विवेकशीलता, तार्किकता और वैज्ञानिकता की बात आते ही प्रासंगिक हो जाते हैं नेहरू

जयंती पर विशेष , , बुधवार , 14-11-2018


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रमाशंकर सिंह

आज चौदह नवम्बर है। जवाहरलाल नेहरू का जन्मदिन। 1889 में आज ही के दिन उनका इलाहाबाद में जन्म हुआ था। उनके जन्म के समय इलाहाबाद एक कास्मोपोलिटन शहर हुआ करता था। उनके जन्म के दशक में उच्च न्यायालय और इलाहाबाद विश्वविद्यालय स्थापित हो चुके थे। पूरे देश भर से पंडित, मौलवी, अध्यापक, वकील और मजदूर इलाहाबाद में अपना भविष्य तलाशने आ रहे थे। उस समय यह शहर फ़ारसी, उर्दू, हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी के विद्वानों का गढ़ हुआ करता था। इन सभी भाषाओं में शिक्षा देने के लिए बेहतरीन स्कूल-कालेज थे। तो कहने का आशय यही है कि जवाहरलाल नेहरु ऐसे ही इलाहाबाद में जन्मे थे।

1857 के इलाहाबाद में देश में आजादी की लड़ाई बहुत शानदार तरीके से लड़ी गयी थी। भले ही विद्रोही हार गए थे लेकिन उनकी अनुगूंज शहर में व्याप्त थी। जैसा सुनील खिलनानी बताते हैं कि 1857 के विद्रोह के बाद उत्तर भारतीय शहरों में सिविल लाइंस का निर्माण किया गया और शहरी स्पेस पर ब्रिटिश शासन द्वारा कब्ज़ा जमाया गया। ऐसी सिविल लाइनों में बसने के लिए भारतीय पढ़ा-लिखा वर्ग लालायित था।

1880 के दशक में जब डिस्ट्रिक्ट बोर्डों का गठन हुआ तो स्व-शासन के नाम पर भारतीयों से कर वसूला गया और वे इन सुविधा-संपन्न इलाकों के रहवासी हो गये। लेकिन नेहरु का का जन्म ऐसे किसी सुविधा-संपन्न सिविल लाइन में न होकर अपेक्षाकृत एक गुमनाम सी गली में हुआ था। यह तवायफों की गली थी और अभी उन्हें उतनी हेय दृष्टि से नहीं देखा जाता था जितना बाद में नेहरु पर कीचड़ उछालने के लिए इस तथ्य का प्रयोग किया गया कि उनका जन्म मीरगंज नाम की एक बदनाम बस्ती में हुआ था !

1920 के घटनापूर्ण दशक में जवाहरलाल नेहरू लगभग चालीस साल के रहे होंगे जब उन्होंने एक हिल-स्टेशन की यात्रा से लौटने के बाद उत्तर भारत की राजनीति में अपने आपको झोंक दिया। उस समय तक महात्मा गांधी का नेतृत्व देश के सिर पर चढ़कर बोल रहा था, हालांकि युवाओं के एक वर्ग में उनके तौर-तरीकों को लेकर नाराजगी भी थी। यही वह दौर था जब सुभाषचंद्र बोस और भगत सिंह द्वारा सार्वजानिक रूप से गांधी के तौर-तरीकों से गहरी असहमति व्यक्त की गयी थी। जवाहरलाल ने अपने को शिक्षित करने के लिए किताबों, दुनिया में हो रहे बदलावों और भारत में किसान-मजदूर एवं विद्यार्थियों से संवाद किया। यही काम सुभाषचंद्र बोस और भगत सिंह भी कर रहे थे।

देश का आकार नक़्शे से पहले व्यक्ति के मन में बनता है जो परिचय और प्रेम से ऊर्जा ग्रहण करता है। नेहरु के अंदर भी वह देश बन रहा था जिसको उन्होंने अपनी जेल यात्राओं में सटीक ढंग से वर्णित किया। उनकी किताब‘ डिस्कवरी ऑफ इंडिया’  भारतीय उपमहाद्वीप के एक जटिल इतिहास से निकल रहे देश की कहानी है जिसमें वे अभिन्न रूप से शामिल थे।

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद पूंजीवाद और राष्ट्रवाद के एक जटिल मेलमिलाप से निकले औपनिवेशिक शोषण को महात्मा गांधी, भगत सिंह और नेहरु अपने-अपने तरीके से समझ रहे थे, जबकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर फासीवाद और पूंजीवाद के गठजोड़ को किसी नेता ने सबसे पहले पहचाना तो यह जवाहरलाल नेहरु ही थे। यहां तक कि इटली की अपनी यात्रा के दौरान कविवर रबीन्द्रनाथ ठाकुर भी इसे ठीक से रेखांकित नहीं कर पाए थे।

1940 के दशक में जब भगत सिंह जीवित नहीं थे और तब नेहरु ने पूरे भारत को द्वितीय विश्वयुद्ध के खिलाड़ियों का असली चेहरा दिखाया। उन्होंने बताया कि संयुक्त राज्य अमेरिका, सोवियत संघ, ब्रिटेन, जर्मनी, फ़्रांस, आस्ट्रेलिया और यहां तक कि तुर्की द्वारा तय किया जा रहा राष्ट्रीय प्रगति का रास्ता भारत का रास्ता नहीं है। भारत को अपनी राह खुद बनानी है जिसमें हर भारतीय समान रूप से भागीदार है।

इसलिए उन्होंने विज्ञान, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और अंतर्राष्ट्रीयतावाद के सहारे एक ऐसे भारत की कल्पना की जो सक्षम, प्रगतिकामी, उदार और तार्किक हो। हालांकि नेहरु के यह सपने आधे-अधूरे और कभी-कभार तो छिन्न-भिन्न रूप में पूरे हुए लेकिन इसके लिए नेहरू को इतिहास की सूली पर तो नहीं चढ़ा दिया जाना चाहिए।

जवाहरलाल नेहरु को लोग क्यों नहीं याद करना चाहते?

ब्रिटिश जेलों में एक दशक से भी ज्यादा समय गुजारने वाले नेहरु से क्या भारत के युवा घृणा करने लगे हैं? ऐसा क्यों हुआ है? मुझे इसके तीन कारण दिखाई पड़ते हैं।

पहला कारण तो यही लगता है कि लेफ्ट-लिबरल तबकों के बुद्धिजीवी नेहरु के प्रति हद से ज्यादा अनुदार रहे हैं। उनकी आलोचना की जगह उन्होंने निंदा ज्यादा की है और जब इक्कीसवीं शताब्दी में नेहरु का दैत्यीकरण किया जाने लगा तो उनके पास कोई चारा नहीं था कि वे नेहरु के पक्ष में खड़े हो सकें क्योंकि व सरकारों पर निर्भर थे/ हैं और अपनी सुविधाओं में किसी प्रकार की कमी झेल नहीं सकते।

नेहरूवियन मॉडल की हजार कमियों को गिनाया गया, उसके बरक्स जो मॉडल प्रस्तुत किए गए, उसे राजनीतिक शक्ति में न तो तब्दील किया जा सका और न ही लागू। खुद पश्चिम बंगाल में लेफ्ट उन्हीं बुराइयों का शिकार हो गया जिनसे घिरकर कांग्रेस का नैतिक और राजनैतिक क्षरण हुआ है। 1980 के बाद अस्मितावाद के उभरने के कारण भी नेहरु नेपथ्य में चले गए और जो नए नायक/ नायिका सामने आए उनकी विश्वदृष्टि से नेहरु कहीं भी मेल नहीं खाते थे। अस्मितावाद से निकले नेताओं के लिए नेहरु का कोई राजनीतिक और सामाजिक मूल्य नहीं रहा है। 

दूसरा सबसे बड़ा कारण कांग्रेस पार्टी ही है। उनके कार्यकर्ताओं के पास नेहरू जैकेट और टोपी के अतिरिक्त नेहरु जैसा कुछ नहीं है। इंदिरा गांधी ने पार्टी के अंदर भयंकर ढंग से चापलूसी और वंशवाद को बढ़ावा दिया। समाजशास्त्री शिव विश्वनाथन ने लिखा है कि जब कोई संस्कृति तबाह होती है तब अच्छाई, सुंदरता और नैतिक मूल्य कमजोर हो जाते हैं। नेहरु ने जिस भारत की कल्पना की थी, उसे ऐसे ही धीरे-धीरे खत्म करने की कोशिश खुद कांग्रेस के अंदर से और बाहर से की गयी है।

संजय गांधी के बाद तो भारत के मध्यवर्ग को अत्याचार से प्यार हो गया। विश्वनाथन रेखांकित करते हैं कि संजय और इंदिरा गांधी ने लोकतंत्र की पारिस्थितिकी को नष्ट किया और आश्चर्य की बात है कि नेहरूवादी कहे जाने वाले लोगों ने इस पर चूं तक नहीं की। पिछले वर्ष अपने एक लेख में मैंने कहा भी था कि दिल्ली स्थित सत्ता के लालची लोगों ने उस नेहरु को दृश्य से बाहर कर दिया जो जनता का नेहरु था। (http://thewirehindi.com/24958/remembering-1st-prime-minister-of-india-jawaharlal-nehru/)। खुद 2009 से 2014 के बीच कांग्रेस पार्टी ने न केवल आत्मघाती कदम उठाए बल्कि अहं से भरे और जमीन से कटे नेताओं को आगे बढ़ाया।

एक तीसरा कारण इधर हाल के वर्षों में नेहरु के बारे में भ्रम और मिथ्या-प्रचार भी है। यह तो हद हो गयी है कि लोग नेहरु पर किसी इतिहासकार की बात मानने के बजाय रैलियों में पढ़ाए जा रहे इतिहास को तवज्जो देते हैं। उसी से नेहरु से संबंधित लोकप्रिय विमर्श गढ़े जा रहे हैं। अब नेहरूवियन लोग नहीं हैं, अब केवल कांग्रेसी बुद्धिजीवी हैं जो मौका मिलते ही किसी प्राइवेट यूनिवर्सिटी में मोटी तनख्वाह पर पढ़ाने चले जाते हैं, मुंह बंद कर लेते हैं या सरकार समर्थक हो जाते हैं।

नेहरु को उनके समकालीनों का दुश्मन बताया जाता है और ऐसे प्रस्तुत किया जाता है कि जैसे पारिवारिक संपत्ति के विवाद में उन्होंने सभी हिस्सेदरों को ठिकाने लगा दिया हो। सुभाषचंद्र बोस के दुश्मन के रूप में उन्हें गलत ढंग से चित्रित किया जाता है जबकि वे दोनों व्यक्तिगत रूप से एक दूसरे का आदर करते थे। इतिहासकार रुद्रांग्शु मुखर्जी ने अपनी किताब ‘नेहरु एंड बोस: पैरलेल लाइव्स’ में इस बात का जिक्र किया है कि जब कमला नेहरु बीमार थीं तो बोस ने यूरोप में उनकी काफी देखभाल की थी। इसी प्रकार उनको सरदार पटेल के खिलाफ दिखाया जाता रहा है। यह भी अनैतिहासिक है।

दोनों के बीच हुए पत्र व्यवहार, गुप्तचर विभागों की फाइलें इस बात की पुष्टि करती हैं कि आज़ादी की लड़ाई के दौरान सभी नेता एक दूसरे का काफी आदर करते थे। जिस एक बिंदु पर सबकी समान राय थी, वह था कि देश को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त कराना है। उस दौर में प्रथम पंक्ति के सारे नेता एक से बढ़कर एक थे और नेहरु को देश के प्रधानमंत्री के रूप में चुना जाना एक सामूहिक निर्णय की अभिव्यक्ति थी। ऐसा प्रस्तुत किया जाता है कि मानों महात्मा गांधी ने नेहरु को चुपके से बुलाकार प्रधानमन्त्री बना दिया हो।

नेहरु को क्यों याद करें? विशेषकर युवाओं के लिए वे क्यों जरुरी हैं?

यह सवाल मैंने इतिहास के अध्यापक शुभनीत कौशिक से पूछा। शुभनीत बलिया के एक कालेज में इतिहास पढ़ाते हैं। वे कहते हैं : ‘बतौर राजनेता जवाहरलाल नेहरू की विवेकशीलता, तार्किकता और उनकी वैज्ञानिक सोच उन्हें हिंदुस्तान के युवाओं के लिए आज प्रासंगिक बनाती है। वर्तमान समय में जब हिंदुस्तान में संवाद का दायरा लगातार संकुचित होता जा रहा है, ऐसे में नेहरू की संवादप्रियता, अपने मुखर आलोचकों से भी संवाद स्थापित करने का उनका आग्रह और असहमतियों के बीच भी हिंदुस्तान के भविष्य व वर्तमान से जुड़े बुनियादी प्रश्नों पर आम सहमति बनाने की उनकी अनथक कोशिशें उन्हें नई पीढ़ी के सामने एक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करती है।’

आज़ादी के आंदोलन को एक बार फिर देखें। 1920 के दशक में भारत के युवा काफी क्षुब्ध थे। कालेजों और विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले युवाओं ने इन संस्थाओं का बहिष्कार किया और भारतीय जनों ने कई शैक्षिक संस्थान स्थापित किए। जामिया मिलिया और काशी विद्यापीठ इसी दौर में स्थापित हुए। यहां पढ़ने वाले विद्यार्थी आजादी के आंदोलन की रीढ़ साबित हुए, विशेषकर 1931 और 1942 के अखिल भारतीय आंदोलनों में। महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस और जवाहरलाल नेहरु ने इस दौरान विद्यार्थियों को लगातार संबोधित किया।

31 दिसम्बर 1946 को नेहरु ने दिल्ली में हुए अखिल भारतीय छात्र सम्मेलन में कहा कि नया एशिया वही बनेगा जो उसके युवक और युवतियां बनाएंगे। आज इसी एशिया में तालिबान के लड़ाके घूम रहे हैं। प्रायः नेहरु की अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण की आलोचना की जाती है। क्या हमें यह स्वीकार नहीं करना चाहिए कि भारत के युवाओं का भविष्य श्रीलंका, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के युवाओं के भविष्य के साथ जुड़ा है? और यदि ऐसा न होता तो एक शांतिपूर्ण भारत के लिए देश के नीति-निर्माता तालिबान के लड़ाकुओं से बातचीत क्यों करते?

यहीं आकर शुभनीत की बात अर्थ ग्रहण करती है कि नेहरु की संवादप्रियता भारत के लिए बेहद जरुरी है। 

(रमाशंकर सिंह शिमला स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी के फेलो हैं।)


 










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Shiv Gopal Yadav :: - 11-14-2018
Thank you.

Dr D Nath :: - 11-14-2018
Appreciate the time