नेहरू ‘अमर रहे’ या नेहरू को ‘श्रद्धांजलि’ !

जयंती पर विशेष , , बुधवार , 14-11-2018


nehru-birthday-pm-logic-science-freedom-struggle-shradhanjali

प्रेम कुमार

राजनीति में ‘नेहरू अमर रहे’ ही सच्ची श्रद्धांजलि का मान्य तरीका है। ‘श्रद्धांजलि’ को अंतिम प्रणाम के रूप में लिया जाता है। अगर किन्हीं के पार्थिव शरीर को प्रणाम और पुष्प अर्पित करते हुए श्रद्धांजलि दी जा रही हो, तो वह अंतिम दर्शन या अंतिम प्रणाम बनकर आखिरी तौर पर श्रद्धा का वक्त बन जाता है। इस लिहाज से जवाहरलाल नेहरू को ‘श्रद्धांजलि’ तब दी गयी थी जब उन्होंने  27 मई 1964 को अंतिम सासें ली थीं।

‘नेहरू अमर रहे’ का भाव ज़िन्दा रहा। ‘बर्थ डे’ यानी 14 नवंबर ‘चिल्ड्रन डे’ में बदल गया। आने वाली पीढ़ियों के बच्चों में पंडित नेहरू ‘चाचा नेहरू’ बनकर ज़िन्दा रहे। यह मौका बच्चों के बीच रचनात्मकता को ज़िन्दा रखने का अवसर हो गया। मौज-मस्ती, छुट्टी, टॉफी, लड्डू-मिठाई के बीच चाचा नेहरू धीरे-धीरे ‘दिवस’ बन गये। शुक्र है कि इस दिवस के तौर पर अभी तक पंडित जवाहरलाल नेहरू अमर बने हुए हैं। 

पंडित जवाहरलाल नेहरू की सोच, उनके काम और सिद्धांत ज़िन्दा रहे हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके योगदानों ने एक सफर तय किया  है। तीसरी दुनिया के देशों में नेहरू के लिए जो छवि रही है वह किसी के प्रयास से मिटने वाली नहीं है। इतना जरूर है कि अपने देश में नेहरू जब तक अमर रहेंगे, तब तक पराए देश में भी उन्हें कोई ‘श्रद्धांजलि’ नहीं दे पाएगा।

वक्त के साथ-साथ चीजें बदलती हैं और एक समय आता है जब लगता है कि सबकुछ बदल गया है। इलाहाबाद में पंडित नेहरू का पैतृक निवास स्थान हो या फिर दिल्ली में तीन मूर्ति भवन, नेहरू की शेष स्मृतियां ही वहां मौजूद हैं। तीन मूर्ति भवन भी अब साझेदारी में जा रहा है। देश के बाकी प्रधानमंत्रियों की शेष स्मृतियों की अब यहां घुसपैठ होने वाली है। ऐसा करने के पीछे कथित तौर पर नेहरू विरोधी मोदी सरकार की कोशिश ऐसे हालात बनाना है कि नेहरू की शेष स्मृतियों को भी खोजना आसान न रह जाए।

जहां तक पंडित जवाहरलाल नेहरू की अशेष स्मृतियों की बात है, पहले यह समकालीन लोगों के मन और हृदय में अशेष रहती हैं। वहीं से इसका प्रसार होता है। अगर समकालीन लोगों ने इन स्मृतियों को भौतिक स्वरूप देने का प्रयास किया, पुस्तकों में, संग्रहालयों में, शहरों में या चौक-चौराहों पर उन्हें किसी और रूप में याद रखने का प्रयास किया, तो अशेष स्मृतियां नये सिरे से शेष स्मृतियों का रूप ले लेती हैं। यह सौभाग्य जितने अधिक भौगोलिक क्षेत्र में या जनसांख्यिक स्तर पर या फिर जितने कालखंड तक किसी व्यक्ति को मिलता है उसी हिसाब से वह ‘महान’ कहलाता है। 

दुनिया को पंचशील और निर्गुट सोच के साथ-साथ धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा देने वाले पंडित जवाहरलाल नेहरू ग्लोबल लीडर रहे, देश-विदेश में लोकप्रिय रहे और मृत्यु के बाद भी भारतीय जनमानस पर छाए रहे। देश को दिए गये आईआईटी, आईआईएम, इसरो, डीआरडीओ, पंचवर्षीय योजना जैसी चीजों में भी नेहरू ज़िन्दा हैं।

एक वक्त के बाद जब विरासत कमजोर होने लगती है तो वक्त इतना क्रूर हो जाता है कि शेष स्मृतियों के स्वत: नष्ट होने का इंतज़ार तक नहीं कर पाता। रूसी क्रांति के जनक और नेहरू के आदर्श रहे व्लादिमिर इल्यीच लेनिन इसके सर्वथा योग्य उदाहरण हैं। एकीकृत सोवियत संघ के विघटन के साथ ही लेनिन की विरासत नष्ट होने लग गयी थी। समाजवादी सिद्धांत के साथ दुनिया के कई हिस्सों में इस विरासत को ज़िन्दा रखने का संघर्ष भी है, मगर लेनिन की मूर्तियां तोड़े जाने का दर्द भी महसूस किया जा सकता है। 

इन्दिरा गांधी से सोनिया व राहुल गांधी तक आते-आते पंडित नेहरू की आभा कमजोर होती गयी है। मगर, इस आभा के दीर्घायु रहने में भी इनका योगदान रहा है। नेहरू की विरासत हिन्दुस्तान में कमजोर हुई है मगर ख़त्म नहीं हुई है। धर्मनिरपेक्षता या सेकुलरिज्म की अवधारणा संकट के बावजूद अपना अस्तित्व बचाने की जद्दोजहद कर रही है। शांतिपूर्ण सह अस्तित्व को जो आघात 1962, 1965, 1971 में लगा था, उससे बड़ा आघात आज महसूस हो रहा है। तब एक-दो देश के साथ कठिनाई थी, आज कई देशों के साथ दिक्कतें हैं। 

नेहरू की जरूरत कभी ख़त्म होगी नहीं। नेहरू कभी अप्रासंगिक नहीं होंगे। फिर भी नेहरू को अप्रासंगिक बनाने में सक्रिय शक्तियों का उभार भी एक फैक्टर है जो ‘नेहरू अमर रहें’ के उद्घोष के बीच और ‘नेहरू को श्रद्धांजलि’ की सोच के साथ ज़िन्दा हैं। ये शक्तियां नेहरू को गुनहगार बताने में जुटी हैं। कभी कश्मीर का गुनहगार, तो कभी भारत का दुश्मन, कभी पटेल विरोधी तो कभी हिन्दू विरोधी के तौर पर नेहरू को पेन्ट करने की कोशिशों में ऐसी शक्तियां जुटी रहती हैं। 

बारम्बार ऐसा लगता है कि नेहरू कमजोर हो रहे हैं मगर इसका जवाब जानने के लिए कुछेक सवाल अपने आपसे करने की जरूरत है। 

क्या देश में सेकुलर सोच कमजोर हुई है? 

क्या विकास की सोच से देश दूर हुआ है? 

क्या आधुनिक और प्रगतिशील समाज बनाने का सपना कमजोर हुआ है? 

क्या साम्प्रदायिक ताकतों को सिर उठाने नहीं देने का जज्बा कमजोर हुआ है? 

कुछ लोग या ज्यादातर लोग इन सवालों का जवाब ‘हां’ में देना चाहेंगे। मगर, इस जवाब में भी चिन्ता रहेगी। और, यही चिन्ता पंडित जवाहरलाल नेहरू को दीर्घायु बनाती है। ‘नेहरू अमर रहें’ का नारा जोर-शोर से बुलन्द होगा और नेहरू को ‘श्रद्धांजलि’ देने की कोशिश औंधे मुंह गिरेगी, यह इसी बात का प्रमाण तो है। 

(प्रेम कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल एक पत्रकारिता संस्थान में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं।) 








Tagnehru birthday pm shradhanjali freedomstruggle

Leave your comment