो। आरोपियों का माला पहनाकर स्वागत करना हो अथवा आरोपियों के मुकदमे का खर्च उठाना हो। 

एक तरफ यह सब हो रहा है, तो दूसरी तरफ असली अपराध से लोगों का ध्यान हटाने अथवा गलत को सही ठहराने की भी तरह-तरह से कोशिशें की जा रही हैं। ज्यादा गंभीर बात यह है कि यह सरकार की ओर से किया जा रहा है। सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह ऐसी वारदातों को रोके और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करे। सरकार इसके उलट ऐसे कृत्यों को जायज ठहराने में लगी है।

बच्चा चोरी की अफवाह के मामले में सरकार यही कर रही है। इससे भी भयावह स्थिति यह है कि मीडिया भी सरकार के ही सुर में सुर मिला रहा है। उसके पास यह भी देखने-समझने का समय नहीं है कि जो कुछ उसे बताया जा रहा है, वह कितना सही है।

अभी गृह मंत्रालय की ओर से बच्चा चोरी के बारे में आंकड़े जारी किए गए हैं। इन्हें जारी करने के पीछे सबसे बड़ा उद्देश्य यह सही ठहराना है कि बच्चा चोरी की अफवाह और डर के पीछे कारण बेबुनियाद नहीं हैं। प्रकारांतर से यह बताने का प्रयास किया गया है कि लोग डरे हुए हैं, इसलिए पिटाई और हत्याएं कर रहे हैं। इसे समझने के लिए सबसे पहले यह देख लेना काफी दिलचस्प होगा कि गृह मंत्रालय की इस खबर को किसने किस तरह प्रकाशित किया। कुछ उपलब्ध शीर्षकों को देखने के बाद किसी को भी आसानी से स्पष्ट हो जाएगा कि सब कुछ सुनियोजित तरीके से किया गया है और मीडिया भी वही करने में लगा है। 

अगर ऐसा न होता तो समाचार पत्रों की ओर से शीर्षक लगाते समय कुछ अन्य बातों का भी ध्यान रखा गया होता। कम से कम यही समझने की कोशिश की जाती कि बच्चे कौन चोरी करता है, कोई संगठित गिरोह तो नहीं सक्रिय है, सरकार ने अब तक बच्चा चोरी रोकने के लिए क्या कोई प्रभावी उपाय किए अथवा कार्रवाई की। यह भी जानने की जहमत नहीं उठाई गई कि बच्चा चोरी की घटनाओं पर पहले इस तरह किसी की हत्या क्यों नहीं की जाती थी अथवा इसी समय ऐसी वारदातों की संख्या में अचानक कैसे वृद्धि हो गई है। लेकिन लगता है कि मीडिया ने अपनी जिम्मेदारियों को भुलाकर सिर्फ सरकार का भोंपू बनना ही स्वीकार कर लिया है। तभी तो बिना तथ्यों को जांचे-परखे वही प्रकाशित-प्रसारित कर दिया जा रहा है जो सरकार की ओर से उसे बताया जा रहा है।

आइए कुछ शीर्षकों को देखते हैं और फिर समझने की कोशिश करते हैं कि किसने क्या किया। नवोदय टाइम्स का शीर्षक था बच्चा चोरी का डर जायज, वर्ष 2016 में देशभर से अगवा हुए 50 हजार से अधिक बच्चे। नया इंडिया का शीर्षक है आंकड़े बताते हैं बच्चा चोरी का डर बेवजह नहीं। जागरण की वेबसाइट पर खबर का शीर्षक है बेबुनियाद नहीं देश में बच्चा चोरी का डर, 2016 में हुआ 55 हजार बच्चों का अपहरण। नवभारत टाइम्स ने बताया कि बच्चा चोरी का डर बेवजह नहीं, साल 2016 में देशभर से अगवा हुए 55,000 बच्चे।

वेबदुनिया ने अपने पाठकों को बताया कि बच्चा चोरी का डर बेवजह नहीं, वर्ष 2016 में देशभर से 55,000 बच्चे अगवा हुए। न्यूज स्विंग ने जानकारी दी कि बेबुनियाद नहीं बच्चा चोरी का डर, 2016 में देशभर से 50,000 बच्चे हुए अगवा। न्यूज 18 ने बताया कि सिर्फ अफवाह नहीं है देश में बच्चा चोरी का डर, चौंकाने वाले हैं गृह मंत्रालय के आंकड़े। फर्स्ट पोस्ट हिंदी का शीर्षक है बेवजह नहीं बच्चा चोरी का डर, 2016 में देशभर से 55,000 बच्चे अगवा हुए। यह अनुमान लगाया जा सकता है कि कुछ एक को छोड़कर मीडिया ने क्या शीर्षक लगाया होगा। अब जैसे इसी खबर को “द वायर” नाम की वेबसाइट ने इस शीर्षक ‘वर्ष 2016 में 55,000 बच्चे अगवा हुए, बच्चों के खिलाफ अपराध में वृद्धि’ से प्रकाशित किया।

इस आशय के शीर्षकों से प्रकारांतर से यही बताने की कोशिश लगती है कि हजारों की संख्या में बच्चे चोरी हो रहे हैं। इससे लोगों में डर घर कर गया है। इस डर की वजह से ही लोग बच्चा चोर के शक में पिटाई और हत्याएं कर दे रहे हैं। इससे पहले सरकार की ओर से ही सारा जिम्मा वाट्सअप पर डालकर मामले को उलटी दिशा में मोड़ने का प्रयास किया गया था। इस काम को भी गृह मंत्रालय की ओर से किया गया था। अब गृह मंत्रालय की ओर से ही आंकड़े भी जारी किए गए और डर को स्वाभाविक बताया गया।

आश्चर्यजनक पहलू यह है कि आंकड़ों पर किसी का ध्यान नहीं गया और न किसी ने यह बताने का प्रयास किया कि बीते वर्षों के मुकाबले बच्चा चोरी की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। खबर में आंकड़े दिए गए हैं लेकिन शीर्षक में खेल कर दिया गया है। खबर ही बताती है कि केंद्र में नई सरकार आने के बाद लगातार बच्चा चोरी की वारदातें बढ़ती जा रही हैं। 2014 में यह संख्या 37,854 थी। 2015 में 41,893 मामले सामने आए। 2016 में 54,723 बच्चे चोरी हुए। इससे साफ पता चलता है कि हर साल आंकड़ा बढ़ता गया। 

दरअसल, बच्चों के खिलाफ अपराध को इस देश में कभी गंभीरता से लिया ही नहीं गया। बाल अधिकारों और बच्चों को शोषण व उत्पीड़न से मुक्ति दिलाने वाले कैलाश सत्यार्थी को नोबेल शांति पुरस्कार जरूर मिल गया लेकिन बच्चों की स्थिति में किसी तरह का सुधार नहीं आया। उनका जीवन अभी भी असुरक्षित है। अभी भी बच्चे काम करते हुए मिल जाएंगे। बच्चों की तस्करी से लेकर यौन उत्पीड़न तक की खबरें आए दिन मीडिया में आती रहती हैं। सरकार की ओर से भी बड़ी-बड़ी बातें जरूर की जाती हैं। लेकिन किया कुछ नहीं जाता।

अगर सरकारों ने कुछ किया होता तो न बच्चा चोरी और बच्चों के उत्पीड़न की वारदातों में इजाफा होता और न ही लोगों में डर पैदा होता। इन हालात के पैदा होने के लिए सरकार को जिम्मेदारी लेनी चाहिए और बच्चों के हितों की सुरक्षा की गारंटी करनी चाहिए। मीडिया को भी कुछ भी परोसने से पहले अपने कर्तव्यों की भी परवाह करनी चाहिए। सब कुछ हिंसक भीड़ के हवाले नहीं छोड़ दिया जाना चाहिए।

(राम शिरोमणि शुक्ल वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।) 






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