आखिर पीएम मोदी बार-बार क्यों जा रहे हैं चीन!

देश-दुनिया , , सोमवार , 11-06-2018


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बहुराष्ट्रीय प्रधानमंत्री जी एक बार फिर अपनी चीन यात्रा से वापस आने की तैयारी कर रहे होंगे। देश का डंका बजाकर या एक बार फिर से घण्टा बजाकर ये देखना दिलचस्प होगा। भारत के प्रधानमंत्री विदेश भ्रमण की महत्वाकांक्षी योजना के तहत अपनी चौथी चीन यात्रा पर से कुछ ही दिनों पहले आये थे और एक बार फिर से चीन पहुंच गये। प्रोटोकॉल तोड़कर। विदेश नीति के विशेषज्ञों की मानें तो प्रधानमंत्री की यह चीनी यात्रा काफी अहम है। मुद्दे कई हैं....उम्मीदें हैं कि बढ़ती ही जा रही हैं। पर हक़ीक़त की दोलायमान धरातल पर भारत की स्थिति बेहतर होती दिखना तो दूर दिन प्रतिदिन और डांवाडोल होती जा रही है। आइये प्रधानमंत्री के इस दौरे के महत्वपूर्ण सामरिक मुद्दों पर जरा निगाह डालते हैं और इस यात्रा के मायने तलाशते हैं।

मुद्दा नम्बर-1: डोकलाम सीमा विवाद

हाल के दिनों में भारत-चीन के बीच सर्वाधिक विवादित मुद्दों में यह सर्वप्रमुख रहा है। डोकलाम में चीनी सैनिकों की बढ़ती घुसपैठ और चीन द्वारा सडक़ निर्माण कर सेना का सीमा के निकट जमावड़ा भारत के लिये ख़तरे की घण्टी मानी जा रही है। प्रधानमंत्री के पिछली चीनी यात्रा, निर्मला सीतारमन की चीनी यात्रा के बाद सरकार की ओर से इसके सुलझा लिये जानें का बार-बार ऐलान किया जाता रहा है।

लेक़िन हक़ीक़त इनसे परे और काफी भयानक है। जैसा कि मालूम ही होगा कि तमाम कूटनीतिक प्रयासों के बावजूद चीन ने डोकलाम के निकट भूटान की आख़िरी सैनिक चौकी झामफेरी के निकट लगभग डेढ़ किलोमीटर लंबी सड़क निर्माण कर अपने इरादे को स्पष्ट कर दिया है। इतना ही नहीं विवादित क्षेत्र में अत्याधुनिक हथियारों के साथ सैन्य अभ्यास और चीनी लड़ाकू जेट विमानों का विवादित क्षेत्र में गरजना भारतीय रक्षा विशेषज्ञों की नींद उड़ा चुका है। 

मुद्दा नम्बर-2: चीन-अरूणाचल सीमा विवाद

चीन ने भारत के अभिन्न राज्य अरुणाचल प्रदेश के अस्तित्व को कभी स्वीकार ही नहीं किया है। चीन अरुणाचल प्रदेश के दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा होने का दावा करता रहा है। भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के 3 हजार 488 किलोमीटर पर सीमा विवाद है। आये दिन अरुणाचल की सीमा के अंदर चीनी सैनिकों की घुसपैठ भारत के भीतर होती रही है। याद ही होगा कि चीनी सैनिक भारत के अरुणाचल प्रदेश में सियांग जिले में 200 मीटर तक घुस गए थे। इतना ही नहीं भारत के राष्ट्रपति कोविंद जी और रक्षामंत्री महोदया निर्मला सीतारमन की अरुणाचल यात्रा पर चीनी विदेश मंत्रालय ने कड़ी आपत्ति जतायी थी।

मुद्दा नम्बर-3 : बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव यानी सिल्क मार्ग

मई 2017 में बीजिंग में दुनिया के 28 बड़े नेताओं और 120 से ज़्यादा देशों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने एक नए सिल्क रूट का एलान किया और उसे रोड ऑफ पीस यानी शांति का मार्ग बताया था। पूरी दुनिया में अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए एशिया, यूरोप और अफ़्रीका के 65 देशों को जोड़ने की चीन की इस परियोजना को 'वन बेल्ट वन रोड' परियोजना का नाम दिया गया, जिसे 'न्यू सिल्क रूट' के नाम से भी जाना जाता है। इस परियोजना का प्रमुख उद्देश्य चीन को अफ़्रीका, मध्य एशिया और रूस से होते हुए यूरोप से जोड़ना है। चीन की रास्ट्रपति की यह घोषणा न केवल भारत के लिए बल्कि सम्पूर्ण विश्व को चौंकाने के लिये काफ़ी था। अंतरराष्ट्रीय रिश्तों और विश्व व्यापार को बढ़ावा देने के नाम पर लायी गई इस योजना के पीछे छिपे चीन के मंसूबे बेहद ख़तरनाक ही नहीं वरन विनाशकारी भी हैं। और भारत इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होगा ये तय है। दक्षिण एशिया में अपनी दादागिरी दिखाने और समुद्र (खासकर हिन्द महासागर) में अपना वर्चस्व स्थापित करना चीन का सबसे बड़ा मकसद है। इसका लगभग 90 फ़ीसदी हिस्सा समुद्री रास्तों से होकर जाता है और इस तरह मालवाहक पोत एक देश से दूसरे देश को जाते हैं चीन ने इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को शुरू किया है, जो अगर सफल हुआ तो यह दुनिया में होने वाले वैश्विक व्यापार की तस्वीर ही बदल देगा। भारत के लिये ये मसला बेहद पेचीदा हो चला है क्योंकि यूरोपीय देशों के साथ भारत के कई पड़ोसी देश-श्रीलंका, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और यहां तक कि नेपाल जैसा देश भी भारत के खिलाफ इस परियोजना में चीन के साथ खड़ा है यानी भारत चारों तरफ से घिर चुका है।

मुद्दा नम्बर-4: संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थायी सदस्यता का चीन द्वारा विरोध

पिछले कई वर्षों से संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थायी सदस्यता की मांग भारत के विभिन्न राष्ट्राध्यक्ष उठाते रहे हैं। प्रारम्भ में इस मसले पर भारत को रूस का साथ मिलता रहा है लेकिन वर्तमान सरकार की कूटनीतिक विफलता और अमेरिका से जरूरत से ज़्यादा लगाव देश को इस मसले पर पूरी तरह से पीछे धकेल दिया है। चीन संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी सदस्यता का प्रारंभ से ही विरोधी रहा है और अब इसमें रूस का भी विरोध देश के विदेशी नीति निर्धारकों को चौका रही है। 

मुद्दा नम्बर-5: मसूद अजहर पर चीन का रुख

चीन ने पाकिस्तान के आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मौलाना मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र की वैश्विक आतंकवादी सूची में शामिल करने की भारत की कोशिश को बार-बार बाधित करता रहा है। अमेरिका के बढ़ते दबाब के बावजूद चीन इस मुद्दे पर अपने पुराने रुख पर कायम है।

मुद्दा नम्बर-6: तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा पर चीन का रुख

81 साल के दलाई लामा तिब्बती आध्यात्मिक नेता हैं व धर्मगुरु हैं। चीन तिब्बत पर अपना दावा पेश करता है और नोबेल पुरस्कार विजेता दलाई लामा तिब्बत की स्वतंत्रता के ध्वजवाहक हैं । चीन दलाई लामा को अलगाववादी मानता है। वह सोचता है कि दलाई लामा उसके लिए समस्या है। बौद्ध धर्म के अनुयायी दलाई लामा को एक रूपक की तरह देखते हैं, इन्हें करुणा के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। तिब्बती बौद्ध धर्म के नेता दुनिया भर के सभी बौद्धों का मार्गदर्शन करते हैं। हालांकि दलाई लामा अब केवल चीन से तिब्बत की स्वायत्तता की मांग करते हैं लेकिन फिर भी लामा से भारत की नजदीकियां चीन को कभी रास नहीं आयी।

मुद्दा नम्बर-7: नेपाल में चीन की मदद से सड़क निर्माण

रेल सेवा और सिल्क मार्ग की सहमति के बाद से नेपाल और चीन की नजदीकियां लगातार बढ़ती जा रहीं हैं जो भारत के लिये ख़तरे की आहट है। नेपाल के ब्रह्मदेव से महाकाली नदी के किनारे दार्चुला होते हुए चीन सीमा के तिंकर बार्डर के लिए बन रही महाकाली कॉरिडोर सड़क का बहुत तेजी से निर्माण कार्य जारी है। सड़क निर्माण से जहां नेपाल की सीमा सुरक्षा मजबूत होगी, वहीं चीन का भारत में प्रवेश का रास्ता और नजदीक हो जाएगा। ऐसे में प्रतिकूल हालात में नेपाल सरकार के चीन की ओर रुख से भारत को सामरिक मोर्चे पर नुकसान हो सकता है। 

मुद्दा नम्बर-8: कश्मीर मसले पर चीन द्वारा मध्यस्थता करने की कूटनीतिक चाल

चीन कश्मीभर मसले पर गहरी कूटनीतिक चाल चलता रहा है और मजेदार बात यह है कि इस मसले पर अमेरिका जैसे बड़े राष्ट्र का अंदरूनी सपोर्ट चीन को मिलता रहा है। चीन संयुक्त राष्ट्र से लेकर कई अवसरों पर पाकिस्ताान और भारत के बीच तनाव को कम करने के लिए वह कश्मीसर मसले पर मध्यवस्थिता करने के मंसूबों को खुले तौर पर ज़ाहिर कर चुका हैं। चीन की माने तो जिस तरह से एलओसी पर दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ रहा है उससे अंतरराष्ट्री य समुदाय का ध्या।न भी अब इस तरफ जा रहा है। और कश्मीर मुद्दे पर अन्य देश की मध्यस्थता का सीधा मतलब है भारत की कूटनीतिक हार क्योंकि यही तो पाकिस्तान भी चाहता रहा है।

मुद्दा नम्बर-9 : ब्रह्मपुत्र-सतलुज जल विवाद 

याद कीजिये वर्ष 2017 में असम में आये विनाशकारी बाढ़ और उसकी विभीषिका को । ये बाढ़ असम निवासियों के लिए प्रलय की तरह था और इसका एक मुख्य कारण था कि चीन ने ब्रह्मपुत्र नदी के पानी सम्बन्धी आंकड़े डोकलाम सीमा विवाद के कारण भारत को देने से इनकार कर दिया था। हालांकि चीन से मीडिया में आ रही जानकारी के मुताबिक चीन एक बार फिर ये आंकड़े भारत को देने के लिये तैयार हो गया है जो असम सहित देश के सभी पूर्वोत्तर राज्यों को बाढ़ की विभिषिका से बचाने में काफ़ी मददगार होगी।

मुद्दे और भी कई हैं लेकिन इन मुद्दों का हल भारतीय प्रधानमंत्री की इस चीन यात्रा में है या नहीं ये अहम है। पिछली चीनी यात्रा में प्रधानमंत्री का झूला झूलने का डंका बजा था इस बार कहीं ब्रेक डांस और ढोल ड्रम का डंका बजकर न रह जाये और ये असल मुद्दे फिर से न दब जायें बिना किसी सार्थक समाधान के ही।

(दया नन्द शिक्षाविद होने के साथ सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषक हैं। और आजकल मधुबनी में रहते हैं।) 








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