समाज के एक हिस्से को हत्यारी भीड़ में तब्दील कर देती है शासक के घमंड की बीमारी

माहेश्वरी का मत , , शनिवार , 04-08-2018


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अरुण माहेश्वरी

आज ही हमने तीन दिन बाद भाषाशास्त्री जीएन देवी के टेलीग्राफ (2 अगस्त 2018) में प्रकाशित लेख 'जब सवाल उठते हैं ( When questions erupt)1 को पढ़ा और आज ही अरुंधती राय के उस वक्तव्य को भी देखा जिसमें उन्होंने सब राजनीतिक लोगों से अपने मतभेदों को भूलकर 2019 में मोदी को अपदस्थ करने का आह्वान किया है, अन्यथा मोदी 'जिस आग से भारत को सुलगा देना चाहते हैं, वह आग हजार साल तक हमें जलाती रहेगी।'2

देवी का लेख भीड़ (mob) शब्द के एक व्युत्पत्तिमूलक आख्यान से शुरू होता है जो फ्रांसीसी क्रांति के बाद के व्यक्ति स्वातंत्र्य के काल में एक तिरस्कृत शब्द था, वहीं बीसवीं सदी में समाज में क्रांतिकारी परिवर्तनों के लिये लामबंद जनता का प्रतीक बन गया और मानव समाज के विकास के ही अनुषंगी यांत्रिक विकास में वह मोबाइल स्टील से बनने वाले यंत्रों के ढांचों में ढल कर अब मोबाइल फोन तक की यात्रा पूरी कर चुका है। मनुष्यों ने इस मोबाइल नामक यंत्र को अपने मस्तिष्क का एक महत्वपूर्ण काम सुपुर्द कर दिया है, स्मृतियों को संजो के रखने का काम । चूंकि स्मृति मनुष्य के दिमाग की तरह उसका कोई अविभाज्य अंग नहीं होती है, बल्कि यह उसकी एक उपार्जित संपदा है, इसीलिये उसे किसी अन्य के सुपुर्द करना संभव समझा गया है ।

यद्यपि इसी उपार्जित बौद्धिक और सांस्कृतिक संपदा के बल पर मनुष्यों में ज्ञान की तमाम कुल और क्रम की श्रेणियां विकसित हुई हैं, सभ्यता और संस्कृति के मानदंड तैयार हुए हैं, फिर भी व्यवहारिक कारणों से ही मनुष्यों ने यह जरूरी समझा कि इन स्मृतियों को बनाये रखने के लिये क्यों फिजूल में मानव श्रम को लगाया जाए, जबकि उसे अलग से कम्प्यूटर चिप्स में सुरक्षित रखा जा सकता है। और देवी ने बिल्कुल सही कहा है कि इस उपक्रम में मोबाइल और टैब्लेट्स की तरह के उसकी कृत्रिम बुद्धि (artificial intelligence) की धनी नाना संततियों ने ऐसे अनेक सामान्य कामों को करना शुरू कर दिया है जिनके जरिये अब तक मनुष्य अपने जिंदा रहने के प्रमाण दिया करता था ।

बहरहाल, स्मृतियों से मुक्ति के मनुष्य के इस नये अभियान ने आदमी के जीवन में स्मृति की भूमिका को गौण करना शुरू कर दिया । आज 21वीं सदी का मानव-प्राणी सिर्फ भविष्य के बारे में सोचता है, उसकी खुशियां उसके क्रेडिट कार्ड के स्वास्थ्य से जुड़ गई हैं । देवी के शब्दों में वह धरती पर भविष्य के लिये सुरक्षित संसाधनों को अभी, तत्काल अपने लिये खर्च कर लेना चाहता है । स्मृति से जुड़े विषयों के प्रति वह इतना बेपरवाह है कि उसे पूरी तरह से मोबाइल के जिम्मे छोड़ दिया है । 

देवी कहते हैं कि यहीं से एक ऐसे दमनकारी राज्य के लिये जमीन तैयार हुई है जो मनुष्यों की सामूहिक परिवर्तनकारी चेतना को जगाने वाली संघर्षों की स्मृतियों के अवशेषों तक को पोंछ डालने की कोशिश में लगा हुआ है ताकि उस राज्य को चुनौती देने का किसी में कोई सोच भी पैदा न होने पाए । देवी ने राज्यों के इस काम को करने वालों की फौज के रूप में दुनिया की कई सरकारों की ट्रौल सेनाओं की ठोस शिनाख्त की है जो अपने हाथों की मोबाइल शक्ति के बल पर लोगों की स्मृतियों को अपनी मर्जी के अनुसार ढालने की परियोजनाओं में लगी हुई हैं ।

इसी संदर्भ में उदाहरण के तौर पर देवी बताते हैं कि हमें आज मोदी-आरएसएस के ट्रौल्स लगातार यह सिखाने में जुटे हुए है कि गांधी जी ने हमारे देश का बंटवारा कराया, गोडसे एक महान आत्मा थी, नेहरू जी भारत के लोगों के एक नंबर दुश्मन थे, प्राचीन भारत में ही प्लास्टिक सर्जरी और विमानों का आविष्कार हो गया था और जो सरकार इस महान ज्ञान को आगे बढ़ाते हुए प्रगति के बड़े-बड़े डग भर रही है, उसे कुछ खराब लोग संदेह की दृष्टि से देखते हैं ! ये लोग कुछ कथित अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के द्वारा अनुमोदित अपनी उपलब्धियों के बारे में रोजाना फर्जी रिपोर्टें भी तैयार करके चलाते रहते हैं । देवी इस परिस्थिति को सच, झूठ और डर का एक अनोखा घालमेल कहते हैं और कहते हैं कि लगता है जैसे अब जनता की अपनी स्मृति कुछ नहीं रहेगी, वह पूरी तरह से इन ट्रौल्स की मोबाइल शक्ति के आसरे होगी ।

अपने लेख में देवी आगे व्यवस्था की समीक्षा करने की शक्ति को ही लुप्त करने के काम में लगे राज्य की भूमिका को प्राचीन लैटिन के शब्द hegemony (प्रभुत्व) से व्याख्यायित करते हैं और कहते हैं कि यह पद सत्ता की प्रकृति को सूचित करता है और इस प्रकार की प्रश्नातीत सत्ता अक्सर बहु-संख्यकों की शासकों के विचार और सोच को आगे बढ़ाने की एक प्रकार की अंतरकामना से तैयार होती है । देवी इसे निद्रारोग से ग्रसित सामाजिक परिस्थिति (insomniac social condition) कहते हैं जिसमें एक विशाल संख्यक लोग कमजोर लोगों पर शासकों की मनमर्जी को थोपने के लिये आतुर रहते हैं ।

ऐसा “नीति-विहीन, आत्म-तुष्ट और निर्बुद्धि के द्वारा निर्मित प्रभुत्व समाज में एक राजनीतिक- मनोवैज्ञानिक बीमारी पैदा करता है जिसे प्राचीन युनानी शासन-व्यवस्था में hubris (घमंड, अक्खड़पन) कहते हैं । वे इसे गौरव कहते हैं लेकिन जिसे हम अच्छी चीज पर गर्व करना कहते हैं, यह गौरव उससे बिल्कुल अलग है । इसमें शासक यह भूल जाता है कि वह आज जहां है, वहां क्यों है ? घमंडी शासक संवाद नहीं करता । वह सवालों से कतराता है । वह उसे बहरा करने वाली श्रेष्ठता की गूंज से पूरी तरह संवेदनशून्य बना देता है ।”

इसी क्रम में देवी कहते हैं कि ऐसी स्थिति में “भीड़ के रूप में जनता का मानवीय पक्ष पूरी तरह लुप्त हो जाता है और वह हत्यारी भीड़ (lynch mob) मंन तब्दील हो जाती है ।”

शासक में घमंड की बीमारी और समाज के एक अंश की उसके इशारों पर नाचने की तैयारी समाज को एक हत्यारी भीड़ का समाज बना देता है । ऐसा शासक जनता की स्मृतियों के लोप से अपने अलावा अपने आगे-पीछे के हर किसी के अस्तित्व को खत्म करना चाहता है । जो भी उससे भिन्न मत रखता है, वह ट्रौल्स के हमलों का शिकार होता है । इसके बाद भी आवाज उठाने पर उसे राष्ट्र-द्रोही बता कर बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है । घमंड में डूबे राजा के ही प्रताप से प्रजा में तेजी से हिंसा का स्वाद पैदा हो जाता है । स्मृतियों पर मोबाइल के हमलों की जमीन पर हत्यारी भीड़ अब ऐसी हर चीज की हत्या करने लगती है जिसे वह समझती है कि उसके राजा को वह पसंद नहीं है । 

देवी एक हत्यारे उन्माद में डाल दिये जा रहे समाज की रचना की इस पूरी कहानी का उपसंहार इन शब्दों में करते हैं — “ प्रभुत्व और घमंड दोनों के ही अपने विचित्र इतिहास हैं । प्रभुत्व सवालों को दबाने की कोशिश करता है लेकिन दबाए गये सभी सवाल अलग-अलग रूपों में वापस आते हैं — वे कभी उना की नग्नता में लौटते हैं तो कभी उन्नाव के क्रंदन में । कैम्पस के नारों में तो अखबारों के स्तंभों की भाषा में छिपे संकेतों में । और प्रभुत्व जिस जड़ समाज की रचना करता है उसमें दांडी के चुटकी भर नमक जितने सवाल का मुकाबला करने की भी ताकत नहीं होती है । उसके अंत से एक डर लगता है लेकिन कोई गहरी सहानुभूति पैदा नहीं होती है । हत्यारी भीड़ और मोबाइल ट्रौल्स की फौज भूल जाती है बलपूर्वक स्मृतियों को पोंछने का अंत प्रभुत्व और घमंड के अंत में ही होता है । मौन कर दी गई हर स्मृति अपने हर निर्वासन के बाद वापस लौट आती है ।”

यह थी भाषाशास्त्री जीएन देवी के द्वारा तानाशाही सत्ता के उदय और अंत की एक महत्वपूर्ण तात्विक व्याख्या । जाहिर है कि यह कोई अमूर्त आख्यान नहीं है। इसके केंद्र में मोदी और उनकी ट्रौल वाहिनी है, हमारे समाज के स्मृतिविहीन दानवीकरण का अभी चल रहा घृणित अभियान है । 

देवी के इस विश्लेषण में आगे और जोड़ते हुए हम और भी साफ शब्दों में यह कहना चाहेंगे कि यही 'प्रभुत्व और घमंड' का नंगा खेल राजनीतिक शब्दावली में फासीवाद है । यह भी 'प्रभुत्व और घमंड' की नग्नता की राजनीतिक क्रियात्मकता को व्यक्त करने वाला मनुष्यों के इतिहास से ही व्युत्पन्न पद है, जैसे mob से लेकर lynch-mob है । 

हमारे कुछ मित्र अभी इस फासीवाद शब्द के प्रयोग से परहेज करते हैं, क्योंकि ऐसा एक वामपंथी पार्टी के बड़े नेता ने कह दिया था कि इससे मोदी की पहचान धूमिल होगी । 'शत्रु से लड़ने के लिये उसकी सटीक पहचान की जानी चाहिए' । 

हमारा खुद से यह सवाल है कि आज जब मोदी-आरएसएस के खिलाफ विपक्ष की सारी ताकतें एकजुट हो ही रही हैं, तो वे उन्हें फासीवादी मान कर उनका प्रतिरोध करे या कुछ और मान कर, इससे क्या फर्क पड़ता है ?

दरअसल, किसी शब्द या पद के प्रयोग की हमारी क्रियाशीलता में क्या भूमिका होती है ? किसी भी शब्द को सुन कर जब हम उसके अपने नाद-जगत से निकलने वाली ध्वनियों के चक्र पर सवार हो जाते हैं तब वह चक्र ज्यों-ज्यों और जहां-जहां जाता है, वह एक सार्वभौम सम्राट की तरह हमें चीजों को समझने की एक सर्वात्मक दृष्टि देता है । अभिनवगुप्त ने अपने तंत्रालोक में जहां आदमी के विवेक की व्याख्या की है उसमें एक जगह वे शब्द आदि के विषय में श्रोत्र आदि छिद्रों के रास्ते से उनकी नादात्मा की भावना करने की बात करते हुए यही कहते हैं कि “जैसे सार्वभौम राजा दूसरे राष्ट्र में जहां कहीं जाता है वहां दूसरे राजा सहायता के लिये अवश्य पीछे-पीछे पहुंचते हैं, उसी प्रकार एक चित्तवृत्ति जिस किसी विषय में बनती है, वहीं पर पीछे-पीछे दूसरी वृत्तियां भी बनती हैं । 

“एकैकापि च चिद्धृत्तिर्यत्र प्रसरति क्षणात् ।

सर्वास्तत्रैव धावन्ति ता: पुर्यष्टकदेवता: ।।

(एक क्षण में एक भी चित्तवृत्ति जहां पहुंचती है, सभी पुष्टिकारी देवतायें वहीं दौड़ कर पहुंच जाते हैं ।)

तो, आज की पूरी परिस्थिति के विषय की पहचान के साथ ही यह राजनीतिक क्रियाशीलता के लिये जरूरी चित्त-वृत्ति का मामला है, चेतना शक्ति का मामला है । यही है जो हमें सुनियोजित ढंग से जनता की स्मृतियों के अवलोपन के साथ ही, शासन के 'प्रभुत्व और घमंड' के दूसरे सभी सामाजिक-राजनीतिक आयामों की पहचान देता है । 

इसीलिये जी एन देवी के लेख को प्रस्तुत करने वाली अपनी इस टिप्पणी का प्रारंभ हमने अरुंधती राय के मोदी को पराजित करने के आह्वान से किया है और इसका अंत भी हम फासीवाद के खिलाफ लड़ाई की बहु-स्तरीय रणनीति को तैयार करने के लिये जरूरी निःशंक राजनीतिक चित्तवृत्ति के निर्माण की जरूरत पर बल देकर कर रहे हैं । इस चित्तवृत्ति के अभाव में ही आज भी कुछ वामपंथी नेता अपने अंध-कांग्रेस-विरोध के दलदल में ही फंसे हुए हैं । उनके पास आज के संघर्षों को दिशा देने के लिये जरूरी उद्बोधन की न्यूनतम भाषा का भी अभाव है ।  

1. https://epaper.telegraphindia.com/imageview_207307_162031777_4_71_04-08-2018_6_i_1_sf.html

2. https://www.telegraphindia.com/opinion/when-questions-erupt-249234

(अरुण माहेश्वरी वरिष्ठ लेखक और स्तंभकार हैं और आजकल कोलकाता में रहते हैं।)

      










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