जिस डाल पर बैठा, उसी को काट रहा मिडिल क्लास!

मुद्दा , , सोमवार , 15-04-2019


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अश्विनी श्रीवास्तव

जिस मध्य वर्ग के लिये मनमोहन सरकार का काल ही स्वर्णिम काल था, वही आज अपनी ही बर्बादी की जिम्मेदार मोदी सरकार को फिर से लाने के लिए सबसे ज्यादा आतुर दिख रहा है। उसकी ऐसी आतुरता देखकर तो अपनी ही डाल काट देने वाले कालिदास भी शायद अपनी उस मूर्खता पर शर्माना छोड़ देंगे। कितनी हैरत की बात है न कि मध्यम वर्गीय आर्थिक वर्ग के लोगों पर ही मोदी सरकार ने अपने पांच साल के कार्यकाल में जमकर सोंटे बरसाए हैं, फिर भी मध्य वर्ग ही मोदी पर सबसे ज्यादा लहालोट है। आइये जरा देखते हैं कि मोदी जी ने आखिर मध्य वर्ग के लिए क्या-क्या मुश्किलें खड़ी की हैं।

- मध्य वर्ग के लोग मूलतः नौकरी पेशा हैं और किसी सरकारी, अर्धसरकारी विभाग, पीएसयू, बैंक या निजी कंपनी में कार्यरत हैं और मोदी जी ने इन पांच सालों में ज्यादातर सरकारी विभाग, अर्धसरकारी विभाग, पीएसयू या बैंक को बदहाली की कगार पर पहुंचा दिया है। इससे मध्य वर्ग के लोगों की न सिर्फ नौकरी पर संकट मंडराने लगा बल्कि भविष्य को लेकर लोगों में खासी असुरक्षा की भावना भी घर करने लगी। बढ़ती महंगाई के साथ-साथ बढ़ती सैलरी की तो लोग मोदी राज में कल्पना ही करना भूल गए।

- इसी मध्य वर्ग के पास चूंकि पूंजी सीमित होती है इसलिए उनके सामने अपने बच्चों को किसी तरह पैसे जमा करके पढ़ाना, कोचिंग कराना और फिर किसी प्रतियोगी परीक्षा के जरिये अपनी ही तरह किसी नौकरी में डालना ही एकमात्र विकल्प होता है। लेकिन मोदी सरकार ने न तो अपने कार्यकाल में बड़े पैमाने पर सरकारी भर्तियां निकालीं, न निजी क्षेत्र को सहयोग व समर्थन देकर उसमें ही बड़ी संख्या में रोजगार का सृजन करवाया न ही नए तकनीकी, व्यावसायिक, पेशवर शिक्षण संस्थान देश में खोले और उस पर ज्यादातर शिक्षण /प्रशिक्षण संस्थानों की फीस में जबरदस्त इजाफा भी कर दिया। इससे मध्य वर्ग के बच्चों का भविष्य भी डांवाडोल हो गया। 

- रसोई गैस, डीजल, पेट्रोल आदि के साथ घर गृहस्थी की लगभग हर चीज के दामों में मोदी राज में जबरदस्त इजाफा हुआ। इससे मध्य वर्ग के उसी सीमित बजट व स्थिर तनख्वाह में घर चलाना दिनों दिन मुश्किल होता चला गया। करेला उस पर नीम चढ़ा की तर्ज पर जीएसटी के दुश्चक्र में बेहद छोटे-छोटे व्यापारियों को उलझा कर बढ़ी हुई टैक्स दरों का बोझ भी मोदी जी ने पहले से ही बेहाल मध्य वर्ग पर ही डलवा दिया। जाहिर सी बात है, व्यापारियों पर टैक्स चाहे जितना मर्जी बढ़ा लो, लेना तो व्यापारियों को जनता से ही है। इसके लिए उन्हें अपने प्रोडक्ट के दाम बढ़ाने पड़े और इससे महंगाई की मार न सिर्फ चौतरफा हो गई बल्कि पहले से कहीं ज्यादा घातक भी हो गयी। 

- मध्यम वर्ग अपनी नौकरी से होने वाली बचत का निवेश जहां-जहां करके अपने बुढ़ापे के लिए या बच्चों की उच्च शिक्षा के लिए जरूरी बड़ी रकम का इंतजाम किया करता था, हर उस जगह को मोदी जी ने अपनी सरकार में इस कदर बर्बाद कर दिया कि मध्य वर्ग को उसकी बचत पर मुनाफा देना तो दूर, उसका मूल धन लौटाने तक की क्षमता उस सेक्टर की कंपनियों में नहीं रही। मिसाल के तौर पर रीयल एस्टेट सेक्टर को ही लीजिए। जहां सस्ते मद्दे प्लाट या मकान-दुकान में निवेश करके रियल एस्टेट की तेजी का फायदा उठाकर लोग दो चार साल में ही अपने पैसे दोगुने चारगुने कर लिया करते थे, वहां अब न सिर्फ लाखों लोगों के पैसे डूब चुके हैं बल्कि तेजी खत्म हो जाने के कारण बरसों पहले किये गए निवेश के बराबर रकम भी उन्हें उस प्रॉपर्टी को बेचकर नहीं मिल पा रही है।

बाजार में खरीदार अब पहले जैसे नहीं दिख रहे इसलिए तेजी तो छोड़िए दाम उतना ही मिल जाये, जितने में खरीदा है तो गनीमत मानिए। इससे साफ है कि रियल एस्टेट की मंदी का नुकसान अगर बिल्डर को है तो सबसे गहरा और सीधा नुकसान उस मध्य वर्ग को भी तो है, जो अपने बुढ़ापे के लिये या बच्चों की उच्च शिक्षा जैसी अपरिहार्य जरूरतों के लिए रियल एस्टेट के निवेश पर ही निर्भर करता था। 

और सिर्फ रियल एस्टेट ही नहीं, मोदी सरकार ने निवेश के जरिये पैसा कमाने का कोई ठिकाना मध्य वर्ग के लिए छोड़ा ही नहीं, फिर वह चाहे सोना-चांदी हो या बैंकों में जमा हो सब तरफ मोदी ने अपनी मूर्खताभरी आर्थिक नीतियों से मुनाफा तो दूर मध्य वर्ग के मूल धन को ही खतरे में डाल दिया है। 

यानी मोदी राज में मध्यम वर्ग के व्यक्ति पर सोंटे चले, उसका भविष्य खतरे में पड़ा, उसके बच्चों का भविष्य अंधकारमय नजर आने लगा, घर-गृहस्थी चलाने तक में मुश्किलें लगातार बढ़ती गयीं,  बचत से कमाने या निवेश से मोटा माल जुटाकर अपना बुढ़ापा/बीमारी या बच्चों का भविष्य संवारने का उसका हर सपना ही खतरे में डाल दिया। मगर मध्य वर्ग से पूछिए तो वह यही कहेगा कि आएगा तो मोदी ही।

(अश्विनी श्रीवास्तव करीब डेढ़ दशक की पत्रकारिता करने के बाद अब रियल एस्टेट कारोबार से जुड़े हैं। यह लेखक की निजी राय है।)

 








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