नमूना चरित्रों से यथार्थ के समग्र आकलन की समस्या

माहेश्वरी का मत , , शनिवार , 18-05-2019


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अरुण माहेश्वरी

आज के ‘टेलिग्राफ’ में वरिष्ठ पत्रकार संकर्षण ठाकुर ने वाराणसी के एक मोदी भक्त (converted) दुर्गेश जयसवाल के मनोविज्ञान का चित्रण किया है। वह भक्त है, क्योंकि अपने विश्वास पर अटल और कुछ भी सुनने को तैयार नहीं है । वह जानता है कि उसके नज़रिये में दोष है, लेकिन इसे मान ले, यह नामुमकिन है ।

संकर्षण के अनुसार उसका मानना है कि वह पाकिस्तान में रह रहा है। वाराणसी में उसके घर मोहल्ले का ठिकाना देने के बाद संकर्षण कहते हैं कि उसके दिमाग में इस ठिकाने का एक ही अर्थ है- पाकिस्तान। हिंदुओं के धर्म-कर्म की प्रमुख भूमि वाराणसी दुर्गेश के लिये पाकिस्तान है, अथवा पाकिस्तानियों से भरी हुई है। “हम लोग अपने ही देश में घिर गये हैं, सांस नहीं ले सकते । इससे बचने के लिये मोदी जी का होना बहुत ज़रूरी है, और वह कुछ करें, नहीं करें, इससे कोई मतलब नहीं।”

संकर्षण लिखते हैं कि यह बिल्कुल संभव है कि बेरोज़गार नौजवान दुर्गेश सचमुच ऐसा ही महसूस कर रहा हो- अपने घर में घुट रहा हो। उसका इलाका गंगा किनारे का सघन इलाक़ा है । इसमें बड़ी आबादी मुसलमानों की है। “कैसे कोई उनके साथ सहज रह सकता है। दम घुटता है, यह नहीं चल सकता । भारत हमारा देश है और हम पाकिस्तान में रह रहे हैं ।”

दुर्गेश का कज्जाकपुरा का इलाक़ा क्या और क्यों है, इससे उसको कोई मतलब नहीं है । वह जो मानता है वही ध्रुव सत्य है । पूरा देश यही है । “पूरा इंडिया ही पाकिस्तान से भरा हुआ है, और इसके लिये मोदी जी चाहिए । सत्तर साल में एक काम नहीं हुआ था, वह काम मोदी जी ने किया ।” वह एक काम क्या हुआ, इसे वह बताने की ज़रूरत नहीं समझता, हर कोई जानता है । उसका इशारा भारत की सबसे बड़ी अल्पसंख्यकों की आबादी को अलग-थलग करने, उसे अवांछित और त्याज्य, बल्कि दुश्मन बताने की ओर था। 

संकर्षण लिखते हैं कि दुर्गेश यहीं पर नहीं रुकता । उन्हें ‘अन्य’ बताना तो पहला क़दम है। यह यहीं पर ख़त्म नहीं होता । इसे आगे ले जाना है । “ हम लोग कुचले जा रहे हैं अपने ही देश में, अभी ग़ुलाम है, इसका कुछ करना होगा। इसीलिये मोदीजी की अभी ज़रूरत है।

संकर्षण लिखते हैं कि उसके इस जुनून को ही आप मोदी की सबसे प्रभावशाली सर्जिकल स्ट्राइक कह सकते हैं। उन्होंने भारत के बहुसंख्यकों के एक बड़े हिस्से में एक गहरी अल्पसंख्यक ग्रंथि को पैदा कर दिया है। यह प्रकल्प दुर्गेश के पैदा होने के पहले ही शुरू हो गया था, लेकिन यह विषाणु काफ़ी फैल गया है । इससे लोगों के मन-मस्तिष्क में गुस्सा, संदेह, घृणा, हताशा, प्रताड़ना का भाव उमड़ता-घुमड़ता रहता है ।

संकर्षण कहते हैं कि देखने में तो वह एक सामान्य आदमी लगता है। उसके सिर पर सींग नहीं है। वह मैगी नूडल्स पसंद करता है, बाइक पर घूमता है, पीछे लड़की को बैठाने से परहेज़ नहीं करता । एक दिन में अपने फ़ोन पर 1.5 जीबी डाटा की खपत करता है। प्यारी सी मुस्कान भी देता है । आईसीसी क्रिकेट का दीवाना है । बीच में अपने को सपा का सदस्य भी कहता है।

सपा, जो मुसलमानों को अपना वोट बैंक मानती है ? दुर्गेश कहता है - “सपा के साथ वही एक समस्या है, नहीं तो हमको कोई परेशानी नहीं है । मेरी पसंद की पार्टी वही है । लेकिन मोदी इन सबके ऊपर है । वे ज़रूरी हैं।”

दुर्गेश के बारे में संकर्षण के इस पूरे ब्यौरे से यह साफ़ है कि वह बाक़ी जीवन में कितना ही सामान्य क्यों न दिखाई देता हो, वास्तव में वह एक जुनूनियत के मनोरोग का शिकार हो चुका है । वह अल्पसंख्यकों के ख़ात्मे तक कल्पना करता है। अर्थात प्रज्ञा ठाकुर की तरह के आतंकवादी की भूमिका में कत्तई असहज नहीं है ।

ऐसे एक मनोरोगी के उदाहरण से संकर्षण इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि भारत की आबादी का बड़ा हिस्सा कमोबेश ऐसा ही हो गया है, अर्थात मनोरोगी। इसीलिये न उस पर बेरोज़गारी के सवाल का कोई असर पड़ रहा है और न ही राफ़ेल और ‘चौकीदार चोर है’ के नारे का ।

इसे ही कहते है, प्रस्तुतीकरण से उत्पन्न समस्या। यथार्थ हमेशा बहुरूपी, बहुआयामी होता है। उसके जिस रूप को आप प्रस्तुत करेंगे, वैसा निष्कर्ष निकाल लेंगे।

दुर्गेश अपने को सपा समर्थक कहता है, लेकिन मोदी भक्त । उसके चरित्र का यह द्वैत, उसके अंदर की यह दरार हमें बहुत कुछ ऐसा कहती है, जिसे संकर्षण जैसे पत्रकार नहीं सुन पाते हैं । यही वह दरार है जिसमें से बेरोज़गारी, चौकीदार चोर है और न्याय की तरह के विषय चरित्र में प्रवेश करते हैं और उसकी कथित भक्ति की एकान्विति को चूर-चूर कर देते हैं ।

हो सकता है कि दुर्गेश का मामला कुछ ज़्यादा ही बिगड़ चुका मामला हो, लेकिन यह मामला बहुमत के लोगों का नहीं है । दुर्गेश की तरह ही उनके अंदर भी जीवन की समस्याओं के विषयों का स्थान है और वे अपने पर लदे हुए सांप्रदायिक प्रचार को झाड़ कर उन्हें तरजीह देते हैं । इसके प्रमाण के लिये नमूना सर्वेक्षण नहीं, पिछले दिनों हुए राज्यों के चुनाव और उपचुनाव को देखना ज़्यादा भरोसेमंद होगा । यहीं पर आकर आँकड़े एक नमूना चरित्र के प्रस्तुतीकरण की एकांगिता की समस्या की तुलना में कहीं ज़्यादा बड़े यथार्थ को सामने लाते हैं । 

यहां पूरा मामला परिस्थिति-निर्भर है । कल चुनाव के परिदृश्य पर एक शुद्ध दार्शनिक चर्चा में हम प्रस्तुति और परिस्थिति के इसी विषय की चर्चा कर रहे थे । जर्मनी में हिटलर एक खास विश्व परिस्थिति में एक बड़ी आबादी को यहूदी-विरोध और विश्व-विजय के उन्माद से भरने में सफल हुआ था । उसके बाद से ये प्रवृत्तियां आतंकवाद की अनेक सूरतों में दुनिया में सामने आती रही हैं, लेकिन जनतंत्र के अंदर से किसी दूसरे हिटलर के जन्म की गुंजाइश नहीं बनी है । आतंकवाद हर समाज में हमेशा कुछ सिरफिरों को ही प्रभावित कर पाया है जो अंतत: समाज में अल्पमत के साबित हुए हैं । मोदी का उभार भी बहुमत के मतों से नहीं हुआ है ।

इसीलिये दुर्गेश मोदी के दुष्प्रचार का शिकार बने एक मनोरोगी चरित्र को तो जरूर पेश करता है, लेकिन वह समाज का बहुमत नहीं है । संकर्षण का यह आकलन कि जीवन की समस्याओं को उठाने वाले पहलू भारत के ग़रीबों को प्रभावित नहीं कर रहे हैं, एक पूरी तरह से आत्मनिष्ठ निष्कर्ष है । 

(अरुण माहेश्वरी वरिष्ठ लेखक हैं और आजकल कोलकाता में रहते हैं।)

यहाँ हम संकर्षण ठाकुर की इस रिपोर्ट के लिंक को दे रहे है :

https://epaper.telegraphindia.com/imageview_270595_1613821_4_71_18-05-2019_4_i_1_sf.html


 








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